भंवर में फंसती जा रही है मोदी की नाव?

नरेंद्र मोदी की बिहार रैली इमेज कॉपीरइट Prashant Ravi

भारतीय मीडिया में इस हफ़्ते ये ख़बर ज़ोरों पर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विवादित भूमि अधिग्रहण विधेयक के मुद्दे पर पीछे हट गए हैं.

इस विधेयक से कारोबारी परियोजनाओं और ढांचागत विकास के लिए ज़मीन अधिग्रहण को आसान बनाने का मक़सद था.

भाजपा सरकार कमोबेश इस विधेयक के उस मसौदे पर वापस लौट गई है जो पिछली कांग्रेसी सरकार ने पेश किया था.

नरेंद्र मोदी के लिए यह एक बड़ा झटका है क्योंकि इस विधेयक को उनके आर्थिक सुधारों की योजना का प्रमुख हिस्सा माना जा रहा था.

कुछ लोग इसे आर्थिक सुधारों के अंत की शुरुआत भी कह रहे हैं. सच कहा जाए तो प्रधानमंत्री अब तक आर्थिक सुधारों के लिए कोई विशेष प्रयास करते नहीं नज़र आए हैं.

'सस्ती लोकप्रियता'

इमेज कॉपीरइट EPA

पिछले साल मोदी सरकार ने यात्रियों के विरोध के बाद मुंबई की लोकल ट्रेन का बढ़ाया गया किराया वापस लिया.

सरकार के इस फ़ैसले के बाद एक पत्रकार ने अपने लेख में इसे 'सस्ती लोकप्रियता' वाला क़दम बताया, जबकि वो एक समय सरकार के प्रति काफ़ी सहानुभूति रखते थे.

संसद के मॉनसून सत्र में 10 दिनों से गतिरोध बना हुआ है. विपक्षी पार्टियाँ इंडियन प्रीमियर लीग के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी की मदद के आरोप में दो बड़े भाजपा नेता सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के इस्तीफ़े की माँग कर रही हैं. भारत में वित्तीय हेरफेर के मामले में वांछित ललित मोदी फ़िलहाल लंदन में रह रहे हैं.

लोक सभा में भाजपा के पास प्रचंड बहुमत है. उसके पास कुल 282 सांसद हैं. उसके गठबंधन दलों को जोड़ा जाए तो ये आंकड़ा 300 से ऊपर चला जाता है.

राज्य सभा में भाजपा के पास बहुमत से थोड़े कम सांसद हैं. इसके बावजूद पार्टी संसद में रणनीतिक कुशलता दिखाने में विफल रही है.

एक भारतीय अख़बार ने लिखा है कि सरकार का संसद में राजनीतिक मैनेजमेंट दयनीय रहा है.

संसद में गतिरोध

संसद में जारी गतिरोध की वजह से काफ़ी महत्वपूर्ण गुड्स एंड सर्विस टैक्स(जीएसटी) विधेयक भी अधर में लटका हुआ है. जबकि इसे आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा प्रस्तावित टैक्स सुधार कहा जा रहा है.

लोक सभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमट चुकी पस्तहाल कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी अचानक ही आक्रामक मुद्रा में नज़र आने लगे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस फिर से वापसी की राह पर है.

इसी हफ़्ते कई पोर्न वेबसाइटों पर पहले प्रतिबंध लगाने और फिर उनमें से कुछ पर से प्रतिबंध हटा लेने से सरकार सोशल मीडिया पर मज़ाक़ का पात्र बन गई है.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार क्षुद्रमानसिकता का प्रदर्शन कर रही है, बदले की भावना के तहत कार्रवाई कर रही है और उसकी आलोचना करने वाले ग़ैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को चुन-चुन कर निशाना बना रही है.

बदले की भावना

इमेज कॉपीरइट AP

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार एक जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाइयों और विभिन्न शिक्षा संस्थानों में संदिग्ध विश्वसनीयता वाले लोगों की नियुक्तियों से सरकार के रवैए का पता चलता है.

कुछ टिप्पणीकारों का मानना है कि नरेंद्र मोदी भारत के उदार लोकतंत्र को भी नुक़सान पहुँचा रहे हैं.

टिप्पणीकार मिहिर शर्मा ने अपने हालिया लेख में बहुत ही आशंकित स्वर में प्रधानमंत्री मोदी पर अपने आलोचकों को चुप कराने और एनजीओ को निशाना बनाने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया है.

शर्मा ने लिखा है कि "मोदी बहुत ही चतुराई से एक ऐसा ढांचा विकसित कर रहे हैं जिससे उदार भारतीय लोकतंत्र का चेहरा हमेशा के लिए बदल जाएगा."

हनीमून पीरियड

इमेज कॉपीरइट AP Reuters

ये सही है कि मोदी सरकार का हनीमून पीरियड उम्मीद से पहले ख़त्म हो गया.

राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष वार्ष्णेय ने लिखा है कि नरेंद्र मोदी की वैधता तेज़ी से घटी है. आशुतोष मानते हैं कि कई वैश्विक दौरों और विदेश नीति में मिली सफलताओं के बावजूद मोदी सरकार घर में ज़्यादा सफल नहीं रही है.

पार्टी के कट्टरपंथी नेताओं की भड़काऊ बयानबाज़ियों पर भारतीय प्रधानमंत्री अक्सर चुप ही रहे हैं.

इस साल फ़रवरी में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उभरी एक नई-नवेली पार्टी के हाथों दिल्ली विधान सभा में मिली हार को कई लोग भाजपा के अहंकार का परिणाम मान रहे हैं.

टिप्पणीकार स्वामीनाथन एसए अय्यर ने लिखा है कि नरेंद्र मोदी अब तक "ढुलमुल ही दिखाई दिए हैं और जटिल मुद्दों को हल करने की उन्होंने कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है."

अय्यर ने तीखे शब्दों में लिखा है, "इस समय नरेंद्र मोदी बेहद ढुलमुल, आलोचना के प्रति अति-संवेदनशील और इच्छाशक्ति विहीन नज़र आ रहे हैं."

सरकार की विफलता

इमेज कॉपीरइट MANISH SHANDILYA

वॉशिंगटन स्थित कार्नेगी एंडाओमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक मिलन वैष्णव मानते हैं कि मोदी के हनीमून पीरियड का समय से पहले ख़त्म होने की एक वजह ये है कि "उनकी सरकार आर्थिक सुधारों का अपना कार्यक्रम सही तरीक़े से नहीं पेश कर पाई."

वैष्णव ने मुझसे बातचीत में कहा, "इसके दो प्रमुख कारण हैं. सरकार आर्थिक सुधार का एक सुसंगत स्वरूप पेश करने में विफल रही है जिसकी वजह से सभी सरकारी एजेंसियाँ आपसी तालमेल नहीं बैठा पा रही हैं. यहाँ तक कि वित्त मंत्रालय के अंदर भी पिछली नीतियों को जारी रखने या न रखने को लेकर मतभेद के कई स्वर हैं."

वो कहते हैं, "दूसरा कारण भी पहले से जुड़ा हुआ है. मोदी सरकार अपनी योजनाओं को आम जनता को समझाने में विफल रही है."

साझेदारी की कला

इमेज कॉपीरइट EPA

हालांकि अभी मोदी सरकार पर कोई अंतिम राय देना जल्दबाज़ी होगी. कांग्रेस के पास सीमित विकल्प हैं और उसका राजनीतिक भविष्य धुंधला ही नज़र आ रहा है.

नरेंद्र मोदी की निजी लोकप्रियता अब भी काफ़ी हद तक बरक़रार है.

मोदी को वापसी के लिए नई पटकथा लिखनी होगी. इसके लिए उन्हें सरकारी अहंकार थोड़ा कम करना होगा, मंत्रियों के चुनाव में अक़्लमंदी दिखानी होगी, ज़रूरी ढांचागत सुधार शुरू करने होंगे और राजनीतिक और सामाजिक साझेदारी निभाने की कला दिखानी होगी.

अगर भाजपा बिहार में होने वाले महत्वपूर्ण विधान सभा चुनाव में जीत हासिल कर लेती है तो इससे एक बार फिर मोदी की लोकप्रियता प्रमाणित हो जाएगी.

अगर पार्टी हार जाती है तो इसका मतलब ये होगा कि नरेंद्र मोदी को पिछले साल जो ज़बरदस्त बहुमत मिला था वो उसे गंवाने की राह पर तेज़ी से बढ़ चले हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार