बढ़ रही है भाजपा और मुलायम के बीच नज़दीकी?

  • 12 अगस्त 2015
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क्या समाजवादी पार्टी अब भारतीय जनता पार्टी के क़रीब आ रही है? क्या संसद में विपक्ष की अब तक नज़र आ रही एकता में दरार पड़ गई है. ये ऐसे सवाल हैं जिन्होंने कांग्रेस की परेशानी बढ़ा दी है.

पिछले कई दिनों से कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने कई मुद्दों पर सरकार को सदन में घेरने का काम किया है जिसकी वजह से लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही लगातार बाधित होती चली गई.

सोमवार को जब समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने सदन में लगातार हो रहे गतिरोध पर अपनी नाराज़गी जताई तो इसे विपक्ष में पैदा हो रही फूट के संकेत के रूप में देखा जाने लगा.

व्यापमं घोटाले और सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से संसद के दोनों सदनों में विपक्ष का हंगामा चल रहा है.

कठोर बोल

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मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा अध्यक्ष से कहा था कि वो गतिरोध ख़त्म करने के लिए कांग्रेस और सरकार के बीच मध्यस्थता करने को भी तैयार हैं.

मंगलवार को समाजवादी पार्टी के मुखिया के तेवर और भी तल्ख़ होने लगे जब उन्होंने कांग्रेस को एक तरह की चेतावनी देते हुए कहा,"ये बहुत ज़्यादा हो गया है, अगर आप लोग इसी तरह से विरोध करते रहेंगे तो हम आपका साथ नहीं देंगे."

कई और विपक्षी दलों की तरफ़ से भी संकेत मिलने शुरू हो गए कि वो भी नहीं चाहते कि संसद में गतिरोध ज़्यादा दिनों तक चलता रहे.

विपक्ष के ख़ेमे से आ रहे इतने संकेत काफ़ी थे और भारतीय जनता पार्टी ने इस असंतोष को मानो झट से लपक लिया है.

मंगलवार को पार्टी की संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुलायम सिंह यादव की प्रशंसा भी कर डाली.

भाजपा के नेता राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा, "प्रधानमंत्री ने मुलायम सिंह का आभार व्यक्त किया है और उन विपक्षी दलों का भी आभार व्यक्त किया है जिन दलों ने महसूस किया है कि देश में विकास की गति बढ़े."

विपक्ष में फूट

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बीबीसी से बात करते हुए समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल ने कहा कि उनकी पार्टी ने कभी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस्तीफ़ा नहीं माँगा था.

अग्रवाल कहते हैं, "हमने कभी भी किसी के इस्तीफ़े की मांग नहीं की है. हम चाहते है कि सदन भी ठीक से चले. विपक्ष एकजुट है और सबको अपनी राय रखने का पूरा हक़ है. इसका मतलब यह नहीं लगाना चाहिए कि फूट पड़ रही है. अब आप शिव सेना और तेलगू देसम पार्टी को ही देख लीजिए. वो भाजपा के सुर में सुर नहीं मिलाते हैं जबकि उनका गठबंधन है."

हालांकि कांग्रेस ने विपक्षी दलों के बीच किसी भी तरह के मतभेद से इंकार किया है और आरोप लगाया है कि भाजपा की मंशा फूट डालने की ही है.

कांग्रेस के नेता शकील अहमद कहते हैं, "मुलायम सिंह यादव की अपनी सोच है और वो उसे व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र भी हैं, मगर इसका मतलब नहीं है कि फूट है."

कांग्रेस की मजबूरी

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हालांकि तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी सहित कुछ और विपक्ष के दल हैं जो कई मुद्दों पर सरकार के साथ नज़र आए. इनमें जीएसटी बिल भी ऐसा ही एक मुद्दा है.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि जिस तरह की राजनीति समाजवादी पार्टी करती है, उसका भाजपा के साथ जाना मुमकिन नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक नवीन जोशी के अनुसार कुछ ऐसे मुद्दे ज़रूर हैं जिनमें समाजवादी पार्टी, भाजपा की उदारता चाहती है.

जोशी कहते हैं, "पिछले दिनों सीबीआई ने नोएडा मुख्य अभियंता के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया. उत्तर प्रदेश की सरकार उनके पक्ष में सुप्रीम कोर्ट तक चली गई. उत्तर प्रदेश की सरकार चाहेगी कि सीबीआई का रुख़ नरम हो. उसी तरह दूसरा मुद्दा है लोकायुक्त की नियुक्ति का जिसपर उत्तर प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल ने आपत्ति जताई है. इसपर भी समाजवादी पार्टी चाहेगी कि भाजपा का रुख़ नरम हो."

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यह बात भी सही है कि लोहियावादी विचारधारा पर चलने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी की छवि 'प्रो कांग्रेस' की होने लगी थी.

दबी जुबां से ही सही कांग्रेस के कुछ नेता यह ज़रूर कहने लगे हैं कि मुलायम की मध्यस्थता की पहल उन्हें नागवार लग रही है.

मगर मौजूदा हालात में कांग्रेस की मजबूरी है और वो सबको साथ लेकर ही चलना चाहती है.

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