सभ्य देश में जल्लाद, लज्जा की बात: वरुण

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भारतीय जनता पार्टी सांसद वरुण गांधी ने मौत की सज़ा पर सवाल उठाए हैं. उन्होने अंग्रेज़ी पत्रिका आउटलुक में लेख लिखकर कहा है कि दुनिया के बदलते माहौल को देखते हुए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत को समझना चाहिए कि मौत की सज़ा समस्या का समाधान नहीं है.

वरूण गांधी ने ये लेख ऐसे समय में लिखा है जब 1993 में हुए मुंबई धमाकों के दोषी याक़ूब मेमन को फ़ासी दी गई है और मौत की सज़ा के मुद्दे पर भारत में ख़ासी बहस हो रही है.

इससे पहले भाजपा के ही एक दूसरे सांसद और फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिंहा ने याक़ूब मेमन की दया याचिका पर दस्तख़्त किए थे. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा था कि ऐसा करके शत्रुध्न सिंहा ने पार्टी को शर्मिंदा किया है.

Image caption शत्रुघ्न पहले भी विवादित बयान दे चुके हैं.

जेटली का कहना था, ''मेरा मानना है कि यह बहुत दुखद है कि भाजपा का एक सदस्य ऐसी याचिका पर हस्ताक्षर करता है.''

'सामाजिक-आर्थिक भेदभाव'

वरूण गांधी ने अपने लेख में याक़ूब मेमन की फांसी का कोई ज़िक्र नहीं किया है. लेकिन उन्होंने लिखा है, "किसी भी सभ्य देश में जल्लाद का होना लज्जा की बात है...."

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि फांसी की सज़ा पाने वालों में सामाजिक-आर्थिक भेदभाव साफ़ नज़र आता है.

अमरीका का ज़िक्र करते हुए वरूण गांधी ने लिखा है कि मौत की सज़ा पाने वालों में 56 फ़ीसदी लोग काले या हिस्पैैनिक हैं.

जबकि उनके अनुसार भारत में फांसी की सज़ा पाने वालों मेंं 94 फ़ीसदी लोग दलित या अल्पसंख्यक हैं.

उनके अनुसार भारत में अच्छे वकील न होने और संस्थागत भेदभाव के कारण ही दोषियों को फांसी की सज़ा दी जाती है.

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Image caption फांसी का विरोध

वरूण गांधी के अनुसार 1983 में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया था कि सिर्फ़ जघन्य मामलों में ही फांसी की सज़ा दी जानी चाहिए लेकिन भारतीय न्याय प्रणाली में जघन्य अपराध की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है जिसके कारण ये जजों की निजी राय और उनके सामाजिक-राजनीतिक विश्वास पर निर्भर करता है कि वो किसको फांसी देंगे और किसको नहीं.

उन्होंने कहा कि इसी अनिश्चितता और विरोधाभास के कारण कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कुछ जजों ने राष्ट्रपति से 13 लोगों की फांसी की सज़ा माफ़ किए जाने की लिखित अपील की थी.

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