नए भारतीय जिन्हें नागरिक बनने में लगे 68 साल

मंसूर अली

"हम यहाँ हैं, इस नक़्शे पर यहां देखिए."

मोहम्मद मंसूर अली की सफ़ेद दाढ़ी दोपहर की रोशनी में चमक रही थी, वे एक पीले पड़ रहे कागज़ पर उंगली रखकर दिखाते हैं.

"यह बांग्लादेश है और हमारे चारों ओर यह भारत है."

74 साल के अली भारत के पूर्वी प्रांत पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी एन्कलेव (विदेशी क्षेत्र) पुआतूरकुथी में रहते हैं.

जो दस्तावेज़ वो मुझे दिखा रहे हैं, वो 1931 का लैंड रिकॉर्ड है. उस समय वहां अंतिम बार ज़मीन का सर्वे हुआ था.

"तब हम ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा थे. देखिए मेरे पास हमारे परिवार के हक़ का असली दस्तावेज़ है, जिस पर सम्राट जॉर्ज पंचम की मुहर लगी है. हमारे पास पूर्वी पाकिस्तान और बांग्लादेश के भी दस्तावेज़ हैं, लेकिन भारत का कोई दस्तावेज़ नहीं है."

राष्ट्रविहीन नागरिक

अली उन तक़रीबन पचास हज़ार नागरिकों में से हैं जो पिछली दो शताब्दियों से चली आ रही इस भौगोलिक विसंगति में रहते हैं.

वे ज़मीन को उन छोटे हिस्सों या एनक्लेवों में रहते हैं जो हैं तो एक देश के, लेकिन बसे हुए हैं दूसरे देश के भीतर.

Image caption उनके पास ब्रितानी राज के समय के दस्तावेज़ भी हैं.

ये इनक्लेव 18वीं सदी में राजाओं के समझौतों के कारण अस्तित्व में आए.

लेकिन भारत, पाकिस्तान और अंत में बांग्लादेश को आज़ादी मिलने के बाद भी ये एंक्लेव जैसे थे वैसे ही बने रहे. यहां रहने वाले लोग प्रभावी रूप से राष्ट्रविहीन ही रहे.

एक और एनक्लेव मोशालदांगा में रहने वाले ज़ैनल आबेदीन कहते हैं, "वे हमें पूरी तरह भूल गए."

ठोकरें खाते रहे

ज़ैनल आबेदीन कहते हैं, "हम सालों भारत और बांग्लादेश के बीच फ़ुटबॉल बने रहे, जिसे दोनों देश ठोकरें मारते रहे."

अब दोनों देशों की सरकारें एनक्लेव की अदलाबदली पर राज़ी हो गई हैं. यानी भारत में बांग्लादेशी एन्कलेव अब भारत का हिस्सा होंगे और बांग्लादेश में भारतीय एन्केलव अब बांग्लादेश के होंगे.

मंसूर अली कहते हैं, "मैंने तीन देशों की आज़ादी देखी है. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश."

"लेकिन हम स्वयं कभी स्वतंत्र नहीं रहे. हमें स्वतंत्र होने में 68 साल और लगे."

जल्द 'ख़त्म होगी ये ज़िल्लत भरी ज़िंदगी'

पोतूरकुथी भारत-बांग्लादेश सीमा से सिर्फ़ सात किलोमीटर दूर है. लेकिन चारों और भारत से घिरे होने की वज़ह से यहाँ के लोग उस देश नहीं जा सकते जहाँ के वे नागरिक हैं.

इसी वज़ह से उन्हें बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल जैसी सार्वजनिक सेवाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं.

अली कहते हैं, "रात को हम अपने घरों में मिट्टी के तेल से लालटेन जलाते हैं."

ज़रूरतों के लिए उन्हें एनक्लेव से बाहर जाना पड़ता है, जो अपने आप में एक अलग समस्या है.

पहचान का सवाल

Image caption ये लोग बांग्लादेश के नागरिक तो थे लेकिन इनके पास कोई सुविधाएं नहीं थीं.

आलमगीर हुसैन कहते हैं, "हमारे पास कोई पहचान पत्र नहीं है."

लिहाज़ा, वे हर समय गिरफ़्तारी के डर के साए में रहते हैं क्योंकि उनके पास कोई भी वैध दस्तावेज़ नहीं है.

इसका एक ही समाधान था-धोखाधड़ी से दस्तावेज़ बनवाना है.

आलमगीर कहते हैं, "हम किसी भारतीय को पकड़ते हैं और उससे अपने परिजन होने का नाटक करने के लिए कहते हैं."

"ऐसा करके ही हमें स्कूल या अस्पतालों में दाख़िले मिलते हैं."

पोतूरकुथी के मुख्य चौराहे पर बैठे लोग चर्चा कर रहे हैं.

भारत और बांग्लादेश के बीच हुए समझौते के नतीजे में यह एनक्लेव शनिवार को भारत में शामिल होने जा रहा है. वे इसी पर चर्चा कर रहे हैं.

जंगल सा जीवन

जैनल आबेदीन कहते हैं, "इतने सालों से हम किसी जंगल में रह रहे थे."

"अब जब हमारा विलय हो रहा है तो हम वो सभी सुविधाएं हासिल करना चाहेंगे जो नागरिकों को मिलती हैं."

Image caption लोग सरकारी अधिकारी से नई सुविधाओं के विषय में पूछते हैं.

उनकी बात ख़त्म होते होते लालबत्ती लगी एक गाड़ी आकर वहां रुकती है. वहां गतिविधियां और तेज़ हो जाती हैं.

ज़िले के अधिकारी कृष्णाभा घोष आए हैं.

भारत, या बांग्लादेश! कहां बनाएं आशियाना!

गांव वाले उनके लिए कुर्सी लेकर आते हैं और वो भी बातचीत में शामिल हो जाते हैं. जल्द ही एक ट्रे में चाय भी आ जाती है.

वे यहां हस्तांतरण का कामकाज देखने आए हैं.

सुविधाओं का सवाल

ज़िला अधिकारी कहते हैं, "यहां एक समारोह होगा और भारत का झंडा फ़हराया जाएगा. इस इतिहास को बनते देखना मेरे लिए भी रोमांचक है."

लेकिन गाँव वालों के पास चर्चा करने के लिए कुछ और बड़े मुद्दे हैं.

Image caption ये स्कूली बच्चे भारत के नए नागरिक होंगे.

एक पूछता है, "हमें अपने पहचान पत्र कब तक मिलेंगे ?"

वे अधिकारी से पूछते हैं, "स्कूल कब तक बनेगा और बिजली कब तक आएगी ?"

घोष उनसे उनकी मांगों की सूची बनाने के लिए कहते हैं और दोबारा लौटने का वादा करते हैं. अब वे भी उनकी ज़िम्मेदारी का हिस्सा हैं.

नए भारतीय

एनक्लेव के स्कूल के भीतर बच्चों का एक समूह भारत के राष्ट्रगान का अभ्यास कर रहा है.

वे अभी इसमें पारंगत नहीं है और शिक्षकों की मदद से रट रहे हैं.

आँखों में चमक लिए बच्चों की ओर इशारा करते हुए मंसूर अली कहते हैं, "मेरे पूर्वज चले गए, मैं भी चला जाऊंगा लेकिन कम से कम ये तो आज़ाद रहेंगे."

"इनके पास नागरिकों के सभी अधिकार होंगे. ये एक सम्मानजनक पहचान के साथ जी सकेंगे."

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