'मोदी सरकार का विरोध बेबुनियाद है'

  • 10 अगस्त 2015
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हाल के समय में कुछ घटनाएं एक साथ घटीं.

असंसदीय ढंग से ही सही, कांग्रेस संसद ठप कराने में काफ़ी सक्रिय हो गई. राहुल गांधी की रीलॉन्चिंग की एक और कोशिश हुई.

उधर वसुंधराराजे-शिवराज सिंह चौहान और सुषमा स्वराज के इस्तीफ़ों की मांग पर ऐसा शोर मचा कि कारण पीछे चला गया. भूमि अधिग्रहण विधेयक पर सरकार ने अपने कदम पीछे खींचे.

सरकार की पकड़ कमज़ोर

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कुल मिला कर ऐसा गया कि सरकार की पकड़ कमज़ोर हो रही है. वादों और नारों पर काम करने की मांग करने वालों को इससे ताक़त मिली और सरकार की आलोचना तेज़ हो गई.

इस आलोचना में शोर ज़्यादा है, तर्क कम. भ्रष्टाचार का आरोप लगाना, उस पर इस्तीफ़ा मांगना, संसद ठप करना समझा जा सकता है. पर उसका आधार होना चाहिए. कोयला घोटाले का या 2जी घोटाले अपने आप में प्रमाणित थे.

उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा के दो नेताओं ने कोयला घोटाले की लिखित शिकायत सीवीसी और सीएजी से की थी. इसके बाद सीवीसी ने जांच की, रिपोर्ट दी, सीएजी ने पुष्टि की.

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घोड़े की देखादेखी मेंढक के पैर में नाल नहीं ठोंकी जा सकती. व्यापमं मामले में कथित व्हिसिलब्लोअर ने जिस कंप्यूटर के प्रयोग की बात कही है, वह मॉडल ही बताई गई तिथि के कई महीनों बाद लांच हुआ था. लेकिन शोर का अपना समाजशास्त्र होता है.

उद्योगपति राहुल बजाज ने भी मोदी सरकार के तमाम पहलुओं की खुलकर आलोचना की है. तकनीकी तौर पर यह उनका मौलिक और लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसके कई निहितार्थ हैं.

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खफ़ा उद्योग जगत?

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इस बाज़ारजीवी, सरकारजीवी दुनिया में अगर कोई उद्योगपति सरकार की खुली आलोचना करता है, तो इसके सकारात्मक पहलू भी हो सकते हें. इससे पहली नज़र में ऐसा लगता है कि सरकार की उद्योगपतियों के साथ सांठगांठ नहीं है.

उद्योग जगत में काले पैसे की आवक कम होने और इससे व्यापार पर फ़र्क पड़ने की बात अब खुले आम कही जाने लगी है. काले पैसे से जुड़े विधेयक पर कई लोगों की सारी उम्मीदें राज्य सभा पर टिकी हुई हैं.

इस बीच, अगर कुछ लोग कांग्रेस से नाउम्मीद होकर सरकार की तारीफ़ करने का विकल्प टटोलते नज़र आने लगें, तो अचरज नहीं होना चाहिए.

मोदी की आलोचना करने वालों में और दो तरह के लोग हैं. एक है अंग्रेजी मीडिया, जिसमें तमाम स्वनाम धन्य और परिचित चेहरे, चिंतक-विचारक-थिंकटैंक-उपन्यासकार और बड़े बनने का सपना देखने वाले लोग शामिल हैं.

सोशल मीडिया

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दूसरा और काफ़ी छोटा वर्ग सोशल मीडिया पर मौजूद उन लोगों का है, जिन्हें कल तक ‘इंटरनेट हिंदू’ कहा जाता था और अब ‘गुंडे’ कहा जाता है.

सोशल मीडिया पर मोदी की जो आलोचना है, वह शत्रुघ्न सिन्हा सिंड्रोम का विस्तार भर है. हालत यह है कि मोदी की विदेश यात्राओं की आलोचना होती है, मानो वे छुट्टी मनाने विदेश गए हों.

यह बात भी समझी जानी होगी कि मोदी को या भाजपा को लोकसभा चुनावों में जो वोट मिले थे, वे सारे भाजपा के स्थायी या प्रतिबद्ध वोट नहीं थे. उनमें से बड़ा हिस्सा ‘प्रवासी भाजपा समर्थकों’ का था, जो भाजपा के साथ आ गए थे.

अब मोदी लगातार चुनाव प्रचार अभियान नहीं चला रहे हैं, लिहाज़ा इन समर्थकों की हालत उन लोगों जैसी हो रही है, जो फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी सिनेमा घर में बैठे रह गए हों, और पर्दे को निहार-निहार कर बोर होने लगे हों.

मीडिया पर महाभारत!

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इस बेचैनी को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. मोदी का चुनाव प्रचार अभियान भले ही ख़त्म हो गया हो, इस देश में मीडिया और टिप्पणीकार चुनावी मोड में हैं. उन्हें लगता है कि फ़िल्म तब तक चलती रहनी चाहिए, जब तक वे सिनेमाघर में बैठे हों.

वे अपने स्थान पर सही भी हैं. एक तो इस देश में कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं, और दूसरे अपरिपक्व लाइव मीडिया चौबीसों घंटे चुनाव कराता रहता है.

बात-बात पर मोदी से जवाब इसी वजह से मांगा जाता है. कोई भी सरकार इसके आगे विवशता जताने से ज़्यादा कुछ नहीं कर सकती है.

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दूसरा गंभीर आलोचक वर्ग मीडिया के उन लोगों का है, जिनमें से अधिकांश चुनाव के पहले निश्चिंत थे कि चुनाव सांप्रदायिक आधार पर लड़ा जाएगा, भाजपा को बहुमत नहीं मिलेगा, मोदी गठबंधन नहीं चला पाएंगे, चला भी लिया, तो उनका एजेंडा सांप्रदायिक रहेगा.

पिछले सवा साल में उनकी हर ग़लतफ़हमी दूर हो गई.

राजनीतिक विरोधियों की सक्रियता अब सरकार को किसान विरोधी साबित करने के दांव से आगे निकल गई है. कोई संदेह नहीं कि इस दांव में वे कामयाब भी थे, और हालिया विधानसभा चुनावों ने सरकार को अपने पैर पीछे खींचने के लिए मजबूर भी किया है.

लेकिन अब ज़ाहिर तौर पर विपक्ष का एजेंडा सरकार को उस सीमा तक धकेलने का है, जहां से वह प्रतिक्रिया करने के लिए मजबूर हो जाए.

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तानाशाह?

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सरकार जैसे ही प्रतिक्रिया करे, उसे तुरंत तानाशाह और अलोकतांत्रिक कहकर उस उदारपंथी वर्ग को कांग्रेस के नज़दीक आने के लिए मजबूर कर दिया जाए, जो राहुल गांधी या सोनिया गांधी के नाम पर कांग्रेस का साथ देने के लिए राज़ी नहीं होता है.

इसी रणनीति का एक छिपा लाभ यह भी है कि अगर सरकार यूपीए के घोटालों पर कोई कार्रवाई करती है, तो उसे राजनीतिक बदला साबित करना आसान होगा. इस ढंग से अंग्रेजी मीडिया और विपक्ष में लालू-नीतीश सरीखी दोस्ती हो सकती है.

इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे एक ओर आर्थिक सुधारों का पक्ष लेना चाहते हैं, और दूसरी तरफ सुधार न होने देने पर भी ताली बजाना चाहते हैं.

अच्छी रणनीति

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विपक्ष की नज़र से देखें, तो रणनीति अच्छी है, लेकिन लोकतंत्र या देश के हित में यह नहीं है.

अगर सरकार को दोनों सदनों का संयुक्त सत्र बुलाना पड़ा तो इससे राज्यसभा के महत्व पर सवाल उठेगा.

मुमकिन है कि इसके बाद संयुक्त सत्र की भूमिका ही प्रमुख हो जाए. फिर क्या होगा?

अगर सरकार प्रतिक्रिया जताएगी तो वह ‘तानाशाह’ कहलाएगी, नहीं तो डरपोक. इस बीच देश और संस्थानों का क्या होगा? जिनके लिए मोदी विरोध ही मिशन है, वास्तव में उन्हें इस सवाल पर सोचना चाहिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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