मुफ़्त पानी की क़ीमत चुका रहा है दिल्ली?

  • 31 जुलाई 2015
जल आपूर्ति, दिल्ली इमेज कॉपीरइट RAVINDER

दिल्ली के एक तंग इलाके संगम विहार में जहां पांच लाख लोग रहते हैं, वहां किसी का बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा है.

लोग लाइन लगाकर संकरी गलियों में खड़े हैं. कुछ नीचे झुककर बैठे हुए हैं. प्लास्टिक के बड़े-बड़े ड्रम उनके सामने रखे हुए हैं.

तभी अचानक से एक आवाज़ सुनाई देती है. कोई चिल्लाता है आ गया, आ गया.

पानी का टैंकर तभी गली में आता है और लोगों में कोलाहल मच जाता है.

हताशा

इमेज कॉपीरइट Getty

नौजवान ट्रक के पास इकट्ठे हो जाते हैं और उसके ऊपर पाइप लेकर चढ़ जाते हैं. दूसरे लोग ड्रमों को सही जगह पर रखने लगते हैं. तभी लोगों में साफ़ पानी भरने को लेकर धक्का-मुक्की शुरू हो जाती है.

लोग लाइन में से धकेले जाने के कारण आपस में लड़ने लगते हैं.

वहां रहने वाली जैनीशा ख़ातून कहती हैं, "हमेशा ही ऐसा होता है. लोग खींचातानी करते हैं. गाली गालौज करते हैं. तब मैं हट जाती हूं"

पंद्रह मिनट के अंदर पानी ख़त्म हो जाता है और टैंकर चला जाता है. कई लोग पानी नहीं मिलने के कारण हताश हो जाते हैं.

निर्भरता

इमेज कॉपीरइट Getty

यहां की एक अन्य महिला कहती हैं, "दस दिनों में पानी का यह टैंकर एक बार आता है. आप कैसे उम्मीद करते हैं कि पानी तब तक ख़त्म नहीं होगा? इसलिए हमें पानी बाज़ार से खरीदना पड़ता है. पानी मिलता तो हमेशा है लेकिन उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है."

दिल्ली की 20 फ़ीसदी आबादी टैंकर से सप्लाई होने वाली पानी पर निर्भर है. लेकिन मांग और आपूर्ति के बीच एक दिन में 75 करोड़ लीटर पानी का अंतर होता है.

इसलिए वे पानी की ब्लैक मार्केटिंग के सहारे अपनी ज़रूरत पूरा करने के लिए मजबूर हैं. ठेकेदार और पानी माफिया पानी की खरीद-फरोख्त का धंधा बखूबी अंजाम दे रहे हैं.

संगम विहार के एक सामाजिक कार्यकर्ता अनुज पोरवाल का कहना है, "पानी माफिया हमेशा से सक्रिय रहे हैं. कुछ लोगों का एक गुट पानी की चोरी करता है और जरूरतमंदों को बेच देता है."

उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा, "पानी माफिया को पुलिस और स्थानीय नेताओं का समर्थन हासिल है. इसलिए कोई उन्हें रोक नहीं सकता. "

रात के अंधेरे में

इमेज कॉपीरइट Getty

ब्लैक मार्केट में पानी की क़ीमत 200 लीटर के लिए करीब 500-600 रुपए है जबकि सरकार की ओर से मुहैया कराया जाने वाला पानी मुफ्त मिलता है.

बिमला का कहना है, "मैं एक महीने में करीब पांच हजार रुपए कमाती हूं इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे लिए यह कितना मुश्किल है."

रात के अंधेरे में माफिया अपना काम करती है. रात के चार बजे यमुना नदी के किनारे का बाल्ला इलाका. रात के अंधेरे में सूनी पड़ी गली में कुछ कुत्ते भौंक रहे हैं.

तभी एक कतार में कई टैंकर गली में घुसते हैं. कुछ लोग टैंकरों में से निकलते हैं और जल्दी से कई मोटी पाइपें टैंकर के अंदर डाल देते हैं.

बोरवेल से जुड़े पाइप के दूसरे हिस्से को ज़मीन की गहराई में डाल दिया जाता है. इसतरह से हज़ारों लीटर पानी खींच कर टैंकरों में भर दिया जाता है.

टैंकर को भरने में आधा घंटा से भी कम समय लगता है. एक टैंकर भरने के बाद फिर दूसरे टैंकर को भरा जाता है.

नुकसान

इमेज कॉपीरइट Getty

यह एक बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से चलने वाला ऑपरेशन है. एक स्थानीय निवासी हमें सतर्क करते हुए कहता है, "कोई भी इन्हें नहीं रोकता है क्योंकि ये लोग खतरनाक हो सकते हैं."

दिल्ली के लाखों लोग ख़ासकर गरीब आबादी उस संसाधन की क़ीमत चुका रही है जो वाकई में मुफ़्त में मिलता है.

इसके कुछ दूरगामी प्रभाव भी है. पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है.

ऐसे में माफिया की ओर से पानी निकालने को नहीं रोका गया तो इसके सामाजिक और आर्थिक नुकसान हो सकते हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार