पीएम नरेंद्र मोदी के वादों का 'अर्धसत्य'

  • 14 अगस्त 2015
 लाल क़िले से भाषण करते नरेंद्र मोेदी इमेज कॉपीरइट AP

पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर लाल क़िले से दिए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई वादे किए थे और कई योजनाओं का ऐलान किया था.

एक साल बाद इन वादों पर वो कितने खरे उतरे हैं और कितनी योजनाओं पर अमल हुआ है?

इन योजनाओं पर हुई कार्रवाई को सरकारी आंकड़ों के तराज़ू में तौलें, तो मोदी सरकार मोटे तौर पर अपने वादों पर खरी उतरती नज़र आती है.

कहते हैं, तस्वीरों की तरह ही आंकड़ें भी झूठ नहीं बोलते. लेकिन अकसर इन आंकड़ों के पीछे का सच दिखाई नहीं देता है.

आंकड़ों का सच

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उदाहरण के तौर पर, मोदी ने 15 अगस्त 2014 के अपने भाषण में 'प्रधानमंत्री जनधन योजना' की घोषणा की थी.

योजना शुरू हुई और इस साल जून के अंत तक देश भर में लगभग 18 करोड़ नए बैंक खाते खुले.

डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड ग़रीबों में बांटे गए, ताकि सरकारी सब्सिडी सीधे उनके खाते में जाए और वो इन कार्ड का इस्तेमाल कर सकें.

एक साल से कम समय में 18 करोड़ लोगों के बैंक खाते खोलना सराहनीय है. इन आंकड़ों से सरकार की कोशिशें स्पष्ट होती हैं.

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लेकिन आंकड़ों से हट कर इन खातों की तह में जाने से मालूम होता है कि 47 फ़ीसदी खातों में पैसे नहीं हैं.

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अगर 100 कुएं खोदें और 50 कुओं में पानी न हो तो इन कुओं के खोदने का क्या फ़ायदा? बिजली के खंभे लगा दें और बिजली की सप्लाई न हो, तो इससे लोगों को कोई लाभ नहीं होगा.

स्वच्छ भारत अभियान का सच

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प्रधानमंत्री ने उसी दिन 'स्वच्छ भारत' अभियान की घोषणा भी की थी. इसे 2 अक्तूबर को शुरू कर दिया गया. इस योजना के तहत प्रधानमंत्री ने कहा था कि 15 अगस्त 2015 तक देश के सभी सरकारी स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट बन जाएंगे.

जो लोग सिर्फ़ आंकड़ों पर नज़र रखते हैं, वे सरकार की पीठ ठोंक सकते हैं. सरकारी आंकडों के मुताबिक़, लड़कों के लिए 85 फ़ीसदी स्कूलों में शौचालय बन चुके हैं, लड़कियों के लिए 91 प्रतिशत स्कूलों में टॉयलेट बन कर तैयार हैं.

लेकिन, जब आपको यह पता चले कि इनमें से लगभग 70 फ़ीसदी शौचालयों में पानी नहीं है, तो आपको मायूसी हो सकती है.

वादों का अाधा सच

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यह आंकडों का अर्धसत्य है. यह मोदी सरकार के वादों का भी अाधा सच है. प्रधानमंत्री ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में 35 वर्ष से कम के युवाओं को रोज़गार दिलाने और उन्हें नए कौशल की ट्रेनिंग का इंतजाम करने का वाद किया था.

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प्रधानमंत्री ने 'स्किल इंडिया' की योजना का उद्घाटन भी किया. इस योजना के तहत हर साल 24 लाख युवकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा.

लेकिन देश भर में हर साल 1.2 करोड़ लोगों को नौकरियों की ज़रूरत होगी. इसके इलावा खेती करने वाले 26 करोड़ से ज़्यादा युवाओं को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है.

'मेक इन इंडिया'

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'मेक इन इंडिया' योजना मोदी सरकार की सब से बड़ी स्कीम है, जिसका ऐलान उन्होंने पूरे जोश के साथ स्वतंत्रता दिवस पर किया था.

इस योजना के तहत विदेशी निवेश तो ठीक है, लेकिन अगर योजना को कामयाब बनाना है तो बुनियादी ढांचों को ठीक करना होगा.

कारखाने और उद्योग के लिए ज़मीन चाहिए. मोदी सरकार अब तक इसमें बुरी तरह नाकाम रही है.

सरकार ने नए उद्योग और उत्पादन के लिए भूमि अधग्रहण विधेयक तैयार तो किया, पर उसे संसद में अब तक पारित नहीं करवा पाई है.

नए वादे?

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हमारी जानकारी के मुताबिक़, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिए जाने वाले अपने दूसरे भाषण में प्रधानमंत्री अपने वादों को पूरा करने का दावा करेंगे. इस बार भी उनका भाषण जोश से भरा होगा और कई नए वादे किए जाएंगे.

कम ही लोगों को याद होगा कि नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2013 को भुज में स्वतंत्रता दिवस पर एक जोशीला भाषण दिया था. वो उस समय गुजरात के मुख्य मंत्री थे, लेकिन भाषण का लहजा प्रधानमंत्री वाला था.

उस समय उनके समर्थकों ने कहा यह अगले साल के स्वतंत्र दिवस के भाषण का एक ड्रेस रिहर्सल है.

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उस दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण काफी फ़ीका था. मोदी ने अपने जवाबी भाषण में मनमोहन सिंह पर सीधा हमला किया था और अपने समर्थकों की वाहवाही लूटी थी.

नरेंद्र मोदी को अधिकृत रूप से भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद का उमीदवार उस समय तक घोषित नहीं किया गया था. उन्होंने उस दिन के भाषण के बाद इस पद का सेहरा अपने सिर पर ज़रूर पहन लिया था.

जोशीला भाषण

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मोदी ने एक साल बाद यानी 15 अगस्त 2014 को लाल क़िले से प्रधानमंत्री के रूप में अपना पहला भाषण दिया. उन्होंने उस दिन इतना ज़बरदस्त भाषण दिया कि उनके विरोधी भी उनसे प्रभावित हुए बिना न रहे. मोदी ने कहा था, वो प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक हैं.

उस समय उन्हें प्रधानमंत्री बने हुए लगभग तीन महीने हो चुके थे. भारतीय जनता पार्टी में आम चुनाव में उनकी भारी जीत का नशा पूरी तरह नहीं उतरा था. हाँ, कुछ लोग यह ज़रूर कहने लगे थे कि मोदी सरकार यूपीए-3 है.

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उनका मतलब यह था कि उस समय तक नरेंद्र मोदी ने किसी बड़ी योजना का ऐलान नहीं किया था और यूपीए-2 सरकार की योजनाओं को ही आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे.

एक साल बाद मोदी के आलोचकों की तादाद काफ़ी बढ़ी है. अबकी बार नरेंद्र मोदी के वादों और उन्हें पूरा करने के बीच के कथित फ़ासलों पर भी प्रतिक्रियाएं होंगीं. मोदी तैयार हैं, तो उनके विरोधी भी सतर्क हैं.

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