जैन प्रथा संथारा ग़ैरकानूनी: हाई कोर्ट

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राजस्थान हाई कोर्ट ने 'संथारा' पर रोक लगा दी है. अब जैन समुदाय की इस प्रथा के तहत अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करना दंडनीय माना जायेगा.

न्यायाधीश सुनील अम्बवानी ने वर्ष 2006 में दायर की गई एक जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया.

याचिकाकर्ता निखिल सोनी ने कहा था कि संथारा भी सती प्रथा जैसा ही है. उन्होंने सवाल उठाया, यदि सती होना आत्महत्या है तो संथारा क्यों नहीं? जयपुर की कैंसर पीड़ित विमला देवी भंसाली और बीकानेर की 85 वर्षीय धन्नी देवी ने 2006 में संथारा लिया था.

'चुनौती दे सकता है जैन समाज'

सोनी की ओर से इस मामले की पैरवी करने वाले अधिवक्ता माधव मित्र ने बीबीसी से कहा, “यह एक अहम फैसला है. माननीय न्यायालय ने माना है कि यदि कोई संथारा लेने की कोशिश करता है तो यह ग़ैरकानूनी माना जाएगा. संथारा लेने के लिए प्रेरित या सहायता करने वाला व्यक्ति भी भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषी माना जाएगा."

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राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पाना चंद जैन इससे सहमत नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “संथारा को आत्महत्या कहना सही नहीं है क्योंकि आत्महत्या आवेश में की जाती है जबकि संथारा एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है. जैन शास्त्रों में इसकी अनुमति है और असाध्य रोग अथवा अत्याधिक आयु से अशक्त व्यक्ति संथारा ले सकता है. उन्होंने कहा कि ज्ञान कौर बनाम राज्य सहित बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी यह कह चुका है कि धारा 309 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं है."

उन्होंने कहा कि जैन समुदाय इस पर अपील करने पर विचार करेगा.

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