'मुझ पर रहम करिए, मेरा क्लाइंट मरने वाला है'

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आख़िरकार याक़ूब मेमन को सुबह फाँसी की सज़ा हो गई. पत्रकार रात भर सुप्रीम कोर्ट के बाहर जमावड़ा लगाए हुए थे और काफ़ी गहमागहमी का माहौल था.

इसी बीच याक़ूब मेमन के वकील आनंद ग्रोवर जब गुरुवार सुबह कोई साढ़े पाँच बजे बाहर आए तो ज़ाहिर है कि पत्रकारों के पास उनके लिए कई सवाल थे.

लेकिन जिस तरह के सवालों की बौछार आनंद ग्रोवर पर हुई उसने कई लोगों को ज़रूर विचलित किया.

मसलन एक पत्रकार ने पूछा, “बताएँ आपने याक़ूब मेमन के बचाव के लिए कितने पैसे लिए”. तो किसी ने कहा क्या ये सब आप पब्लिसिटी के लिए कर रहे हैं ?

सवालों के लहज़े और बर्ताव में एक तरह की झल्लाहट और अशिष्टिता थी. टीवी पर ये सब देखते हुए ऐसा लगा मानो ख़ुद आनंद ग्रोवर की ही सुनवाई कुछ पत्रकार कर रहे हों.

ये कैसा बर्ताव

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सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, इसमें ख़ुद पत्रकार भी शामिल हैं. पत्रकार रुचिका तलवार ने ट्विटर पर लिखा, “वो टीवी रिपोर्टर कौन था जिसने आनंद ग्रोवर से पूछा कि उन्होंने याक़ूब का केस लड़ने के लिए कितने पैसे लिए. सार्वजनिक रूप से उनको शर्मसार करना चाहिए.”

वहीं पत्रकार स्मिता शर्मा ने लिखा, “स्टूडियो में बैठे हुए इन सवालों को सुनकर शर्मिंदा सी हूँ. ये लोग लंपटों की तरह बर्ताव कर रहे हैं.”

वहीं@toralvaria ने लिखा, “क्या मैंने सच में ये सुना कि एक रिपोर्टर ने आनंद ग्रोवर से पूछा कि उन्होंने कितनी फ़ीस ली. विश्वास नहीं हो रहा.”

याक़ूब को फाँसी दिया जाना सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला है और इस फ़ैसले का पालन भी किया गया. लेकिन जिस तरह से याक़ूब मेमन की वकालत करने वाले वकील की सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग हो रही है वो कई सवाल खड़े करती है.

'रहम कीजिए'

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भारत की न्याय व्यवस्था अभियुक्तों को ये अधिकार देती है कि वो वकील के ज़रिए मुकदमों में अपना पक्ष रखे.

लेकिन सोशल मीडिया पर आई कई प्रतिक्रियाएँ कुछ और दर्शाती हैं. मसलन @drs24 नाम से डीआर चौधरी लिखते हैं, “बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया प्रशांत भूषण, युग चौधरी, नित्य रामकृष्ण और आनंद ग्रोवर का प्रैक्टिस करने का लाइसेंस बंद करे. या @jemin जिन्होंने लिखा है, “आनंद ग्रोवर नाम का जोकर याक़ूब का पक्ष रख रहा है.”

न्याय व्यवस्था में अभियुक्तों के लिए जिरह करना वकील का काम है और उसके तर्कों से सहमत-असहमत हुआ जा सकता है. ग़ुस्सा दोषी करार दिए गए अभियुक्त को लेकर हो सकता है लेकिन अपना काम करने के लिए वकील के साथ ‘दोषियों’ जैसा बर्ताव करना कहाँ तक सही माना जा सकता है?

याक़ूब के वकील की स्थिति शायद इसी बात से समझी जा सकती है जब उन्होंने आख़िरकार पत्रकारों से कहा, “मुझ पर रहम कीजिए, मेरा क्लाइंट थोड़ी देर में मरने वाला है.”

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