सुखविंदर कौर से राधे मां बनने की दास्तां

  • 13 अगस्त 2015
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सुबह के 7 बजे हैं और हम 'राधे मां' के बोरिवली स्थित आश्रम 'नंद नंदन भवन' के सामने हैं.

विवादों में घिरी 'राधे मां' के इस ठिकाने पर घर से जुड़े इक्का-दुक्का नौकरों के अलावा श्रद्धालुओं की भीड़ नहीं है.

नंद भवन के पड़ोस में रहने वाले प्रदीप जादव ने बताया कि जब से मीडिया में मामला आया है भक्तों की भीड़ और आवाजाही कुछ कम हुई है वर्ना यहां अक्सर लोग मौजूद रहते हैं और सत्संग वाले दिन तो मेला सा लगा रहता है.

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राधे मां के इस सात मंज़िला आश्रम को देख कर ये अंदाज़ा लग भी जाता है कि यहां काफ़ी भीड़ होती होगी, क्योंकि लग्जरी गाड़ियों की पार्किंग के साथ लगे सभा भवन में 500 से ज़्यादा लोगों के बैठने की जगह है.

फ़िलहाल 'राधे मां' वहां नहीं थी बल्कि मुंबई के पॉश इलाके मालाबार हिल्स में वालकेश्वर इलाके में स्थित अपने सेवादार परिवार के घर पर मौजूद थीं और हमें वहीं बुला लिया गया.

सुखविंदर से 'राधे'

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पंजाब के दोरांगला गांव की सुखविंदर कौर को बचपन से ही मंदिर में पूजा करने का शौक था और अपने घर में बाकी परिवार से उनका रूप रंग भी काफ़ी अलग था.

बीबीसी से बात करते हुए राधे मां के सेवादार और मीडिया मैनेजर संजीव गुप्ता बताते हैं, "उनकी लीलाएं बचपन से ही दिखने लगी थीं, क्योंकि वो दूसरे बच्चों के साथ ख़ेलती नहीं थीं, बल्कि भगवान भजन में अपना ध्यान लगाती थीं."

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किसी ख़ास 'लीला' के बारे में पूछे जाने पर उनका कहना था, "नहीं कोई चमत्कार नहीं था लेकिन दूसरे बच्चों के मुक़ाबले उनका थोड़ा अलग व्यवहार रहता था. 17 साल की उम्र में मोहन सिंह से शादी हो जाने के बाद सुखविंदर को दो बेटे हुए, लेकिन फिर पति के विदेश चले जाने के बाद सुखविंदर ने बच्चों को त्याग दिया और गुरू मां बनने का फ़ैसला कर लिया."

मौन ज्ञान

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राधे मां के वालकेश्वर में स्थित 'दर्शन स्थल' पहुंचने पर हमने देखा कि वहां मीडियाकर्मियों का जमावड़ा था और एक बड़े से द्वार के पीछे राधे मां के भक्तों का आना जाना लगा हुआ था.

हमें बाहर ही रोक दिया गया और मीडिया मैनेजर संजीव ने बताया कि पुलिस केस के चलते राधे मां को 14 तारीख़ तक किसी भी मीडियाकर्मी या किसी नए भक्त से मिलने नहीं दिया जा रहा है.

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इस बीच राधे माँ के सहयोगियों से मिले जिनमें टल्ली बाबा, छोटी मां और संजीव गुप्ता प्रमुख थे.

राधे मां के दर्शन के लिए पहले 'टल्ली बाबा' से मिलना और समय लेना ज़रूरी है, अपने नाम का अर्थ बताते हुए टल्ली कहते हैं, "पंजाब में टल्ली मंदिर की घंटी को कहा जाता है और मैं भी माता की घंटी हूँ, मुझे बजाओ माता सुनेगी."

संजीव बताते हैं,"माता ज़्यादा बोलती नहीं हैं, बल्कि मौन रहकर ही ज्ञान देती हैं और जो उनके करीब रहता है उसे माता की बातें समझ में भी आ जाती हैं."

ट्रस्ट

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राधे मां की संपत्ति की जानकारी देते हुए टल्ली और संजीव बताते हैं कि वो फ़ाइनेंशली 'ज़ीरो' हैं.

माता के ट्रस्ट का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं,"राधे मां के पास भक्तों से जितना चढ़ावा या दान आता है वो उसी दिन उसे अपने ट्रस्ट की सहायता से लोगों में बांट देती हैं और आज भी उनके ट्रस्ट की बैलैंस शीट ज़ीरो है."

राधे मां के सेवादारों के मुताबिक़, उनके पास रहने के लिए भी मकान नहीं है और मुंबई में मौजूद दो आश्रम या दर्शन स्थल में से एक बिज़नेसमैन संजीव गुप्ता का घर है और दूसरा संजीव की बहन का घर है.

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संजीव 'एमएम मिठाई वाले' गुप्ता परिवार से ताल्लुक रखते हैं और गुप्ता परिवार को 'राधे मां' का मुख्य सेवादार माना जाता है.

वैसे पंजाब में मुकेरियां में 'राधे मां' के नाम से एक मंदिर था, लेकिन वह भी राधे मां ने अपने किसी सेवादार को दान कर दिया है.

विवाद

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फ़िलहाल राधे मां पर अश्लीलता और दहेज उत्पीड़न के आरोप लगे हैं और ख़बर लिखे जाने तक मुंबई हाई कोर्ट में संजीव गुप्ता और टल्ली बाबा के ख़िलाफ़ भी तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास से डराने से संबंधित याचिका डाली जा चुकी थी.

लेकिन इन विवादों से माता के भक्त परेशान नहीं हैं. वे कहते हैं, "हमारी तैयारी पूरी है, ये जो दहेज का मामला हमारे ख़िलाफ़ है वो मेरे ही फ़ुफेरे भाई की पत्नी ने लिखवाया है और ये मामला लव मैरिज का था तो दहेज की तो बात ही नहीं आती."

फ़िलहाल दहेज और मानसिक प्रताड़ना मामले में राधे मां को पुलिस के सामने 14 अगस्त को पेश होना है.

अगर 'राधे मां' की तैयारी पूरी है तो वो 14 अगस्त से पहले ही पुलिस से क्यों नहीं मिल लेती, इसके जवाब में संजीव कहते हैं, "हमें इतनी भी जल्दी नहीं है पुलिसवालों से मिलने की, उन्हें भी इंतज़ार करने दो."

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'भड़काऊ' कपड़ों के आरोप के मामले में माता के सेवादार कहते हैं, "हां 'मां' कई बार विदेशी भक्तों के द्वारा भेजे गए कपड़े, उनका दिल रखने के लिए पहन लेती हैं लेकिन इसमें ग़लत क्या है. क्या किसी को मॉडर्न कपड़े पहनने की छूट नहीं है?"

परिवार

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बतौर 'राधे मां' तो सुखविंदर कौर किसी को भी अपना परिवार मानने से इनकार करती हैं, लेकिन बतौर सुखविंदर कौर, उनके दो बेटे भूपिंदर और राजिंदर सपरिवार पुणे में रहते हैं और अपनी-अपनी फ़ैक्ट्रियों के मालिक हैं.

भूपिंदर और राजिंदर के परिवार में पत्नियों के अलावा एक-एक बेटे हैं, लेकिन वे सुखविंदर को 'दादी' नहीं बल्कि 'गुरू मां' बुलाते हैं.

राधे मां के पति रहे मोहन सिंह भी अब उन्हें 'गुरू मां' ही बुलाते हैं और राधे मां अब अपने पति के परिवार को छोड़कर मुंबई में मौजूद गुप्ता परिवार के नाम पर बने दर्शन स्थलों में रहती हैं.

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इन दोनों ही जगहों पर राधे मां के रहने से आस-पास के लोगों को ट्रैफ़िक जाम, भीड़ और प्राइवेसी संबंधी दिक्कतें आती हैं और इसकी कई बार शिकायत भी की गई है.

कई पड़ोसियों का मानना है कि मीडिया की वजह से 'राधे मां' को बेवजह की लोकप्रियता मिल रही है जो आगे जाकर और अंधविश्वास फैलाएगी.

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