नोटों से फैल रही हैं गंभीर बीमारियाँ ?

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क्या आपको पता है कि जो रुपए आप हाथ में लेते हैं वो आपके स्वास्थ्य के लिए कितने हानिकारक हैं. इन रुपयों में टीबी, डिसेन्ट्री और अल्सर फैलाने वाले खतरनाक संक्रमण मौजूद हो सकते हैं.

ख़ास तौर पर उन रुपयों में जो पुराने हो रहे हैं या फिर जो ज़्यादा चलते हैं जैसे दस, बीस, और सौ रुपए के नोट.

यूँ समझ लीजिए कि इन नोटों के ज़रिए आपके अंदर बीमारियां पहुँच रही हैं.

तो सवाल उठता है कि क्या पैसों की बजाय डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के ज़रिए खरीदारी करना सेहत के लिए बेहतर है ?

'इंस्टिट्यूट ऑफ़ जियोनॉमिक्स एंड इंटिग्रेटिव बायोलॉजी' यानी 'आईजीआईबी' के वैज्ञानिकों ने इन नोटों की डीएनए जांच में ख़तरनाक संक्रमण फैलाने वाले कुल 78 रोगाणुओं का पता लगाया है.

इसमें 'राइबोसोमल आरएनए' नामक तकनीक अपनाई गई. इससे पहले इस तकनीक से कम्प्यूटर, साबुन और बाजार में बिकने वालों कपड़ों की जांच में भी इसी तरह के संकेत मिले हैं.

कीटाणु मुक्त नोट

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'आईजीआईबी' के वैज्ञानिक मानते हैं कि शोध के नतीजे चौंकाने वाले हैं क्योंकि इनका सरोकार हर इंसान से है.

शोधकर्ताओं की पांच सदस्यों वाली टीम का नेतृत्व करने वाले 'आईजीआईबी' के वरिष्ठ वैज्ञानिक एस रामचंद्रन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि शोध के बाद इतना तो समझ में आया है कि ज़्यादा चलने वाले नोटों को कीटाणु मुक्त करना ज़रूरी है.

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Image caption वैज्ञानिक रामाचंद्रन का कहना है कि शोध का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि इस शोध में नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया है जिससे परिणाम भी जल्द ही सामने आ गए.

इससे पहले नमूनों को प्रयोगशाला में भेजा जाता था और इस प्रक्रिया में काफ़ी समय लगा करता था.

वो कहते हैं, "शोध के परिणाम चौंकाने वाले ज़रूर हैं क्योकि रुपयों से सबका सरोकार है. नोट एक दिन में कई हाथों से होकर गुज़रते हैं और इस प्रक्रिया में वो रोगाणु भी एक इंसान से दूसरे इंसान तक फैलाने का काम करते हैं. इनमे वो नोट ज़्यादा संक्रमित हैं जो ज़्यादा चलते हैं."

ख़ास मशीनें

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शोध के लिए नोटों के नमूनों को दिल्ली के बाज़ारों, रेहड़ी वालों और सब्ज़ी की दुकानों से इकठ्ठा किया गया था.

कई देशों में करंसी नोटों को रोगाणु मुक्त करने की व्यवस्था है. इसके लिए मशीनें भी आती हैं जिनसे नोटों को रोगाणु मुक्त किया जाता है.

जापान सहित कई देश हैं जो समय समय पर अपनी करंसी को विशेष मशीन के ज़रिए कीटाणु मुक्त करते रहते हैं. मगर भारत में इसका उपयोग नहीं होता है. अलबत्ता पुराने नोटों को बदलने की व्यवस्था ज़रूर है.

रामचंद्रन का मानना है कि अब शोध का दायरा और बढ़ाना चाहिए क्योंकि यह पता लगाना और भी ज़रूरी हो गया है कि नोटों में पाए जाने वाले रोगाणुओं पर किन एंटीबायोटिक्स का असर नहीं होता है.

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