आम होते हुए भी ख़ास था कलाम का आख़िरी दिन..

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Image caption श्रीजन पाल सिंह डॉक्टर कलाम के सहयोगी रहे हैं.

भारत के पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम का सोमवार शाम शिलॉन्ग में निधन हो गया.

डॉक्टर कलाम के सहयोगी श्रीजन पाल सिंह ने उनके अंतिम दिन का ब्यौरा अपने फ़ेसबुक पन्ने पर पोस्ट किया है.

पेश हैं अनुवादित अंश

हम 12 बजे गुवाहाटी के लिए विमान में सवार हुए. उन्होंने गहरे रंग का 'कलाम सूट' पहना हुआ था.

हम ढाई घंटे की उड़ान के बाद शिलॉन्ग पहुँचे और एयरपोर्ट से कार से आईआईएम पहुँचने में ढाई घंटे और लगे.

पाँच घंटे के इस सफ़र के दौरान हमने कई मुद्दों पर बात की. मैंने पिछले छह सालों के दौरान डॉक्टर कलाम के साथ सैकड़ों यात्राएं की हैं.

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हर यात्रा की तरह ये भी विशेष थी. इस दौरान हमने तीन ख़ास मुद्दों पर बात की.

पंजाब हमले पर दुखी

सबसे पहले वो पंजाब में हुए हमले में निर्दोष लोगों की मौत पर बेहद दुखी थे.

आईआईएम शिलॉन्ग में उनके भाषण का विषय था, "जीने लायक धरती का निर्माण". उन्होंने पंजाब की घटना को विषय से जोड़ते हुए कहा, "ऐसा लगता है कि मनुष्य निर्मित ताक़ते धरती पर जीवन के लिए उतना ही बड़ा ख़तरा हैं जितना प्रदूषण."

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हमने इस बात पर चर्चा की कि यदि हिंसा, प्रदूषण और मनुष्यों की लापरवाहियां यूं ही चलती रहीं, तो कैसे मानवों को धरती छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.

उन्होंने कहा, "यदि ऐसा ही चलता रहा तो संभवतः तीस साल लगेंगे..तुम लोगों को इस बारे में कुछ करना चाहिए. ये तुम्हारे भविष्य की दुनिया का सवाल है."

संसद में हंगामों पर चिंतित

बातचीत का दूसरा विषय भी एक राष्ट्रीय मुद्दा था. पिछले दो दिनों से डॉक्टर कलाम इस बात को लेकर चिंतित थे कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा संस्थान संसद एक बार फिर काम नहीं कर पा रहा है.

उन्होंने कहा, "मैंने अपने कार्यकाल में दो अलग-अलग सरकारें देखीं और उसके बाद भी कई सरकारें देखीं. काम में ये दखल होता ही रहता है. ये सही नहीं है. मुझे कोई ऐसा रास्ता निकालना ही होगा कि संसद विकास की राजनीति पर काम करे."

इसके बाद उन्होंने मुझसे आईआईएम शिलॉन्ग के छात्रों के लिए एक प्रश्न तैयार करने के लिए कहा. ये उन्हें लेक्चर के बाद दिया जाना था.

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वे चाहते थे कि छात्र संसद को अधिक उत्पादक और जीवंत बनाने के विषय में सलाह दें.

लेकिन कुछ देर बाद उन्होंने कहा, "मैं उनसे कोई हल सुझाने के लिए कैसे कह सकता हूँ जब स्वयं मेरे पास कोई हल ना हो."

सुरक्षा में लगे जवान को सलाम

उनकी तीसरी याद बेहद मानवीय है.

हम 6-7 कारों के काफ़िले में सफ़र कर रहे थे. डॉक्टर कलाम और मैं तीसरी कार में बैठे थे. हमारे आगे एक खुली जीप थी जिसमें तीन जवान थे.

दो जवान दोनों सिरों पर बैठे थे और तीसरा अपनी बंदूक तानें ऊपर खड़ा था.

एक घंटे के सफ़र के बाद डॉक्टर कलाम ने पूछा- 'वो खड़ा क्यों हैं. थक जाएगा. ये सज़ा देने जैसा है. क्या तुम वॉयरलैस पर ये संदेश दे सकते हो कि उसे बैठने के लिए कह दिया जाए.'

मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि उसे सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खड़े रहने के निर्देश दिए गए हैं. लेकिन वो नहीं माने. हमने संदेश भिजवाया लेकिन वो जवान फिर भी खड़ा रहा.

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अगले डेढ़ घंटे की यात्रा के दौरान उन्होंने मुझे तीन बार याद दिलाया कि मैं हाथ का इशारा करके उससे बैठने के लिए कहूं.

लेकिन अंततः उन्हें लग गया कि इस बारे में हम कुछ नहीं कर सकते और उन्होंने कहा कि मैं उससे मिलना चाहता हूँ और शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ.

जब हम आईआईएम शिलॉन्ग पहुँचे तो मैंने सुरक्षा अधिकारियों से उस जवान के बारे में पूछा. जब वो मुझे मिल गया तो मैं उसे अंदर ले गया.

डॉक्टर कलाम ने उसका हाथ मिलाकर अभिवादन किया और शुक्रिया कहते हुए पूछा कि तुम थक तो नहीं गए हो, क्या तुम कुछ खाना चाहोगे.

डॉक्टर कलाम ने उससे कहा, "मैं माफ़ी चाहता हूँ मेरी वजह से तुम्हें इतनी देर खड़ा रहना पड़ा."

उस जवान ने बस इतना ही कहा, "सर आपके लिए तो छह घंटे भी खड़े रहेंगे."

अंतिम शब्द

इसके बाद हम लेक्चर हॉल में पहुँचे. वो लेक्चर के लिए लेट नहीं होना चाहते थे.

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उन्होंने कहा, "छात्रों से कभी इंतेज़ार नहीं करवाना चाहिए."

मैंने जल्दी से उनका माइक सेट किया, लेक्चर के अंतिम रूप के बारे में ब्रीफ़ किया और कंप्यूटर पर आ गया.

जब मैं उनका माइक लगा रहा था तो उन्होंने हँसकर कहा, "फ़नी गॉय, क्या तुम ठीक हो."

मैंने मुस्कराते हुए कहा, "हाँ."

वो उनके अंतिम शब्द थे.

भाषण शुरू होने में दो मिनट थे. मैं उनके पीछे बैठा था. एक लंबी ख़ामोशी के बाद मैंने उन्हें देखा, वो नीचे गिर गए.

हमने उन्हें उठाया, जब तक डॉक्टर पहुँचते हमने वो सबकुछ किया जो हम कर सकते थे.

मैं उनकी तीन-चौथाई बंद आँखों को कभी नहीं भूल सकता. मैंने एक हाथ से उनका सिर संभाला और उन्हें होश में लाने की हर संभव कोशिश की.

उनके हाथ जकड़े और मेरी उंगली में फँस गए. उनका चेहरा स्थिर था और उनकी सुलझी हुई अचल आँखों से ज्ञान का प्रकाश निकल रहा था.

उन्होंने एक भी शब्द नहीं कहा. न ही कोई दर्द प्रदर्शित किया. सिर्फ़ उनका मक़सद साफ़ झलक रहा था.

पाँच मिनट के भीतर हम नज़दीकी अस्पताल में थे. अगले कुछ मिनटों में उन्होंने बता दिया कि मिसाइलमैन उड़ गया है, हमेशा के लिए.

मैंने एक और अंतिम बार उनके पैर छुए.

शिक्षक

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वो अक़्सर पूछते थे, "तुम युवा हो, तय करो कि तुम कैसे याद किया जाना चाहते हो."

मैं कोई प्रभावशाली जवाब सोचता रहता और एक दिन मैंने ही उनसे सवाल कर दिया कि पहले आप बताए कि आप कैसे याद किया जाना चाहोगे. राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक, मिसाइलमैन, इंडिया 2020 या लक्ष्य थ्री बिलियन के लिए?

मुझे लगा कि मैंने विकल्प देकर सवाल आसान कर दिया है लेकिन उन्होंने मुझे चकित कर दिया.

उन्होंने कहा, "एक शिक्षक के रूप में.."

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