'फेसबुक रिपोर्टर' ने उठाई एनक्लेव की मुश्किलें

  • 1 अगस्त 2015
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भारत और बांग्लादेश ने एक दूसरे की सीमा के अंदर मौजूद एनक्लेव की अदला-बदली कर ली है.

ज़मीन के वे हिस्से जो एक देश के हैं लेकिन किसी और देश की सीमा के अंदर हैं, उनमें पिछले छह दशकों से विकास की रफ़्तार बहुत धीमी रही है.

ग़ौरतलब है कि हज़ारों बांग्लादेशी भारत में बने 51 एनक्लेव में रह रहे थे. दूसरी ओर, बांग्लादेश में मौजूद 111 एनक्लेव हज़ारों भारतीयों का बसेरा थे.

दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत भारतीय सीमा में मौजूद बांग्लादेशी एनक्लेव पर भारत का शासन होगा, उसी तरह बांग्लादेश में मौजूद भारतीय एनक्लेव बांग्लादेश के तहत होंगे.

इसके साथ ही इन एनक्लेव में रहने वाले लोगों को नागरिकता चुनने का भी मौका दिया जाएगा. उनके पास यह मौका 31 जुलाई की आधी रात तक ही होगा.

'फ़ेसबुक रिपोर्टरों' से मिली जानकारी

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कुछ 'फ़ेसबुक रिपोर्टर' की वजह से इन जगहों के बारे में जानकारी जुटा पाना संभव हो पाया.

ऐसे ही एक 'फेसबुक रिपोर्टर' सद्दाम मियां और उनकी टीम ने 2013 से इन एनक्लेवों से जुड़े दुख, उपेक्षा, अपराध और दसरी बातों की जानकारी लोगों तक पहुंचाई.

सद्दाम कहते हैं, ''दशकों की कोशिशों के बाद यहां के लोगों की मुश्किल अब ख़त्म होने वाली है. मुख़्यधारा की मीडिया ने भी इन लोगों को कोई तवज्जो नहीं दी, जिससे इन लोगों पर अपनी पहचान बचाने तक का संकट बन गया.''

उन्होंने कहा, ''हमारे बीच कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने कॉलेज की जो डिग्रियां ली हैं वो फर्जी काग़ज़ातों पर हैं. इसकी वज़ह यह है कि हम भारत में रहने के बावजूद भारतीय नागरिक नहीं थे.''

सद्दाम जैसे लोगों ने इन मुश्किलों को सोशल मीडिया की मदद से सबके सामने लाने का मन बनाया.

उन्होंने 'भारत बांग्लादेश एनक्लेव एक्सचेंज कॉर्डिनेशन कमेटी' की मीडिया सेल के तहत काम किया.

फ़ेसबुक पर शुरू की मुहिम

इस समूह ने एक फ़ेसबुक पेज बनाया और यहां रहने वालों से 'फ़ेसबुक रिपोर्टर' बनने की अपील की.

साथ ही इनका संगठन फ़ेसबुक पर स्वच्छता, आपराधिक गतिविधियों और स्वास्थ्य सेवा के अभाव के मुद्दे को उठाने लगा, जिससे यह मीडिया की नज़रों में आया.

सद्दाम के साथी रोशन सरकार कहते हैं, ''इन एनक्लेवों में रहना आसान नहीं है. हमारे पास मूलभूत सुविधाएं तक नहीं है, लेकिन किसी देश की नागरिकता न होना सबसे बड़ी मुश्किल है.''

अब आगे क्या

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इन एनक्लेव की अदला-बदली होने के बाद इन 'फेसबुक रिपोटरों' के पास क्या काम रह जाएगा?.

रोशन कहते हैं, ''ऐसा नहीं है कि इस बदलाव के बाद हमारा काम ख़त्म हो जाएगा. इसके बाद भी यहां बहुत कुछ है, जो किया जाना है.''

उन्होंने बताया, ''60 वर्षों से हम लोगों की अनदेखी होती आई है. इसकी भरपाई कुछ दिनों में तो नहीं हो सकती. यह एक ख़ुशी का वक़्त है, लेकिन अभी मुश्किलों का समाधान निकलना बाकी है.''

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