रसगुल्ले को लेकर भिड़े बंगाल और ओडिशा

  • 3 अगस्त 2015
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भारत की मशहूर मिठाई रसगुल्ले का जन्म कहां हुआ, इसे लेकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच विवाद छिड़ गया है.

ताज़ा विवाद तब शुरू हुआ जब ओडिशा सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 5 पर कटक और भुवनेश्वर के बीचोंबीच स्थित पाहाल में मिलने वाले मशहूर रसगुल्ले को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी 'जी आई' मान्यता दिलाने के लिए कोशिशें शुरू कीं.

जियोग्राफिकल इंडिकेशन वो चिन्ह है जो किसी उत्पाद पर उस स्थान विशेष की पहचान बताने के लिए लगाया जाता है.

इससे ये भी पता चलता है कि ये उत्पाद उस जगह की क्या विशेषता लिए हुए है.

बंगाल, अब ओडिशा के इस दावे को चुनौती देने के लिए जुट गया है.

बंगाल का दावा

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बंगाल के मशहूर रसगुल्ला निर्माता केसी दास के वारिस राज्य के ही मशहूर इतिहासविद् हरिपद भौमिक की मदद से ऐसे तथ्य जुटाकर एक बुकलेट तैयार करा रहे हैं जो रसगुल्ले की पैदाइश बंगाल में होने की पुष्टि करेगी.

उसके बाद इस बुकलेट को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने की योजना है.

बंगाल का हमेशा से दावा रहा है कि रसगुल्ला बंगाल की देन है. लेकिन अब ओडिशा ने इस दावे को यह कहकर चुनौती दी है कि साल 1868 में बंगाल में रसगुल्ले के आविष्कार से डेढ़ सौ साल पहले इस रसीली मिठाई का जन्म पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में हुआ.

किसका रसगुल्ला

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इस विषय पर शोध करने वाले कई विशेषज्ञों का कहना है कि 'नीलाद्रि वीजे' (रथ यात्रा के बाद जिस दिन भगवान जगन्नाथ वापस मंदिर में आते है) के दिन भगवान जगन्नाथ के देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए रसगुल्ला पेश करने की परंपरा कम से कम तीन सौ साल पुरानी है.

मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ रथयात्रा से वापस आते हैं तो महालक्ष्मी उनसे नाराज़ रहती हैं और महल का दरवाज़ा नहीं खोलतीं क्योंकि जगन्नाथ उन्हें अपने साथ नहीं ले गए होते.

तब रूठी देवी को मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ला पेश करते हैं.

जगन्नाथ संस्कृति के जाने माने विशेषज्ञ सूर्य नारायण रथ शर्मा तो दावा करते है कि यह परंपरा एक हज़ार साल पुरानी है.

जादवपुर विश्वविद्यालय के खाद्य तकनीक और बायोटेक्नॉलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर उत्पल रायचौधुरी के मुताबिक़, "यह परंपरा तेरहवीं शताब्दी से चली आ रही है."

बंगाली पकवानों पर शोध करने वाली पृथा सेन का कहना है कि रसगुल्ला ओडिशा में पैदा हुआ और 18वीं सदी में ओडिशा के रसोइयों के ज़रिए बंगाल पहुंचा.

भुवनेश्वर के रहने वाले सागर सतपथी इस लड़ाई को ये कहते हुए विराम देते हैं कि, "रसगुल्ला चाहे जहां पैदा हुआ हो, केवल उसका स्वाद ही मायने रखता है."

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