बिहारः मौका-ए-वारदात पर ही सज़ा-ए-मौत

  • 5 अगस्त 2015
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बिहार के समस्तीपुर ज़िले में बीते हफ्ते एक युवक को हिंसक भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला. मारा गया शख्स कथित रुप से बलात्कार का अभियुक्त था.

बिहार में बीते सवा महीने में ऐसे कम-से-कम चार मामले सामने आए है. इनमें छह लोग मारे गए हैं.

जून के अंत में ऐसी ही दूसरी घटना नालंदा ज़िले के नूरसराय की है. 29 जून की सुबह दो बच्चों की लाश उनके स्कूल के पास ही एक नाले से मिली थी.

घटना के बाद जब स्कूल निदेशक देवेंद्र प्रसाद सिन्हा स्कूल पहुंचे तो वो भीड़ के हाथों मारे गए. घटना का वीडियो जब सामने आया तब यह सुर्खियां बना.

तीसरी घटना जुलाई महीने की शुरुआत की है. सीतामढ़ी ज़िले में तीन लोगों को भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला.

ये तीनों लोग एक दुकान पर हमला कर भाग रहे थे और भीड़ ने उन्हें पकड़ लिया.

चौथी घटना भी जुलाई महीने की ही है. ज़िला रोहतास में चोरी के आरोप में लोगों ने एक आदमी को पकड़ लिया.

लेकिन पुलिस को सौंपने की बजाय भीड़ ने उसे वहीं मार डाला.

डीएम भी हुए हैं शिकार

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Image caption 5 दिसंबर, 1994 को गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैय्या हिंसक भीड़ के हाथों मारे गए थे. उनके हत्या के आरोप में शिवहर से सांसद रहे आनंद मोहन को उम्रकैद की सजा हुई है.

ऐसे मामलों के आंकड़े फिलहाल अलग से उपलब्ध नहीं हैं.

ऐसा इस कारण है क्योंकि पुलिस ऐसे मामलों को भी दंगे के रूप में ही दर्ज करती है.

लेकिन ऐसी घटनाएं स्थानीय मीडिया में अक्सर सामने आती रहती हैं.

बीते दो दशकों की बात करें तो ऐसी दो घटनाएं बहुत चर्चित हुई थीं. पहली घटना 1994 की है.

उस साल 5 दिसंबर को गोपालगंज के तत्कालीन ज़िलाधिकारी जी कृष्णैय्या हिंसक भीड़ के हाथों मारे गए थे.

उनके हत्या के आरोप में शिवहर से सांसद रहे आनंद मोहन को उम्रकैद की सजा हुई है.

दूसरी घटना 2007 के सितंबर महीने की है.

चोरी के शक में मार डाला

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Image caption वैशाली जिले के राजापाकड़ थाना क्षेत्र में सितंबर, 2007 में घुमंतु वैशाली ज़िले के राजापाकड़ थाना क्षेत्र में नट समुदाय से आने वाले 10 दलितों को चोरी के आरोप में मार डाला गया था.

तब वैशाली ज़िले के राजापाकड़ थाना क्षेत्र में घुमंतू नट समुदाय से आने वाले 10 दलितों को चोर होने के आरोप में मार डाला गया था.

लेकिन जानकारों का मानना है कि ऐसा नहीं है कि ऐसी घटनाएं केवल बिहार में ही होती हैं.

समाजशास्त्री और एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस के पूर्व निदेशक प्रोफेसर महेंद्र नारायण कर्ण के मुताबिक़, भीड़ के व्यवहार को लेकर पूरी दुनिया में अध्ययन हुए हैं.

वो बताते हैं, "भीड़ का व्यवहार पूरी दुनिया में एक जैसा हो ऐसा नहीं है. कोई आम सिद्धांत नहीं है. यह कैसा होगा, भीड़ कितनी हिंसक होगी; यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हिंसा किस मौके पर यानी किस घटना की प्रतिक्रिया में हो रही है."

प्रोफेसर कर्ण बताते हैं, "जहां चोरी और हत्या जैसे मामलों में तात्कालिकता ज़्यादा काम करती है. वहीं युवतियों और महिलाओं से जुड़े मामलों को इज्जत से जोड़ दिया जाता है."

वहीं बिहार पुलिस के अपर महानिदेशक (मुख्यालय) सुनील कुमार के मुताबिक़, कोई जरूरी नहीं कि ऐसी घटनाओं में शामिल सभी लोगों का कोई आपराधिक इतिहास हो. वे उन्माद में अपराध कर बैठते हैं.

सुनील बताते हैं, "कई बार मैंने जांच के दौरान पाया है कि घटना में शामिल रहे लोगों को बाद में अपनी ग़लती का अहसास होता है."

मध्ययुगीन तरीक़ा

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Image caption देवेंद्र प्रसाद सिन्हा के बेटे विजय भास्कर.

बैंक अधिकारी विजय भास्कर पिछले दिनों नालंदा ज़िले में मारे गए देवंद्र प्रसाद सिन्हा के बेटे हैं.

उनका मानना है, "लोगों का पुलिस-प्रशासन पर से यह यक़ीन कम होता जा रहा है कि वह न्याय दिला पाएगा. इस कारण भी ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है."

लेकिन विजय भास्कर जैसे लोगों के नजरिए से सुनील कुमार पूरी तरह इत्तेफाक नहीं रखते हैं.

वे कहते हैं, "ऐसी हर घटना दूसरे से अलग और खास होती है. घटना किनसे जुड़ी है, सामाजिक ताना-बाना क्या है, पुराना इतिहास क्या रहा है, जैसी बहुत सारी बातें इन घटनाओं का कारण बनती हैं."

ऐसी घटनाएं चाहे जिन वजहों से अंजाम दी जाती हों ये समाज पर धब्बा भी हैं और चिंता का विषय भी.

जानकारों का मानना है कि ‘तुरंत न्याय’ देने के इस मध्ययुगीन तरीक़े को रोकने के लिए समाज और पुलिस प्रशासन को एक साथ ईमानदार पहल करनी होगी.

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