भारत-पाकिस्तान बातचीत पर संशय के बादल

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पाकिस्तान उच्चायोग ने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ से मिलने के लिए बुलाया है. इस निमंत्रण से भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच प्रस्तावित बातचीत पर संशय के बादल मँडराने लगे हैं.

वैसे तो ऐसी बैठकों के बारे में कुछ भी नया नहीं क्योंकि पहले भी कश्मीर के अलगाववादी नेता भारत दौरे पर आए पाकिस्तानी नेताओं या अधिकारियों से मिलते रहे हैं.

लेकिन पिछले साल नरेंद्र मोदी की सरकार ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त के कश्मीरी अलगाववादी नेताओं से मुलाक़ात के कारण दोनों देशों के बीच सचिव स्तर की बातचीत रद्द कर दी थी.

तो क्या भारत इस बार भी ऐसा करेगा. शायद हाँ और शायद नहीं भी.

भारत की स्थिति

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भारत की तरफ से अभी इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है लेकिन बेशक भारत इसे एक उकसावे के रूप में देख रहा है.

पहले ही भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी पर संघर्ष विराम के उल्लंघन को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है.

दोनों ही देश एक-दूसरे पर संघर्ष विराम करने का आरोप भी लगाते रहे हैं. कुछ दिनों पहले ही पाकिस्तान की गोलाबारी के चलते पुंछ इलाके में छह कश्मीरियों की मौत हो गई थी.

हाल ही में पंजाब के गुरदासपुर और भारत प्रशासित कश्मीर के उधमपुर में हुए चरमपंथी हमलों के बाद दोनों देशों के संबंधों में वैसे ही खटास आ चुकी है.

'पाकिस्तानी चरमपंथी' नावेद को कश्मीर के उधमपुर में पकड़ने के बाद भारत पाकिस्तान को नए सिरे से घेरने की पूरी तैयारी में होगा.

छवि पर असर

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अगर भारत सरकार इस उकसावे के बावजूद एनएसए स्तर की वार्ता को आगे बढ़ाती है तो ऐसे में मोदी सरकार का विरोध कर रहे लोगों को एक नया हथियार मिल जाएगा.

वो सरकार से यही सवाल पूछेंगे कि आख़िर पिछले साल अगस्त के बाद क्या बदल गया कि ये बातचीत हो रही है.

हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि भारत सरकार इस बार की वार्ता का बहिष्कार नहीं करेगी. यह भारत का तरीका हो सकता है पाकिस्तान सरकार पर दबाव कम करने के लिए.

रूस के उफा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के साझा बयान के बाद नवाज़ शरीफ की मुश्किलें बहुत बढ़ गईं थीं.

उनके बयान के बाद पाकिस्तानी में विपक्षी पार्टियों और कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने उनकी ख़ूब आलोचना की थी क्योंकि उस बयान में जम्मू-कश्मीर का ज़िक्र नहीं था.

कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली ग़िलानी ने तो पाकिस्तान उच्चायुक्त द्वारा 21 जुलाई को 'ईद मिलन' पार्टी के न्यौते को भी अस्वीकार कर दिया था.

बयान

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उफ़ा में दिए बयान के बाद पाकिस्तान सरकार ने बढ-चढ़कर बयानबाज़ी करनी शुरू कर दी.

इनका मक़सद देश के कट्टरपंथियों और कश्मीर के अलगाववादियों को संतुष्ट करना था.

इस बार पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से मिलने के लिए कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को बुलाने का मक़सद उफ़ा में दिए बयान के बाद हुए नुकसान को कम करना होगा.

साथ ही वो अलगाववादी नेताओं को यह भी अहसास दिलाना चाहेंगे कि भारत से जब भी बातचीत होगी, उनसे भी सलाह-मशविरा किया जाएगा.

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि पाकिस्तान के लिए अलगाववादी नेता 'रणनीतिक संपत्ति' की तरह हैं जिसे वहां कोई भी सरकार एक सीमा से अधिक न उनकी अनदेखी कर सकती है और न ही उन्हें नाराज़.

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