जल्द 'ख़त्म होगी ये ज़िल्लत भरी ज़िंदगी'

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पश्चिम बंगाल के कूच बिहार ज़िले से दूर मध्य मसालडांगा और अन्य बांग्लादेशी एन्कलेव में तभी से भारतीय झंडा लहरा रहा है जब छह जून को ढाका में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने सीमा समझौते पर मुहर लगाई थी.

यहां के निवासी बेसब्री से भारत और बांग्लादेश के बीच एन्कलेवों के हस्तानांतरण का इंतज़ार कर रहे हैं जिससे जल्द ही उनके पास एक पहचान, एक देश और एक झंडा हो जाएगा.

स्थानीय कहानियों के अनुसार, ज़मीन का यह टुकड़ा इसलिए अलग है क्योंकि 18वीं सदी में दो राजाओं के बीच हुई शतरंज की बाज़ियों में गांवों को दांव पर लगाया जाता था.

भारत की आज़ादी के बाद चूंकि सीमांकन बहुत लापरवाही से हुआ यह एन्कलेव दूसरे देश की सीमा में रहते हुए पहले देश के हिस्से बन गए.

नल तक नहीं देखा

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असग़र अली को एन्कलेवों का सबसे बुज़ुर्ग बाशिंदा कहा जाता है. उनकी उम्र 105 साल बताई जाती है.

वह कहते हैं, "1947 में भारत को आज़ादी मिली और हमारी पहचान छिन गई. तबसे हम ऐसी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं जो न यहाँ की है, न वहाँ की."

मध्य मसालडांगा उन 51 बांगालादेशी एन्कलेवों में से हैं जिन्हें भारत में स्थानांतरित किया जाना है.

ऐसा लगता है कि 3,870 की आबादी वाले ये गांव दशकों पहले के समय में बंधे रह गए.

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पक्की सड़क और ऊपर से गुज़रती बिजली की तारें मध्य मसालडांगा से बचकर निकलते हुए पड़ोस के एक भारतीय गांव को कूच बिहार क़स्बे से जोड़ती हैं.

इनसे यह भी पता चलता है कि कैसे समय के साथ आस-पास चीज़ें बदल गई हैं.

भारतीय सीमा में फंसे ये बांग्लादेशी एन्कलेव, प्रक्रियागत जटिलताओं की वजह से सालों से सरकारी सुविधाओं से दूर ही रहे हैं.

सभी एन्कलेव वासियों मूलभूत सुविधाओं, मतदान के अधिकार, राशन कार्ड, नौकरियों और सबसे महत्वपूर्ण पहचान से वंचित रहे हैं.

पोयातुरकुथि एन्कलेव के सद्दाम मियाह कहते हैं, "हमारे लिए न अस्पताल है, न स्कूल, न बिजली...किसी भी सरकारी योजना में हम नहीं गिने जाते."

पिछड़ेपन और ग़रीबी के प्रतीक हर तरफ़ दिखते हैं.

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टीन की दीवारों और छतों वाले जर्जर मकानों के समूह ने कभी आधुनिक सुविधाएं जैसे कि - लाइट, पंखे, टीवी और तो और पानी का नल तक नहीं देखा है.

यहां के 470 परिवारों को स्कूल या ऐसी किसी सरकारी सुविधा की उम्मीद भी हासिल नहीं है. हालांकि वह चाहते हैं कि ये सब उन्हें भी मिलें.

फ़र्ज़ीवाड़े की मजबूरी

अपनी जटिल नागरिकता की स्थिति की वजह से उनके बच्चों को किसी स्कूल में तब तक दाख़िला नहीं मिलता जब तक कि वह अपनी असली पहचान छोड़ नहीं देते.

रबिंदर भारती विश्वविद्यालय के उत्तरी बंगाल परिसर के स्नातकोत्तर छात्र सद्दाम को पढ़ाई करने के लिए अपने पते और माता-पिता की पहचान के झूठे दस्तावेज़ देने पड़े.

छिहत्तर साल के मंसूल अली मियाह कहते हैं, "हमें दशकों से धोखे की यह अपमानजनक ज़िंदगी जीने पर मजबूर किया जाता है. हमें अपने बच्चों को स्कूल में दाख़िला दिलाने के लिए भारत के अपने पड़ोसियों की पहचान उधार लेनी पड़ती है. मैं ख़ुश हूं कि अब यह निरादर ख़त्म होगा. मैं एक सम्मानजनक नागरिक की मौत मर सकता हूं".

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साल 2010 से पहले स्वास्थ्य सुविधा भी यहां के लोगों को हासिल नहीं थी. तब एन्कलेव में रहने वालों ने मिलकर विरोध प्रदर्शन किया और एक भारतीय अस्पताल वालों को मजबूर किया कि वह मध्य मसालडांगा की अस्मा बीबी को तीसरे बच्चे के जन्म के लिए भर्ती करें, उनके पति की फ़र्ज़ी पहचान बनाए बिना.

मज़ेदार बात यह है कि उस बच्चे का नाम 'जिहाद' रखा गया, जिसका अर्थ अरबी में होता है संघर्ष.

पुलिस और बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स अक्सर इन्हें भारत में 'ग़ैरक़ानूनी घुसपैठ' के आरोप में परेशान करते रहते हैं.

लेकिन चारों ओर से भारत से घिरे होने की वजह से इन लोगों के पास 'घुसपैठ' के अलावा कोई चारा भी नहीं होता.

पोयतुकुथि की एक गृहणी मोयमना ख़ातून कहती हैं, "हमें ज़रूरत का सारा सामान नज़दीकी भारतीय बाज़ारों से मिलता है. हम वहां अपना सामान भी बेचते हैं. हम भारतीय सीमा में जाने से बच ही नहीं सकते".

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लेकिन जल्द ही यह सब इतिहास हो जाएगा. कुछ एन्कलेव वासियों का तो कहना है कि उन्हें कुछ आज़ादी मिलने भी लगी है.

मध्य मसालडांगा की जोयनाल अबेदीन कहती हैं, "उस शाम (6 जून) को जब एलबीए के दस्तावेज़ों की अदला-बदली हो गई उसके बाद पहली बार मैं अपने गांव से बिना किसी डर के बाहर निकली".

इस समझौते से लोगों को अपनी नागरिकता चुनने की आज़ादी मिली है.

भारत-बांग्लादेश में सुविधाएं

भारत-बांग्लादेश एन्कलेव आदान-प्रदान संयोजन समिति के सचिव दीप्तिमैन सेनगुप्ता ने बीबीसी से कहा कि पूर्व बांग्लादेशी एन्कलेव के सभी निवासियों ने यहीं रहने का फ़ैसला किया है.

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उनके दावे का गांववालों ने भी समर्थन किया.

मोयमना ख़ातून कहती हैं, "हम यहां पीढ़ियों से रह रहे हैं. हमारे रिश्तेदार, दोस्त सब यहीं हैं. हम मुख्यधारा के लोगों के साथ बरसों से सौहार्द के साथ रह रहे हैं. अब हम यह सब छोड़कर कहीं और क्यों जाएं"?

मोयमना के मां-पिता भी मुख्य भारत से ही थे. 1977 में एन्कलेव निवासी से शादी होने के बाद ही वह पोयातुरकुथी आई थीं.

संयोजन समिति, जिसमें एन्कलेव और मुख्यधारा दोनों के ही लोग हैं, 1994 से ही सीमा के सत्यापन के लिए आंदोलन चला रही है.

सीमापार से मिल रहे संकेतों के अनुसार पूर्व भारतीय एन्कलेवों के 700 लोग अपनी भारतीय नागरिकता को क़ायम रखते हुए पश्चिम बंगाल में रहने आ सकते हैं.

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कूच बिहार ज़िला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया इस साल के नवंबर तक पूरी हो सकती है.

केंद्र ने इन अविकसित 'द्वीपों' के विकास के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को 33 अरब रुपये का एक पैकेज देने का प्रस्ताव दिया है.

लेकिन बांग्लादेश की कोशिश है कि ज़्यादातर एन्कलेव निवासी वहीं बने रहें, ख़ासकर हिंदू.

अवामी लीग के नेता अनवर हुसैन कहते हैं, "अगर हिंदू भारत चले गए तो हमारी धर्मनिरपेक्षता को कमज़ोर माना जाएगा. हम चाहते हैं कि हिंदू हमारे देश में ही रहें, भारत न जाएं".

भावना नहीं सुविधा

एन्कलेव के कुछ निवासियों के लिए राष्ट्रीयता और नागरिकता का मुद्दा भावना नहीं सुविधा से तय हो रहा है.

बिप्लब हुसैन की रुचि भी बांग्लादेश में स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं में ही है, जिनसे वह अब तक वंचित रहे हैं.

लोगों के लिए यह भावनाओं से ज़्यादा जीवनयापन का सवाल है.

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लोग कहते हैं कि जो भी आकर्षक पुनर्वास की व्यवस्था करेगा एन्कलेव निवासी वहीं जाएंगे.

(सुबीर भौमिक के साथ पश्चिम बंगाल के कूच बिहार से समीर पुरकायस्थ और बांग्लादेश के कुरहिग्राम से सुलेमान निलोय)

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