बिहार: दुविधा के भंवर में भाजपा और मांझी

  • 11 अगस्त 2015
जीतनराम मांझी इमेज कॉपीरइट Prashant Ravi

भारतीय जनता पार्टी ने बिहार में रथ-यात्राओं के ज़रिए चुनावी युद्ध का बिगुल बजाने की योजना बनाई है.

ये रथयात्राएं विजय-यात्राओं में तभी तब्दील हो सकती हैं, जब छोटे-छोटे प्रभाव-क्षेत्रों वाले नेताओं की ताकत उसके साथ जुड़े.

ऐसे नेताओं में उपेंद्र कुशवाहा, रामविलास पासवान और जीतनराम मांझी के नाम प्रमुख हैं.

चूंकि कुशवाहा और पासवान पहले से ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ (राजग) के अंग और केंद्र में मंत्री हैं, इसलिए उनके साथ चुनावी तालमेल बैठाना भाजपा के लिए अपेक्षाकृत आसान है.

लेकिन मांझी का मामला अलग है और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी का स्वाद भी लग चुका है.

महादलितों का वोट

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जिन नीतीश कुमार ने उन्हें मुख्यमंत्री बना कर उनकी यह हैसियत बनाई है, उन्होंने तो लगभग मान लिया है कि इस बार उन्हें मोटे तौर पर महादलित वोटों के बिना ही काम चलाना होगा.

उनके गठजोड़ को ये वोट केवल स्थानीय परिस्थितियों और उम्मीदवार के हिसाब से मिलेंगे यानी जहां उन्होंने मजबूत महादलित उम्मीदवार उतारा होगा और वे कुर्मी-यादव-मुसलमान वोटों के कारण जीतने वाली स्थिति में होंगे.

यह पूरा विश्लेषण मान कर चल रहा है कि मांझी सारे महादलितों के प्रतीक-पुरुष बन चुके हैं, हालांकि मुसहरों की अपनी ताकत बिहार में केवल तीन से चार फ़ीसदी के आसपास है.

महादलितों की अन्य सामाजिक श्रेणियों में आने वाले वोटर किस हद तक उन्हें अपना नेता मानेंगे यह अभी तय होना बाकी है.

दूसरे गया और बिहार के पूर्वी क्षेत्र में मुसहरों और भूमिहारों की बड़ी आबादी है. इस बार दोनों भाजपा के साथ प्रतीत होते हैं.

मांझी का दांव

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मांझी की महत्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी हैं और भीतर के सूत्र बताते हैं कि वे 40 सीटों पर अपना दावा ठोक रहे हैं.

फिलहाल उनके साथ 20 विधायक हैं जिनमें ज़्यादातर कथित ऊँची जातियों के हैं. भाजपा के रणनीतिकार चाहते हैं कि किसी तरह मांझी की उड़ान को धरती पर लाया जाए.

इसीलिए इन विधायकों में से सात-आठ को भाजपा में लाने की तैयारी कर ली गई है ताकि मौजूदा विधायकों के आधार पर टिकट मांगने की गणना गड़बड़ाई जा सके.

भाजपा का मानना है कि 10-12 विधायकों के साथ मांझी की हैसियत 20-25 सीटों पर टिकट मांगने की ही रह जाएगी.

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लेकिन मांझी जिन महादलित या मुसहर वोटों की नुमाइंदगी करते हैं, उनका प्रसार बताता है कि उनकी झोली से विधायक निकाल लेना भाजपा के लिए काफी नहीं होगा.

कम से कम 12 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं जहां 15 फ़ीसदी महादलित वोट हैं. 40 से ज़्यादा क्षेत्रों में उनकी ताकत 12 से 15 के बीच में है. कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ वे 9 से 12 के बीच हैं.

बाकी बिहार में हर निर्वाचन क्षेत्र में महादलित कम से कम नौ से छह फ़ीसदी के बीच तो हैं ही.

यानी मांझी 20 टिकटों से कम पर तो किसी कीमत पर नहीं मानेंगे. जब उन्हें इतने टिकट मिलेंगे, तभी उनके बदले में कम प्रभाव वाले क्षेत्रों में महादलित वोट राजग के उम्मीदवारों की तरफ खिसक पाएंगे.

क्या होगा नतीजा

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इसके लिए मांझी के साथ भाजपा को खुला गठजोड़ बनाना होगा. मांझी अगर बाहर रह गए तो वोट बर्बाद करेंगे. बाकायदा भीतर आ कर लड़े तभी भाजपा को उनका लाभ हो सकेगा.

उन्हें भीतर लाने की तैयारी पूरी है, पर राजनीति में होते-होते क्या हो जाएगा, इसका किसी को पता नहीं होता.

बिहार चुनाव के संभावित परिणामों में एक त्रिशंकु विधानसभा का भी है.

भाजपा के भीतर इस तरह का एक आकलन भी सुना जा सकता है. गठजोड़ सरकार वाली स्थिति मांझी और कुशवाहा जैसे नेताओं के लिए आदर्श है.

मांझी को 90 के दशक का उत्तर प्रदेश अवश्य याद होगा जब 50 के आस-पास सीटें रखने वाली मायावती 170 सीटें रखने वाली भाजपा को अपने सामने एक नहीं तीन-तीन बार झुकाने में कामयाब हुई थीं.

दुविधा

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मायावती भी दलित हैं और मांझी भी. लेकिन, उत्तर प्रदेश में दलित वोटों में मायावती और बहुजन समाज पार्टी के अलावा किसी और का हिस्सा नहीं था.

बिहार में दलित मतदाता-मंडल बंटा हुआ है. जाहिर है कि मांझी मायावती नहीं बन सकते.

मायावती बनने के लिए उन्हें राजग से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी कायम रखना होगा.

उन्होंने अगर ऐसा किया तो खुले गठजोड़ वाली स्थिति नहीं बन पाएगी. अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो चुनाव के बाद उनकी राजनीतिक हैसियत में तेज़ी से गिरावट आएगी.

यानी दुविधा भाजपा के लिए ही नहीं मांझी के लिए भी है.

लेखक विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक और एसोसिएट प्रोफेसर हैं.

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