जिनके आंदोलन से बना डायन हत्या निषेध कानून

  • 20 अगस्त 2015
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Image caption पुरस्कार लेतीं बीरूबाला

असम में डायन हत्या जैसे अंधविश्वास के ख़िलाफ लड़ाई के पीछे एक ऐसी आदिवासी ग्रामीण महिला है, जिनके काम के आगे सरकार की व्यवस्था भी छोटी लगने लगती है.

एक ऐसी साहसी महिला, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी की परवाह किए बिना अब तक 42 से अधिक लोगों की जान बचाई है.

डायन के नाम पर सताए गए जिन पीड़ितों की उन्होंने मदद की है, उनमें ज़्यादातर महिलाएं हैं.

असम विधानसभा में पिछले गुरुवार को डायन हत्या निषेध विधेयक पारित हो जाने पर संतोष व्यक्त करते हुए बीरूबाला ने कहा कि नए क़ानून से लोगों में डर पैदा होगा.

लेकिन आदिवासी ग्रामीण इलाकों में इस अंधविश्वास के ख़िलाफ उनका आंदोलन अभी जारी रहेगा.

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62 वर्षीय बीरूबाला ने बीबीसी को बताया कि उनका यह संघर्ष घर से शुरू हुआ था, "1996 में मेरे बड़े बेटे को मलेरिया हो गया था. इलाज करवाने के बाद भी जब वह ठीक नहीं हुआ तो गांव के कुछ लोगों ने ‘देवधोनी’ (कथित अवतार) के पास ले जाने को कहा."

वो आगे कहती हैं, "उसने मेरे बेटे का इलाज करने की जगह तीन दिन के भीतर उसके मरने की बात कही थी. लेकिन मेरा बेटा बिल्कुल ठीक है. ‘देवधोनी’ ने कहा था कि मेरे बेटे को किसी पहाड़ी देवी की आत्मा ने पकड़ लिया है और तीन दिन बाद जब वह उसे छोड़ देगी उस समय उसके बेटे की मौत हो जाएगी."

बीरूबाला कहती हैं कि उस दिन ही वह समझ गई थीं कि झाड़-फूंक के नाम पर यह लोग ग्रामीणों में अंधविश्वास फैला रहे हैं.

तीन दिन के इंतज़ार के बाद जब उनके बेटे को कुछ नहीं हुआ तो पहली बार उन्होंने ऐसे अंधविश्वास के ख़िलाफ अपनी आवाज़ उठाई.

वह कहती हैं, "शुरुआत में गांव की महिला समिति से जुड़कर डायन संबंधी जागरूकता पर अंदर ही अंदर काम किया."

उन्होंने बताया, "इस दौरान मेरी मुलाक़ात कई ग़ैर सरकारी संगठनों के लोगों से हुई और डायन हत्या जैसे अंधविश्वास के ख़िलाफ़ आवाज़ धीरे-धीरे बुलंद होती चली गई."

समाज से बाहर निकाला

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वो कहती हैं कि उनके संघर्ष की शुरुआत इतनी आसान नहीं थी. ऐसे बाबाओं और झाड़-फूंक करने वालों के ख़िलाफ़ मुंह खोलने वालों को गांव वाले मार देते हैं.

गांव में पहले कई लोगों की इस तरह हत्या कर दी गई थी. असम-मेघालय के सीमावर्ती ग्वालपाड़ा ज़िले के ठाकुरभिल्ला जैसे एक छोटे से गांव में रहने वाली बीरूबाला को गांव वालों ने तीन साल तक समाज से बाहर कर दिया था.

डायन हत्या के ख़िलाफ़ मुंह खोलने के कारण बीरूबाला पर हमले भी हो चुके हैं. गांव छोड़ने की भी नौबत आ गई थी, लेकिन आज वही लोग बीरूबाला की पहचान पर गर्व करते हैं.

ठीक से प्राइमरी तक भी नहीं पढ़ीं बीरूबाला को उनके काम के लिए गुवाहाटी विश्वविद्यालय ने इसी वर्ष मानद डॉक्टरेट की डिग्री से नवाज़ा है.

'मिशन बीरूबाला'

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इस समय असम के जनजातीय ग्रामीण इलाकों में डायन हत्या जैसे अंधविश्वास के ख़िलाफ जागरूकता के लिए 'मिशन बीरूबाला' चलाया जा रहा है.

बीरूबाला के इस मिशन से सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं और असम के ज़िलों में काम कर रहे हैं.

असम महिला समता सोसाइटी, ग्वालपाड़ा ज़िले की कार्यक्रम समन्वयक मामोनी सइकिया का कहना है कि बीरूबाला बहुत साहसी महिला हैं और इसी वजह से अंधविश्वास के ख़िलाफ़ उनका 'मिशन बीरूबाला' आदिवासी भीतरी इलाकों में काफी असरदार साबित हो रहा है.

उन्होंने बताया, "ग्वालपाड़ा ज़िले में डायन हत्या के मामलों में काफ़ी कमी आई है, जहां पिछले कुछ वर्षो में सबसे अधिक घटनाएं हुई हैं."

क्या है नया क़ानून

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Image caption असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई.

नए क़ानून के अनुसार, किसी को डायन क़रार देना या फिर डायन के नाम पर किसी का शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न करने को संज्ञेय अपराध माना जाएगा और ग़ैर जमानती धाराएं लगाई जाएंगी.

डायन करार देने वाले अभियुक्तों को तीन से पांच वर्ष के करावास की सज़ा और उससे 50 हजार से पांच लाख रूपए तक का जुर्माना वसूलने का प्रावधान रखा गया है.

डायन के नाम पर किसी के साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न करने पर पांच से दस साल तक की सज़ा और अधिकतम पांच लाख रूपए के जुर्माने का प्रावधान है.

डायन बताकर हत्या करने के आरोप में धारा 302 लगाई जाएगी. डायन के नाम पर किसी को आत्महत्या के लिए विवश करने पर सात वर्ष से अधिकतम आजीवन करावास की सजा का प्रावधान है.

साथ ही ऐसे अपराध में दोषी व्यक्ति से 5 लाख रुपए जुर्माना भी वसूला जाएगा.

अगर किसी मामले की जांच में कोई लापरवाही सामने आई तो संबंधित अधिकारी के ख़िलाफ़ भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है.

मिले कई सम्मान

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असम सरकार के सर्वश्रेष्ठ सामाजिक उद्यमी पुरस्कार सहित बीरूबाला को कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं.

वो कहती हैं, "मेरी जैसी ग्रामीण महिला के लिए इन पुरस्कारों को उस दिन एक मतलब निकलेगा, जब यहां का ग्रामीण समाज जादू-टोने और डायन हत्या जैसे अंधविश्वास के चंगुल से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा."

असम विधानसभा में इस वर्ष पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से अब तक डायन हत्या के नाम पर हुई घटनाओं में राज्य में 77 लोगों की हत्या कर दी गई है.

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