नावेद को पकड़ने वाले नौजवानों से मुलाक़ात

विक्रमजीत हमेशा से पुलिस में भर्ती होना चाहते थे मगर सिर्फ नौवीं पास होने की वजह वो ऐसा नहीं कर पाए, लेकिन अब उन्हें पुलिस की नौकरी मिल गई है.

उनके साथ राकेश शर्मा को भी नौकरी मिली है जो अभी तक उधमपुर के पास अपने गांव के मंदिर में पुजारी थे.

विक्रमजीत और राकेश- वो दो ग्रामीण युवक हैं जिन्होंने पाँच अगस्त को नावेद को पकड़ कर पुलिस को सौंपा था, वही नावेद जिसे 'पाकिस्तानी आतंकवादी' बताया जा रहा है.

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विक्रमजीत और राकेश शुक्रवार की सुबह बीबीसी के दिल्ली स्टूडियो पहुँचे.

उन्होंने बताया कि जब पाँच अगस्त की सुबह वो अपने घर से बाहर निकले थे तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि इसके बाद उनकी ज़िंदगी एक दूसरी करवट ले लेगी.

कैसे पकड़ा?

विक्रमजीत कहते हैं, "सुबह लगभग आठ बजे का वक़्त रहा होगा. मुझे जम्मू जाना था मगर मुझे पता चला कि हाईवे पर जाम लगा है. जैसे ही नीचे की तरफ उतरा तो गोलियां चलने की आवाज़ें सुनाई दीं. मैं मंदिर के पास पहुँचा ही था कि अचानक हाथों में एके - 47 लिए आदमी को देखकर मैं घबरा गया. उसने मुझसे बंदूक की नोक पर अपने साथ चलने को कहा. मैंने पूछा, कहाँ जाना है? तो उसने कहा ऐसी जगह जो सुरक्षित हो."

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फिर पूरी दास्ताँ सुनाते हुए राकेश शर्मा बताया कि कुछ ही दूरी पर उन्हें भी बंदूक की नोक पर बंधक बना लिया गया था.

कुछ और भी मज़दूर थे जिन्हे बंधक बनाया गया था. राकेश और विक्रमजीत ने बताया कि बंदूकधारी को प्यास भी लगी थी और उन लोगों ने उसे पानी भी पिलाया था.

हालांकि जिस जगह नावेद ने खाना खाया और पानी पिया, उस जगह पर वो कुछ देर और रुकना चाहता था. मगर जब उसकी नज़र ऊपर पहाड़ पर पड़ी तो उसने सुरक्षा बलों के जवानों को आते देखा.

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विक्रमजीत ने बताया, "यही वक़्त था जब सुरक्षा बलों को आते देख उसने हम पर हमला कर दिया. जैसे ही उसने बंदूक उठाई राकेश ने उसकी बाहें पकड़ लीं. तब तक मैंने उसकी बंदूक छीन ली. इसी बीच उसकी बंदूक से गोली चल गई. बाक़ी के बंधक बने मज़दूर भाग गए जबकि हम दोनों उससे गुत्थम-गुत्था करते रहे. हमें तो पहले डर लगा कि वो हमें मारेगा."

हीरो जैसा सम्मान

राकेश और विक्रमजीत पहली बार दिल्ली आए और अपने पहले दौरे में ही जहां भी वो गए उन्हें हीरो जैसा सम्मान मिला.

Image caption विक्रमजीत हमेशा से पुलिस में भर्ती होना चाहते थे

लोगों ने उनकी बहादुरी को सराहते हुए उन्हें सर-आँखों पर बैठा लिया. इसी बीच वो मुंबई भी हो आए जहाँ बॉलीवुड की हस्तियों ने भी उन्हें सम्मानित किया.

विक्रमजीत कहते हैं, "मैं शुरू से ही चाहता था कि पुलिस या फ़ौज में नौकरी करूँ, मगर मुझे क्या पता था कि मेरी इच्छा ऐसे वक़्त में पूरी होगी जब मुझे उम्मीद तो बिलकुल ही नहीं थी."

वहीं राकेश तो मानकर ही चल रहे थे कि उनकी बाक़ी की ज़िंदगी गाँव के मंदिर में बतौर पुजारी ही कटेगी जबकि उनके सपने बड़े रहे हैं.

अब जम्मू-कश्मीर की सरकार ने दोनों को बहादुरी के लिए शौर्य चक्र और पुलिस में नौकरी देने की घोषणा की है.

राकेश और विक्रमजीत कहते हैं कि वो नौकरी सिर्फ पैसों के लिए नहीं करना चाहते हैं, बल्कि उनके दिल और भी कुछ बड़ा कर गुज़रने का जज़्बा है.

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