न रिश्वत दी, न सरकारी मदद ली: अंशु गुप्ता

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अपने काम के लिए इस साल मैग्सेसे पुरस्कार जीतने वाले अंशु गुप्ता का कहना है कि उन्होंने अपनी संस्था का काम बिना सरकारी मदद के सिर्फ लोगों के सहयोग से चलाया है और कपड़े को सम्मान से जोड़कर एक नई सोच विकसित करने की कोशिश की है.

गूगल हैंगआउट के लिए बीबीसी हिंदी के स्टूडियो आए अंशु गुप्ता ने कहा, "मैने कभी कपड़े को चैरिटी से जोड़कर नहीं देखा. गाँव के लोगों की सबसे बड़ी ताकत है उनका आत्मसम्मान. तो वो चैरिटी क्यों लें. आप किसी को थोड़ी देर भूखा बिठा दो तो वो बैठ लेगा लेकिन अगर किसी को कहें कि अपनी शर्ट उतार दे तो वो नहीं करेगा. मैने कपड़े की अवधारणा को विकास से जोड़ा."

महिलाओं के लिए काम

अंशु गुप्ता ने कॉरपोरेट की नौकरी छोड़कर 1999 में एनजीओ गूंज की स्थापना की थी. इसमें उनका साथ दिया पत्नी मीनाक्षी गुप्ता ने. दोनों ने मिलकर महिलाओं के लिए सैनिट्री पैड पर भी काम किया है जो गरीब महिलाओं को आसानी से मिल सकें.

बीबीसी संवाददाता रूपा झा से हैंगआउट में मीनाक्षी गुप्ता ने कहा, "ये सपना और सोच दरअसल अंशु की थी. हमने देखा कि महिलाओं के पास माहवारी के दिनों में साफ़ कपड़े नहीं होते. वो गंदा से गंदा कपड़ा इस्तेमाल करती हैं. राख मिट्टी तक इस्तेमाल करती हैं. उनको समझ नहीं होती कि ये स्वास्थ्य का मुद्दा बन सकता है. तब हमने सोचा कि कैसे इस समस्या से निपटा जाए और उन्हें साफ़ कपड़ा मुहैया करवाया जाए."

अंशु गुप्ता ने कहा कि उनकी टीम ने कभी रिश्वत का सहारा नहीं लिया. उनका कहना था, "दिक्कत काम में होती है जब आप तय कर लेते हैं कि आप रिश्वत नहीं देंगे. हमारे ट्रक रोक लिए जाते हैं लेकिन हम रिश्वत नहीं देते. कोई कितने दिन हमारा ट्रक सड़क पर रोके रखेगा. आख़िर हमें जाने की अनुमति मिल जाती है."

फ़ेसबुक पर बीबीसी हिंदी के एक पाठक सैयद रुबैद अहमद के सवाल का जवाब देते हुए अंशु ने कहा, "मुझे इस बात से ऐतराज़ है कि अगर किसी एनजीओ में कुछ गलत होता है तो सब संगठनों को एक ही नज़र से देखा जाता है. अगर किसी एक एनजीओ ने गलत किया है तो उसका नाम लीजिए लेकिन सब एनजीओ पर तोहमत न लगाएँ."

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