ये है देश का सबसे साफ़ सुथरा शहर

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हाल ही में शहरी विकास मंत्रालय की ओर से मैसूर को भारत का सबसे साफ़ सुथरा शहर घोषित किया गया है.

लेकिन इस घोषणा को लेकर लोगों में हैरानी और ख़ुशी के मिलेजुले भाव देखे जा सकते हैं.

क्या मैसूर भारत का सबसे साफ़ शहर है? जब भी इस पर चर्चा होती है तो हर बात में किंतु-परंतु ज़रूर आता है.

इस ऐतिसाहिक शहर के लोगों से अगर चर्चा करें तो लगभग सभी की बातों में ‘शायद, यह शहर और भी साफ सुथरा हो सकता है’ की कसक दिख जाएगी.

हालांकि इनमें से किसी को भी इस बात पर संदेह नहीं है कि यह भारत में सबसे साफ सुथरा शहर है.

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देवराजा मार्केट के पास रहने वाले एक बिजनेसमैन स्वरूप बीएस ने बीबीसी को बताया, “मैसूर को सबसे साफ़ शहर घोषित किया जाना आश्चर्य है. लेकिन मैं चेन्नई, लखनऊ और कोलकाता भी गया हूँ, पर मैसूर उनसे कहीं अधिक साफ़ सुथरा है.”

हालांकि अन्य लोगों की तरह स्वरूप की बात में भी किंतु परंतु है.

वो कहते हैं, “यह शहर जितना 10-12 साल पहले साफ़ था, अब नहीं है. कचरे के निपटारे में अब भी बहुत सारी ख़ामियां हैं.”

इंजीनियर सुचित्रा एन कहती हैं, “मैसूर को सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जाना गर्व की बात है. हालांकि इसमें सुधार की और गुंजाइश है.”

वहीं मैसूर ग्राहक परिषद के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर चंद्र प्रकाश का कहना है, “शहर को साफ़ सुथरा रखने की यहां पुरानी परंपरा रही है. हर नागरिक अपने घर के चारों ओर साफ़ सफ़ाई कर इस काम में अपना योगदान देता है.”

पहला योजनाबद्ध शहर

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Image caption मैसूर सिटी बस स्टैंड.

उनकी इस बात पर संदेह करने का कोई कारण भी नहीं है. इस परंपरा का गवाह है मैसूर का इतिहास.

मैसूर देश का पहला ऐसा शहर है जहां 1904 में ही सिटी इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट बोर्ड (सीआईटीबी) बन गया था.

सीआईटीबी पर अंडरग्राउंड सीवर और अंडरग्राउंड जलापूर्ति समेत अन्य सभी शहरी मामलों की निगरानी की ज़िम्मेदारी है.

यह वही समय था जब यहां नालवाड़ी कृष्णराजेंद्र वॉडेयार का शासन था. वो वॉडेयार वंश के चौथे शासक थे. उन्होंने ही आधुनिक मैसूर की नींव रखी थी.

प्रकाश कहते हैं, “चंडीगढ़ से भी बहुत पहले, यह देश का पहले बना योजनाबद्ध शहर था.”

शहर में हर सुबह नियमित रूप से घरों से ठोस कचरे को इकट्ठा किया जाता है.

प्रोफ़ेसर प्रकाश बताते हैं, “यह आदत सी बन गई है. और ठोस कचरे का प्रबंधन करने के लिए जवाहरलाल नेहरू नेशलनल अरबन रीन्यूवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के साथ मिलकर इनको अलग अलग करने के केंद्र बने हैं.”

यह साफ़ नहीं है कि किसी शहर को स्वच्छ घोषित करने से पहले केंद्र सरकार ने किन मानदंडों को ज़रूरी माना है.

व्यवस्थित

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लेकिन मैसूर सिटी कार्पोरेशन के कमिश्नर डॉ. सीजी बेटसुरमठ मानते हैं,, “यह तय करने में चार मानदंडों को अपनाया गया. ये हैं- ठोस कचरा प्रबंधन, नियमित साफ़ सफ़ाई का कार्य, खुले में शौच का ख़त्म होना और पेयजल की आपूर्ति.”

डॉ. बेटसुरमठ के मुताबिक़, “हमारे पेयजल की गुणवत्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार है. हम हर रोज प्रति व्यक्ति 180 लीटर पानी उपलब्ध कराते हैं. वर्तमान में 215 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) की मांग है, जबकि हम 250 एमएलडी पानी की आपूर्ति कर रहे हैं.”

उनके अनुसार, “हमारे पास तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और 1560 किमी लंबी अंडरग्राउंड सीवरलाइन है. हम लगातार इसमें सुधार कर रहे हैं. कुल 402 टन कचरे में से 60 प्रतिशत को कम्पोस्ट में बदला जाता है, जिसे किसानों को बेचा जाता है. हमारे पास आठ ज़ीरो वेस्ट मैनेजमेंट सेंटर हैं.”

आबादी

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हर कोई मानता है कि मैसूर के साफ सुथरे होने में कम आबादी भी एक बड़ा कारण है. 2011 की जनगणना के अनुसार, शहर की आबादी थी 9.12 लाख. वर्तमान में इसके बढ़कर 12 लाख होने का अनुमान है.

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू की तरह मैसूर में पूरे देश भर से बड़ी संख्या में लोग नहीं आते हैं.

प्रोफ़ेसर प्रकाश कहते हैं, “बाहर से आई जितनी बड़ी आबादी का बेंगलुरू ने सामना किया है, वो मैसूर ने नहीं किया है. देश के अन्य हिस्सों से आने वालों के कारण बेंगलुरू के बुनियादी ढांचे पर बहुत दबाव पड़ता है. उस लिहाज से देखें तो मैसूर भाग्यशाली है.”

डॉ. बेटसुरमठ भी मानते हैं कि, “मैसूर सौभाग्यशाली है. बाहर से आने वाली आबादी भी एक कारण है. लेकिन शहत तो बड़ा हो ही रहा है. इसे और भी बड़ी चुनौतियों का सामना करने को तैयार रहना होगा.”

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