फ़ोटोग्राफ़ी, स्टूडियोज़ और बदलाव!

  • 19 अगस्त 2015
कैमरा

'अगर कोडेक बंद हो सकता है तो हम तो बहुत छोटे से हैं.'

ऐसा कहना है पवन महाटा का जिनकी राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस में 100 साल पुरानी फ़ोटोग्राफ़ी की दुकान और स्टूडियो है.

'वर्ल्ड फ़ोटोग्राफ़ी डे' के मौके पर बीबीसी ने बात की कुछ पुराने स्टूडियोज़ से, जिन्होंने फ़ोटोग्राफ़ी को बदलते हुए देखा है.

बदलाव

राजधानी दिल्ली में 100 साल पुराना स्टूडियो है 'माहटा एंड को'. इसकी देखरेख पवन माहटा कर रहे हैं.

साल 1986 में पवन माहटा और उनके भाई ने मिलकर डिजिटल प्रिंटिंग का काम शुरू किया था और तभी उन्हें पता चल गया था कि एक दिन तकनीक कैमरे की दुनिया को काफ़ी बदल देगी.

पिछले तीन दशकों में फ़ोटोग्राफ़ी में काफ़ी बदलाव आया है और मोबाइल फ़ोन के आने से कैमरा का शटर हर किसी के लिए खुल गया है.

पवन महाटा कहते हैं कि पहले लोग छुट्टी पर जाने के लिए कैमरा ले जाते थे पर अब मोबाइल फ़ोन ले जाते हैं.

वो बताते हैं, "पहले तस्वीरें सोच कर खींची जाती थी. अब फोटो खींचते वक़्त सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती."

"पहले फ़िल्म खरीदनी पड़ती थी, डेवलप करवानी पड़ती थी और एक जगह की दो से तीन फोटो ही खींची जाती थी पर अब जितनी मर्ज़ी उतनी फ़ोटो खींचिए क्योंकि सब आप फ़ोन पर रख सकते हैं और कइयों को भेज सकते हैं."

पर क्या आज भी इनका स्टूडियो चल रहा है?

पवन ने बताया, "स्टूडियो अब भी चलता है पर पहले जितने लोग नहीं आते. लोग पासपोर्ट फ़ोटो, मेट्रिमोनियल फ़ोटो और फ़ैमिली फ़ोटो के लिए भी आते हैं. पर आज के वक़्त में हम ये सोचते हैं कि क्या फ़ोटोग्राफ़ी को जारी रखना फ़ायदेमंद है या नहीं."

इलेक्ट्रॉनिक्स

जहां पवन महाटा फ़ोटोग्राफ़ी के बारे में सोच रहे हैं, वहीं दिल्ली के दूसरे स्टूडियो 'दास स्टूडियोज़' ने अपने आप को बदलते समय के साथ ढाल लिया.

'दास स्टूडियोज़' के किशन दास ने फ़ोटोग्राफ़ी के साथ साथ इलेक्ट्रॉनिक्स सामान रखने शुरू कर दिए हैं.

किशन दास कहते हैं, " मेरे पिताजी सरकारी फ़ोटोग्राफ़र थे और देश विभाजन के बाद उन्होंने महंगे कैमरे इम्पोर्ट करने शुरू कर दिए और उसी के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स चीज़े भी इम्पोर्ट करना शुरू कर दिया. अंग्रेज़ों के जाने के बाद फ़ोटोग्राफ़ी में भारी गिरावट आई थी."

"पहले राजा महाराजा अपनी फ़ोटोज़ खिंचवाते थे पर धीरे धीरे वो भी कम हो गया क्योंकि उन दिनों ये काफ़ी महंगा था."

बदलता ज़माना

किशन दास कहते हैं कि साल 1980 में वो वीडियो कैमरा लाए और उन्होंने फिर शादियों की फ़िल्में बनाना शुरू कर दिया.

उन्होंने बताया, "आज हम कैमरा भी रखते हैं, मोबाइल भी बेचते हैं और शायद मोबाइल की ही वजह से कैमरे की बिक्री कम हुई है. ऑनलाइन शॉपिंग बहुत ही कम पैसों में कैमरा बेचते हैं तो हम से जो हो पा रहा है हम कर रहे हैं."

किशन दास बताते हैं कि स्टूडियो अभी भी चल रहा है पर साथ ही साथ इलेक्ट्रॉनिक्स का काम भी अच्छा चल रहा है.

तकनीक एक ऐसी चीज़ है जो हर क्षण बदल रही है पर इस बदलती तकनीक के साथ जो जितना बदलेगा उतना ही उसे फ़ायदा पहुंचेगा.

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