अम्मा और मोदी, पास आने की मजबूरी?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेन्नई में हथकरघा दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान लोगों को जब तमिल में सम्बोधित किया तो मौजूद लोगों ने उनकी इस पहल को काफी सराहा.

फिर चेन्नई प्रवास के दौरान उनकी मुलाक़ात जब मुख्यमंत्री जे जयललिता से दोपहर के भोजन पर हुई तो कयासों का बाज़ार गर्म हो गया.

कहा जा रहा है कि इस छोटी सी मुलाक़ात के दौरान जयललिता ने प्रधानमंत्री को 21 पन्नों का एक ज्ञापन भी सौंपा जिसमे राज्य के कई मुद्दों के उठाये जाने की बात कही जा रही है.

राजनीतिक विश्लेषक, दोनों नेताओं की मुलाक़ात को काफी अहमियत दे रहे हैं.

खास तौर पर इस लिए भी, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की जयललिता के साथ यह दूसरी औपचारिक मुलाक़ात है.

मुलाक़ात

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इससे पहले श्रीहरिकोटा जाते हुए मोदी और तमिल नाडु की मुख्यमंत्री के बीच सिर्फ 15 मिनटों की मुलाक़ात ही हो पायी थी.

पहले यह तय किया गया था कि चेन्नई एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए सिर्फ राज्यपाल ही जाएंगे क्यों कि मुख्यमंत्री की तबियत ठीक नहीं है.

मगर, खुद हवाई अड्डे पहुंचकर जयललिता ने सबको चौंका दिया.

संसद में चल रहे गतिरोध के बीच इस मुलाक़ात के कई मायने लगाए जा रहे हैं. कई ऐसे बिल हैं जिनपर समर्थन जुटाना सरकार के लिए बड़ा इम्तिहान है.

जैसे कि भूमि अधिग्रहण बिल, जीएसटी बिल आदि.

मतभेद

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एआईएडीएमके ने भूमि अधिग्रहण बिल पर अपना असंतोष पहले ही जाता दिया था.

हालांकि लोक सभा में तो भाजपा को ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता, राज्य सभा में उसके पास बहुमत नहीं है.

ऐसे में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार को एआईएडीएमके का समर्थन अहम रहेगा. राज्यसभा में एआईएडीएमके के 11 सदस्य हैं.

वरिष्ठ पत्रकार के वी लक्ष्मण कहते हैं कि दोनों नेताओं की यह मुलाक़ात एआईएडीएमके से ज़्यादा भारतीय जनता पार्टी के लिए अहम है.

लक्ष्मण का कहना है कि व्यक्तिगत तौर पर दोनों ही नेताओं बीच आपसी तालमेल देखा जाता रहा है मगर संसद में चल रहे मौजूदा गतिरोध को देखते हुए भाजपा को एक मज़बूत सहयोगी की ज़रुरत है.

ज़रूरत

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राजनीतिक टिप्पणीकार ग्यानी शंकरन कहते है कि यह मुलाक़ात जयललिता के लिए भी उतनी ही अहमियत रखती है जितनी भाजपा के लिए.

शंकरन कह रहे थे की एआईएडीएमके को मोदी के समर्थन की ज़्यादा ज़रुरत है क्योंकि अगले चार सालों तक मोदी ही प्रधानमंत्री रहेंगे.

वो केंद्र सरकार के साथ रिश्ते बिगाड़ कर राज्य को नहीं चला सकती, और, अगर करूणानिधि की पार्टी डीएमके भाजपा के साथ गयी तो यह जयललिता के लिए बड़ा सर दर्द साबित होगा.

दोनों - यानी एआईएडीएमके और भाजपा को एक दुसरे के समर्थन की ज़रुरत है.

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तमिलनाडु में भी एआईएडीएमके के लिए राजनीतिक हालात काफी चुनौतीपूर्ण हैं क्योंकि नशाबंदी के सवाल पर पूरा विपक्ष एकजुट है.

उत्पाद विभाग से सरकार को ख़ासा राजस्व आता है और अगर शराब बंदी को लागू करना पड़ा ऐसी सूरत में तमिल नाडु सरकार को केंद्र सरकार के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ेगा.

नरेंद्र मोदी और जयललिता की इस मुलाक़ात पर नज़रें इस लिए भी टिकी हुईं थीं क्योंकि भाजपा को समर्थन देने के मामले में तमिल नाडु की मुख्यमंत्री ने कभी कुछ खुलकर नहीं बोला.

हलाकि उनकी नाराज़गी तब सामने आई जब नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में श्रीलंका के राष्ट्रपति को न्योता दिए जाने पर वो विरोध स्वरुप नहीं आईं.

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