फ़ारस से आया ये 'ख़याल'

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बचपन से ही संगीत के माहौल में पले-बढ़े मधुप मुद्गल को कई नामचीन हस्तियों का सानिध्य प्राप्त हुआ. कुमार गंधर्व के शिष्य रहे मधुप मुद्गल की गायन शैली मुख्य रूप से ख़याल व भजन है.

प्राचीन काल में प्रबंध और रूपक दो प्रकार की गायन शैलियां प्रचलित थी, प्रबंध शैली से ध्रुपद का विकास हुआ और रूपक से ख़याल और ठुमरी का.

मधुप मुद्गल का पर आधारित वीडियो यहाँ देखें

मधुप के परिवार में लगभग सभी सदस्य संगीत व नृत्य से जुड़े हुए हैं.

उनकी बहन माधवी मुद्गल प्रसिद्ध ओड़िसी नृत्यांगना हैं, तो बेटी आरुषी (ओड़िसी नृत्यांगना) व सावनी (संगीतकार) भी अपनी पारिवारिक धरोहर को आगे ले जा रही हैं.

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मधुप ने संगीत के अलावा नृत्य संगीत के लिए भी 50 से ज्यादा बंदिशों की रचना की है.

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यह भी माना जाता है कि ख़याल, फ़ारस से आया है पर मधुप जी को लगता है इसकी जड़ें हिंदुस्तान में ही हैं.

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वो कहते हैं संगीत के लिए समर्पित होकर ही आप उसे साध सकते हैं.

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ख़याल के अस्थायी और अंतरा दो भाग हैं. गायक पहले बंदिश बाँधकर अलाप और तान के ज़रिए स्वर का विस्तार करता है और फिर धीरे-धीरे राग को उभारता है.

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मधुप कहते हैं, संगीत में वह शक्ति है कि वह आत्मा को परमात्मा स्वरूप दिखा सकता है.

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मधुप कहते हैं मैं भाग्यशाली हूं कि मेरा शौक़ और व्यवसाय एक ही हैं.

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मधुप तानपुरे को संगीत का अभिन्न अंग मानते हैं, उनके अनुसार हर संगीतज्ञ को तानपुरे के तार ठीक से मिलाने आने चाहिए.

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तानपुरा या तम्बूरा भारतीय संगीत का लोकप्रिय वाद्य यंत्र है.

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मधुप कहते हैं कि किसी भी कलाकार को यह नहीं कहना चाहिए कि मैंने यह रचना की, जबकि यह कहना चाहिए मुझसे यह रचना बन गई.

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उनका मानना है कि संगीत में नए प्रयोग होने चाहिए तभी पता चलेगा उसकी अनंत संभावनाएं क्या हैं?

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