बॉलीवुड ‘वॉरियर’, पर बहुत बुरी भी नहीं है भाई

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फिल्म: ब्रदर्स

निर्देशक: करण मलहोत्रा

कलाकार: अक्षय कुमार, सिद्धार्थ मलहोत्रा

रेटिंग: ***

आप सिनेमा हाल के भीतर घुसें इससे पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि कि इंटरवल के बाद के भाग में ये मारधाड़ से भरा हुआ है - कई लोगों के बीच रिंग में ख़ूनी जंग होती है, देखने वाले वहां मौजूद हैं और दो लोग जो इसकी कमेंट्री कर रहे हैं वो बहुत ज़्यादा उत्साहित हो जाते हैं. साथ ही ये भी जान लेना ज़रूरी है कि ये 158 मिनट लंबी फ़िल्म है.

मुझे नहीं पता है कि इससे आपका जोश ठंडा हो गया है या फ़िल्म देखने की इच्छा तेज़ हो गई है. मुझे ये मालूम है कि जिनकी दिलचस्पी टोटल नन स्टॉप एक्शन में है उन्हें ये पसंद आएगी. टीएनए, वर्ल्ड रेस्लिंग इंटरटेनमेंट यानी डब्लूडब्लूई के मुक़ाबले बहुत अधिक ख़ून-ख़राबे वाला होता है.

ख़ून खराबा

मैं आंखें फाड़े वहां बैठा था, भौंचक्का सा ये जानकर ये यूट्यूब पर इस तरह के ख़ूनी मार धाड़ कितना प्रचिलित है. ये हमारे लोकप्रिय ‘सब कल्चर’ का हिस्सा है और हमारे बारे में काफ़ी कुछ कहता है.

भारत में ‘टीएनए’ को सिर्फ़ सोनी टेलीवीजन नेटवर्क दिखाता है. वही इस तरह के कार्यक्रमों का बड़ा स्पॉन्सर भी है. इसके लोगों को हर जगह देखा जा सकता है.

मैंने सुना है कि यही चैनल ‘अल्टीमेट फ़ाइटिंग चैंपियनशिप’ का भारतीय संस्करण तैयार करने की योजना भी बना रहा है. ख़ैर, हम आजकल बड़े पैमाने पर जो कुछ देख रहे हैं, यह उससे अलग नहीं होगा.

मेरे मन में यह आशंका उठती है कि कहीं यह फ़िल्म यह जानने की कोशिश तो नहीं है कि लोग इस तरह के कार्यक्रम को कितना और कैसे पसंद करते हैं.

‘मिक्स्ड मार्श आर्ट्स’

आप इस मामले में कभी कभी ही ग़लती करते हैं. यशराज ने इस तरह की ग़लती नैस्कर पर बनी फ़िल्म ‘ता रम रम पम’ में की थी. पर इस फ़िल्म को बनाने वालों ने ये ग़लती नहीं की है.

यह फ़िल्म एमएमए यानी ‘मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स’ पर आधारित है. इसमें यह बताया गया है कि किस तरह भारत के गली कूचों में मारपीट होती रहती है.

फ़िल्म का किरदार किरण कुमार सभ्रांत विजय माल्या और ललित मोदी के बीच की चीज़ है.

वे अंतरराष्ट्रीय मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स के स्थानीय प्रायोजक हैं. मुझे लगता है कि वे इसे आरटूएफ यानी ‘राइट टू फ़ाइट’ भी कह सकते हैं.

यह मारपीट काफ़ी अच्छे तरह से दिखाई गई है. इसकी चालें काफ़ी साहसिक हैं और सच्चाई के इतनी क़रीब हैं कि टेलीविज़न देखने वाले इस पर यक़ीन कर सकते हैं.

निश्चित तौर पर कई बार संस्पेंस भी बरक़रार रखा जाता है. यह मामूली बात नहीं है.

'खिलाड़ियों के खिलाड़ी'

पूरी फ़िल्म के और मुख्य रूप से मारपीट के मुख्य किरदार अक्षय कुमार हैं. ‘इंटरनेशनल खिलाड़ी’, ‘खिलाड़ी 420’, ‘खिलाड़ी 786’ और इस तरह की दूसरी फ़िल्मों में बीते दो-ढाई दशकों से अक्षय मारपीट के सीन करते रहे हैं.

पुरानी फ़िल्मों के दर्शक 1996 में बनी फ़िल्म ‘खिलाड़ियों के खिलाड़ी’ में उनके कारनामे को याद कर सकते हैं. रिंग के बीच में रहने का बहुत फ़ायदा उन्हें मिला है.

अक्षय के करियर की ख़ासियत यह रही है कि उनके प्रोड्यूसरों ने और किसी चीज पर जैसे स्क्रिप्ट, सेटिंग, कैमरा, आर्ट डिजायन वग़ैरह पर ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं महसूस की है. सिवा उनके और उनका काम रहा है दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींच लाना.

यह फ़िल्म इस मामले में एक महत्वपूर्ण अपवाद है.

जिम ज्वाइन करने की इच्छा

सिद्धार्थ मलहोत्रा इस फ़िल्म में अक्षय के अपोजिट कलाकार हैं. उन्हें शायद जानबूझ कर इस तरह प्रशिक्षित किया गया है कि वे कुछ कुछ शाहरुख ख़ान की तरह दिखते हैं.

पर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर के फ़ाइटर बनने की ट्रेनिंग लेते हुए देखकर आपकी भी वाकई इच्छा होने लगेगी कि तुरंत जिम में घुस जाएं.

यह विस्तार से बताने का कोई मतलब नहीं है कि इस फ़िल्म में क्या होता है. आप पहला सीन ही देख कर समझ जाएंगे कि आगे क्या होगा.

‘वॉरियर’

यदि आपने 2011 में बनी फ़िल्म ‘वॉरियर’ नहीं देखी हो जिसकी ये फ़िल्म कापी है.

यह फ़िल्म ‘वॉरियर’ की नकल ही तो है. जिन लोगों ने मूल फ़िल्म देखी हो और उन्हें वह अच्छी लगी हो, उन्हें तो इस ड्रामाई फ़िल्म से दूर रहना चाहिए.

यह करण मलहोत्रा की पहली फ़िल्म ‘अग्निपथ’ के रीमेक को देखने और ‘स्कारफ़ेस’ को याद करने जैसा है.

बॉलीवुुड की इस फ़िल्म के शुरू में ही हॉलीवुड की कंपनी - लायन्सगेट का साइन देखकर बदलते वक़्त का एहसास होता है. इसे करण जौहर और नीदरलैंड की कंपनी एंडेमॉल ने मिलकर बनाया है.

करण इसके पहले भी ‘स्टेप मॉम’ की हिंदी रीमेक ‘वी आर फ़ैमिली’ 2010 में बना चुके हैं.

कहानी दो भाइयों की

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अलग अलग माताओं से जन्म दो भाई की तरह हैं - अक्षय और सिद्धार्थ. उनके पीछे की कहानी को दो गानों के माध्यम से अच्छी तरह से पिरोया गया है.

उनसे अलग हुआ शराबी बाप है, जिसकी भूमिका जैकी श्रॉफ़ ने की है. शेफ़ाली शाह ने मां की भूमिका निभाई है जो इन दोनों भाइयों की देखरेख करती है.

अक्की कुमार की उत्तेजना निश्चित तौर देखने की है, जिसके बारे में हम जानते भी हैं. रिंग के भीतर और उसके पास के दृश्य उन सबसे कहीं बेहतर हैं जो अबतक हमने देखा है.

हॉल से निकलते हुए मुझे लगा कि यह मेरी पसंद की फ़िल्म नहीं हो सकती है.

पर मैंने अपने आप से कहा, “चलो ब्रदर, बहुत बुरी भी नहीं है.”

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