मौद्रिक नीति: रेपो रेट, सीआरआर में बदलाव नहीं

  • 4 अगस्त 2015
इमेज कॉपीरइट AFP

भारत के रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा की है.

आरबीआई ने रेपो रेट में कोई कटौती नहीं की है और ये 7.25 फ़ीसदी और सीआरआर 4 फ़ीसदी पर स्थिर रहेगा.

उद्योग जगत नीतिगत दरों में कटौती की मांग कर रहा था क्योंकि थोक मूल्य आधारित मुद्रास्फ़ीति कम है और औद्योगिक वृद्धि में नरमी है.

लेकिन ज़्यादातर विशेषज्ञ को कम ही उम्मीद थी कि आरबीआई ऐसा कुछ करेगी.

मौद्रिक नीति और ब्याज दर

दर असल आरबीआई की मौद्रिक नीति के आधार पर बैंकों की ब्याज दरें तय होती हैं.

और आम आदमी का इससे ये संबंध होता है कि उसके बैंकों से लिए क़र्ज़ों की ईएमआई की दरें, ब्याज दरों के अनुसार ही बढ़ती या घटती हैं. अगर ब्याज दरें कम होंगी तो आम आदमी को फ़ाय़दा होता है.

जाने माने अर्थशास्त्र विशेषज्ञ आलोक पुराणिक के अनुसार पिछले कुछ समय में महंगाई घटने के बावजूद रिज़र्व बैंक इससे बहुत संतुष्ट नहीं दिखाई दे रहा है, और रिज़र्व बैंक को नहीं लगता कि महंगाई इतनी कम हो गई है कि ब्याज दरें भी कम कर दी जाएं.

सरकार से मतभेद!

इमेज कॉपीरइट Reuters

जानकार मानते हैं कि केंद्र सरकार का रिज़र्व बैंक पर काफ़ी दबाव है कि वो महंगाई पर नियंत्रण लगाए.

लेकिन रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने इस बात से इन्कार किया कि ब्याज दरों को लेकर सरकार और रिज़र्व बैंक में कोई गतिरोध है.

आलोक पुराणिक कहते हैं, ''रिज़र्व बैंक अपने आप में एक स्वायत्त संस्था है. वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि आरबीआई के बोर्ड में होते हैं. लेकिन महत्वपूर्ण फ़ैसलों को लेने के लिए गवर्नर स्वतंत्र होते हैं.

पुराणिक के अनुसार, ''सरकार का दृष्टिकोण हमेशा राजनीतिक होती है. उसकी कोशिश होती है कि ब्याज दरें कम हो जाएं ताकि वो कह सके कि उसने ईएमआई कम करा दी. आरबीआई की दृष्टि आर्थिक होती है. रिज़र्व बैंक के गवर्नर कभी नहीं चाहेंगे कि उनके कार्यकाल को ऐसे याद किया जाए कि वो महंगाई बढ़ाकर गए.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)