सरकार और अफ़सरों की नींद क्यों उड़ी....

  • 21 अगस्त 2015
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इसी सप्ताह इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे ये यह अनिवार्य बनाएं कि सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ें.

आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने वकील शिवकुमार पाठक और अन्य की याचिका पर दिया था.

इस आदेश पर अपील की चर्चा शुरू हो गई है.

लेकिन यह मुद्दा अभी भी बना हुआ है जिस पर चर्चा होनी ज़रूरी है, क्या सरकारी कर्मचारियों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजना चाहिए?

सुधार का बेहतरीन उपाय

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इस विषय बीबीसी हिंदी की ख़बरों पर सोशल मीडिया पर लोग अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. जानिए क्या कहते हैं बीबीसी हिंदी के पाठक.

अरविंद गुप्ता कहते हैं, ''सरकारी स्कूल का मूल्य तब बढ़ेगा जब सरकारी नौकरीवाले खुद अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाएंगें. और इसके चलते ग़रीब के बच्चे को भी फायदा होगा.’’

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Image caption आंध्र प्रदेश के एक गांव में बारिश से लड़ती स्कूल जा रही एक बच्ची.

अनिल पांडे के अनुसार, ''शिक्षा में सुधार का बेहतरीन उपाय.''

नितिश रौनी, जगदीश पटेल और कई अन्य लोगों का कहना है कि ''काश ऐसा नियम भारत के सभी राज़्यों में लागू हो जाए''. इसे आगे बढ़ाते हुए अनवर आज़मी कहते हैं, ''ऐसा हुआ तो सब बराबर हो जाएगा.''

नींद क्यों उड़ गई

ख़लीफ़ अली बेग़ पूछते हैं, ''कोर्ट की दुहाई देने वाले नेता और दूसरे लोग गाना गाते हैं 'हमको न्यायपालिका में पूरा विश्वास है'. अब न्यायपालिका ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है तो सरकार और अफ़सरों की नींद क्यों उड़ गई है?''

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आभा राजपूत कहती हैं, ''सबसे पहले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी को अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना चाहिए.''

चुनाव आयोग भी ले संज्ञान

भास्कर त्रिपाठी कहते हैं, कि इस फैसले ने ''फिलहाल तो शिक्षकों को ही झकझोर दिया गया है. देखिए शिक्षा व्यवस्था किस तरह सुधरती है.''

ख़ुर्शीद आलम प्रधानमंत्री मोदी से गुज़ारिश करते हैं कि वे इसे पूरे देश में लागू करें.

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Image caption नागालैंड में बच्चों के स्कूल ले जाती महिला

चंद्रभूषण चौधरी कहते हैं कि चुनाव आयोग को इसका संज्ञान लेते हुए ऐसे प्रत्याशीयों को जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा ले रहे हों' रोकना चाहिए.''

'नहीं हो पाएगा'

नवल जोशी का मानना है, 'कभी-कभार अपवाद स्वरूप इस तरह के फैसले अदालतें देती रही हैं इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं है और ना ही इस फैसले से कोई क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद की जानी चाहिए यह केवल तकनीकी पेंच है और उसके लिए तकनीकी बचाव को कोई तर्क सामने आ ही जाएगा.''

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नदीम ख़ालिद ने इस विषय पर लिखा है कि उन्हें नहीं लगता कि ऐसा हो पाएगा.

गोपालजी सहाय कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में कभी भी अमल नहीं हो पाएगा.''

यासिर लिखते हैं, ''नेता इस फ़ैसले को कभी लागू नहीं होने देंगे और जनता एक बार फ़िर उन्हीं नेताओं को वोट दे कर पुरस्कार देगी.''

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