शिक्षा का अधिकार और ग़रीबों पर मार?

  • 8 अगस्त 2015
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छह साल के आदित्य ने जुलाई के अंतिम सप्ताह से स्कूल जाना शुरू किया है.

आदित्य का दाख़िला लखनऊ के एक बड़े स्कूल में शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत हुआ है. ये आदित्य के पिता विनोद कनौजिया के लिए एक सपने के पूरे होने जैसा था. आदित्य के पिता पेशे से धोबी हैं.

इस क़ानून से पहले गरीब बच्चों के लिए बड़े स्कूल पहुंच से बाहर थे. अब इन बड़े स्कूलों के दरवाजे खुले तो हैं लेकिन रास्ता अब भी उतना आसान नहीं है.

विनोद कनौजिया बताते हैं कि शिक्षा के अधिकार के बारे में अखबार में पढ़ने के बाद उन्होंने उस स्कूल में आदित्य का दाख़िला करवाया लेकिन मीडिया में इस एडमिशन को लेकर विवादित ख़बरे छपीं और आदित्य को स्कूल से आने से रोक दिया गया.

मीडिया से दूरी

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Image caption आदित्य का दाख़िला उनके पिता विनोद कनौजिया के लिए एक सपने के पूरे होने जैसा था.

"बहुत माफ़ी मांगने के बाद प्रिंसिपल आदित्य को वापस लेने को तैयार हुई हैं," यह बताते हुए विनोद ज्यादा विस्तार में बात करने या आदित्य की फोटो खींचने से मना कर देते हैं.

वे कहते हैं, "बड़ी मुश्किल से स्कूल वाले राजी हुए हैं इसलिए अब हम मीडिया से ज्यादा बात नहीं करेंगे."

लखनऊ के ही एक दूसरे स्कूल ने गरीब बच्चों को अपने यहां दाख़िला देने के बजाए अधिनियम के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट की शरण ले ली है.

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मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडे का मानना है कि गरीब बच्चों को अच्छे स्कूलों में मुफ्त शिक्षा दिलाने के लिए बने इस अधिनियम का उत्तर प्रदेश में ढंग से पालन नहीं हो रहा है. वैसे निजी स्कूलों का इस मामले में अड़ियल रवैया कई जगह पर खबरों में हैं.

2009 में केंद्र के इस अधिनियम को लागू करने के लिए प्रदेश सरकार ने 2013 में एक आदेश जारी किया था. हर गरीब बच्चे को पढ़ाने के लिए सरकार की तरफ से 450 रुपए दिए जाते हैं.

प्राथमिक शिक्षा विभाग की अतिरिक्त निदेशक रूबी सिंह इस बात से सहमत नहीं हैं कि प्रदेश में इस क़ानून का पालन ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है.

वो कहती हैं, "दो साल पहले 60 ऐसे बच्चों को लखनऊ और दो तीन अन्य ज़िलों के विभिन्न प्राइवेट स्कूलों में दाख़िला दिया गया था. इसमें से छह बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी और बाकी 54 अगली कक्षा में चले गए."

नियम

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अतिरिक्त निदेशक रूबी सिंह का कहना है, "पिछले साल 54 और बच्चे कक्षा एक में भर्ती हुए. इस प्रकार कुल 168 गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए 75600 रुपए की मदद दी गई, इस साल लखनऊ के लगभग 50 स्कूलों में 263 बच्चों को एडमिशन मिला."

रूबी सिंह ने बताया कि प्रदेश के 21 ज़िलों के आंकड़ों के अनुसार जुलाई के पहले हफ्ते तक 2762 गरीब बच्चों का दाख़िला विभिन्न निजी स्कूलों में हो चुका है. इसमें अकेले फिरोजाबाद में ही 1433 दाखिले हुए हैं.

सरकारी आदेश के अनुसार शहरी क्षेत्र में अगर गरीब परिवार के एक किलोमीटर दायरे में कोई सरकारी स्कूल नहीं है तो उस क्षेत्र में जो भी निजी स्कूल है उसको अपने यहां 25 प्रतिशत सीटें ऐसे बच्चों के लिए सुरक्षित रखनी होंगी. ये क़ानून अल्पसंख्यक स्कूलों के ऊपर लागू नहीं होता है.

एक किलोमीटर की शर्त केवल उत्तर प्रदेश के क़ानून में है. रूबी सिंह कहती हैं कि लोग सरकारी स्कूलों में पढ़ना बंद ना कर दें इसलिए नियम में ये प्रावधान रखा गया है कि एक किलोमीटर के दायरे में अगर सरकारी स्कूल है तो गरीब बच्चों को वहाँ पढ़ना पड़ेगा.

उन्होंने कहा, "ऐसी शर्त किसी दूसरे राज्य में नहीं है."

जांच

इस नियम को लागू करने में एक और समस्या आ रही है. फिरोजाबाद में 25 प्रतिशत बच्चों की जगह सभी स्कूलों ने शत-प्रतिशत गरीब बच्चों को दाख़िला दे दिया. लेकिन सरकार केवल 25 प्रतिशत छात्रों का खर्च उठाएगी इसलिए फिरोजाबाद में हुए दाखिलों में जांच चल रही है.

फिरोजाबाद के बेसिक शिक्षा अधिकारी बाल मुकुंद शत प्रतिशत गरीब बच्चों के दाख़िले के लिए दूसरा तर्क देते हैं.

वो कहते हैं, "अगर किसी ऐसी जगह जहां एक किलोमीटर के दायरे में कोई सरकारी स्कूल नहीं है लेकिन स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या अधिक है, तो क्या सिर्फ 25 प्रतिशत बच्चों को ही स्कूल में दाख़िल करना चाहिए? बाकी बच्चों का क्या करना चाहिए?"

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