बिहार बंद: सड़कें ख़ाली, यातायात ठप्प

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राष्ट्रीय जनता दल(राजद) की ओर से बुलाए गए बिहार बंद का सभी इलाक़ों में अच्छा-ख़ासा असर नज़र आ रहा है.

पटना के लगभग सभी इलाक़ों में राजद कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए हैं. दूकानें बंद करवाई जा रही हैं.

कई जगहों पर ट्रेनें रोकी गई हैं.

शहर की लाइफ़लाइन माने जाने वाला ऑटो रिक्शा प्रमुख सड़कों और इलाक़ों में न के बराबर नज़र आ रहे हैं.

इसके अलावा सड़कों पर यातायात के दूसरे साधन भी कम दिखाई दे रहे हैं.

डाकबंगला चौराहे पर राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे के नेतृत्व में पूर्व आयोजित मुख्य कार्यक्रम के लिए लोग बड़ी तादाद में जुट रहे हैं.

राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी बंद के समर्थन में सड़कों पर उतर आए हैं.

जातिगत जनगणना

यह बंद जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने के मुद्दे पर बुलाया गया है. राजद का सहयोगी जनता दल यूनाइटेड(जद-यू) भी बंद का समर्थन कर रहा है.

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केंद्र सरकार ने इस महीने की शुरुआत में सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना में से सिर्फ़ आर्थिक आंकड़े ही जारी किए थे. तब से लालू प्रसाद जातिगत आंकड़े जारी करने की मांग को लेकर हमलावर हैं.

वे ग़रीबों-पिछड़ों-दलितों के हक़ में इसे जारी करने की मांग करते हुए बीते दस दिनों में तीन बार पटना के सड़कों पर उतर चुके हैं.

रविवार को लालू पटना के गांधी मैदान में अनशन पर बैठे और अपने अंदाज़ में कार्यक्रम स्थल तक टमटम से आए.

अनशन पर उनका साथ दिया जद-यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने.

बिहार राजद के महासचिव और प्रवक्ता शक्ति यादव ने जातिगत जनगणना के आंकड़ों के महत्व और पार्टी के आंदोलन के बारे में बात की.

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शक्ति यादव ने कहा, "जब जनगणना हुई थी तो उसमें शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति के साथ-साथ किस जाति के लोग हैं इसका भी एक कॉलम था. लेकिन इन तीनों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की गई और जाति के बारे में नहीं की गई."

जातीय भावनाएं

आगामी विधानसभा चुनावों में लालू-नीतीश गठबंधन का सीधा मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से है.

ऐसे में लालू जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने की मांग कर केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ निशाना भी साथ रहे हैं.

लेकिन भाजपा का कहना है कि लालू ऐसा कर रहे हैं क्योंकि उनके पास मुद्दों का टोटा है.

इधर बिहार भाजपा के प्रवक्ता प्रेमरंजन पटेल कहते हैं, "राजद के पास कोई मुद्दा नहीं है इसलिए वो फिर से बिहार में जातीय भावनाओं को उभारना चाहती है और इसके सहारे चुनाव की वैतरणी पार करना चाहती है."

मंडलवाद की राजनीति

जानकारों का मानना है कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़े जारी होने का सीधा फ़ायदा लालू-नीतीश गठबंधन को चुनावों में हो सकता है.

लालू के इस मांग के पीछे की राजनीति के बारे में वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार कहते हैं, "लालू यादव को ऐसा लग रहा होगा कि इस मसले से मंडल कमीशन का जो दौर था, जिसमें पिछड़ों, अति पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच जो गोलबंदी थी उस समय का माहौल बन जाएगा."

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उस समय लालू यादव नब्बे के दशक में मंडलवाद की राजनीति के रास्ते ही बिहार के सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे थे.

लेकिन जातिजगणना के आंकड़े के मुद्दे पर वे एक बार फिर अपने पक्ष में बिहार के बहुमत को कर पाते हैं कि नहीं यह तो आने वाले दिनों में साफ़ हो पाएगा.

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