'सोनिया का हमला: ताक़त कम, कमज़ोरी ज़्यादा'

  • 5 अगस्त 2015
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मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का सामने आना और नरेंद्र मोदी पर हमला करना मां-बेटे की ताक़त नहीं, कमज़ोरी दिखाता है.

सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी से जो पांच प्रश्न पूछे हैं उसके पीछे भी कांग्रेस में नेतृत्व का पुराना सवाल ही है.

आख़िर सोनिया की भूमिका क्या है? वो कांग्रेस की सेनापति हैं या फिर भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ लड़ाई वैसे लड़ी जाएगी जैसे राहुल चाहेंगे?

किसकी ज़िम्मेदारी?

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पार्टी के भीतर यह बात तरह पूरी तरह साफ़ नहीं है कि यह काम पूरी तरह राहुल को सौंपा गया है या यह ज़िम्मेदारी बंटी हुई है. कोई नहीं जानता कि नेतृत्व और अंतिम फ़ैसला आज भी सोनिया का होता है या नहीं.

इस सवाल पर पार्टी के भीतर ख़ूब विचार हुआ है. कई बार सवाल भी उठे हैं, लेकिन सवाल जस का तस बना हुआ है.

राहुल अगर आगे आ सड़क से संसद तक की लड़ाई लड़ रहे हैं तो सोनिया गांधी को सामने आ कर हमला बोलने की ज़रुरत क्यों पड़ी?

नेतृत्व का सवाल

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इस वजह से राज्यों में नेतृत्व का सवाल हल नहीं हो पा रहा है. पंजाब में अमरिंदर सिंह की क्या भूमिका होगी, हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा की कितनी सुनी जाएगी या मध्य प्रदेश में अगला चुनाव दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में होगा या ज्योतिरादित्य के, यह भी साफ़ नही है.

यह सवाल कांग्रेस के केंद्र में नेतृत्व के सवाल के सुलझे बिना नहीं हल होंगे.

राहुल की भूमिका

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कांग्रेस में आज भी किसी को कोई काम होता है तो वह सीधे सोनिया गांधी से मिलता है. जो राहुल को जानता है वो उनसे भी मिलता है. पर किस मुद्दे पर अंतिम निर्णय किसका होगा, यह कोई नहीं जानता.

मुझे लगता है कि सोनिया पूरी ज़िम्मेदारी राहुल पर तभी छोड़ेंगी जब उन्हें पूरा यक़ीन हो जाएगा कि वो सहयोगियों से बात कर सकते हैं और पार्टी को संभाल सकते हैं.

वैसे अगर ईमानदारी से कहा जाए तो नरेंद्र मोदी की टक्कर का नेता कांग्रेस के पास नहीं है. न सोनिया न राहुल ही मोदी के क़द के नेता हैं.

राहुल किसानों से मिलें या एफ़टीटीआई के छात्रों से, ज़्यादा तीखे तेवर के साथ काम करें, प्रियंका को सामने लाया जाए या दोनों भाई बहन मिल कर काम करें. ये सब एक सीमा से ज़्यादा कारगर नहीं होगा.

सवाल संगठन का

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इन सबसे पार्टी को प्रचार मिल सकता है, लेकिन चुनाव नहीं जीते जा सकते. चुनाव जीतने के लिए संगठन चाहिए, जो कांग्रेस के पास बचा नहीं है.

एक बात दिखती है कि राहुल गांधी और बाक़ी कांग्रेस नेता चाहे जो बोलें, पर उन्हें इसका अहसास है कि यह कांग्रेस पांच या दस साल पहले वाली कांग्रेस भी नहीं है.

राहुल से यह बात छुपी हो, ऐसा नहीं लगता है. जिस तरह वे बिहार और बंगाल में मोर्चा संभालने से बच रहे हैं या उत्तर प्रदेश में सीधे मुलायम सिंह यादव से भिड़ने से कतरा रहे हैं, उससे साफ़ है कि वो यह समझ चुके हैं कि नरेंद्र मोदी को कमज़ोर करना इस वक़्त ज़्यादा ज़रूरी हैं. चाहे उसके लिए उन्हें दोयम दर्जे की भूमिका ही क्यों ना चुनना पड़े.

कांग्रेस की उपलब्धियां

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रही बात इस संसद सत्र की, तो कांग्रेस कुछ उपलब्धियां तो अपने खाते में गिना ही सकती है. सरकार भूमि अधिग्रहण बिल पर झुकती दिख रही है और जीएसटी अटका पड़ा है.

लेकिन अगले सत्र में यह रणनीति नहीं चल सकती.

संसद के अगले सत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की रणनीति बिहार चुनाव के नतीजों से तय होगी.

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