बेहतरीन चार्टर्ड अकाउंटेंट में शुमार थे याक़ूब

  • 30 जुलाई 2015
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एक समय याक़ूब मेमन को मुंबई में मेमन समुदाय का सबसे अच्छा चार्टर्ड अकाउंटेंट माना जाता था. अब्दुल रज़्ज़ाक़ मेमन के छह बेटों में याक़ूब तीसरे नंबर पर हैं. अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाई करने वाले याक़ूब ने बीकॉम किया और 1990 में चार्टर्ड अकाउंटेंट की परीक्षा पास की.

एक साल बाद याक़ूब ने अपने बचपन के दोस्त चेतन मेहता के साथ मिलकर मेहता एंड मेमन एसोसिएट्स नाम की कंपनी खोली. लेकिन एक साल बाद ही दोनों के रास्ते बदल गए और याक़ूब ने एआर एंड सन्स नाम से अलग कंपनी खोली. याक़ूब ने अपनी कंपनी का नाम अपने पिता की याद में रखा.

याक़ूब की ये कंपनी इतनी सफल हुई कि मुंबई के मेमन समुदाय ने उन्हें बेस्ट सीए का पुरस्कार तक दिया. इसके बाद याक़ूब ने एक्सपोर्ट में अपना हाथ आज़माया और मांस के निर्यात के लिए तिजारत इंटरनेशनल नाम से कंपनी बनाई. ये कंपनी खाड़ी और मध्य पूर्व के देशों में मांस निर्यात करती थी.

कम समय में याक़ूब के इसमें काफ़ी सफलता मिली और माहिम के अल हुसैनी बिल्डिंग के छह फ्लैट्स में उन्होंने निवेश किया.

बाद में 1993 के बम धमाकों के मामले में याक़ूब को साज़िश रचने और वित्तीय सहायता देने का दोषी पाया गया.

पढ़ें - याक़ूब मामले की सुनवाई: कब कब क्या क्या हुआ

याक़ूब का सफ़र

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मुंबई बम धमाकों के दो दिन पहले ही याक़ूब अपने पूरे परिवार के साथ मुंबई से भाग गए.

मीडिया रिपोर्ट के मुताब़िक ऐसा माना जाता है कि जुलाई 1994 में याक़ूब ने काठमांडू में अपने परिवार के वकील से मुलाक़ात की लेकिन उन्हें बताया गया कि अगर उन्होंने आत्मसमर्पण किया, तो उन्हें शायद कोई राहत नहीं मिलेगी. ऐसा कहा जाता है कि याक़ूब कराची रवाना होने वाले थे, जहाँ पिछले एक साल के वे एक घर में नज़रबंद थे.

लेकिन काठमांडू एयरपोर्ट पर याक़ूब को कई पासपोर्ट के साथ पकड़ लिया गया. आधिकारिक रूप से ये बताया गया कि याक़ूब को पाँच अगस्त 1994 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ़्तार किया गया.

कथित तौर पर ऐसी रिपोर्ट भी सामने आई जिनमें कहा गया था कि याक़ूब ने कोई समझौता किया है और उन्हें यह भरोसा दिलाया गया है कि मुक़दमे के दौरान उनके साथ नरमी बरती जाएगी. याक़ूब ने हमेशा यही कहा कि वो इस मामले में निर्दोष है और उन्हें मुंबई बम धमाकों की कोई जानकारी नहीं थी.

एक इंटरव्यू में याक़ूब ने ये कहा कि पाकिस्तान पहुँचने के बाद उन्हें मुंबई बम धमाकों की साज़िश का पता चला.

27 जुलाई 2007 को टाडा कोर्ट के जज पीडी कोडे ने याक़ूब को मौत की सज़ा सुनाई.

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