'डायन बताकर जीभ को ब्लेड से काट डाला'

  • 21 अगस्त 2015
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एक फ़िल्म मेकर होने के नाते मैं यात्राएं बहुत करता हूं. इससे तमाम जगहों पर जाने और वहां के रीति रिवाज़ों के बारे में जानने का मौक़ा मिलता है.

एक बार मैं रांची गया हुआ था और मेरी मुलाक़ात शहर से क़रीब 35 किलोमीटर दूर एक महिला सीता देवी से हुई.

मुझे ये जानकर बहुत हैरानी हुई कि उसे डायन क़रार दे दिया गया था और फिर शुद्धिकरण के नाम पर उसे बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था.

सीता देवी ने बताया कि उनके हाथों को कीलों से छेदा गया और जीभ को ब्लेड से काटा गया. उन्होंने किसी तरह स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में अपना इलाज कराया.

डायन बताकर प्रताड़ना

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Image caption फ़िल्म काला सच का एक दृश्य.

सीता देवी को उनके घर से जबरन उठा लिया गया था और एक महिला पुजारी (भक्तिन) के सामने फेंक दिया गया.

यहां पुजारिन ने उसके सभी हिस्सों में छेद कर या काटकर खून निकाला, लेकिन पूरे गांव से कोई भी उन्हें बचाने आगे नहीं आया, क्योंकि यह सब गांव की पंचायत की सहमति से हुआ था.

जब हमने डायन प्रथा के बारे में और जानकारी इकट्ठा करनी शुरू की तो हमें ऐसी ही कई दिल दहला देने वाले और किस्से पता चले.

यह इसलिए किया गया क्योंकि गांव में कुछ बच्चे अचानक बीमार पड़ गए थे और इसके लिए उन महिलाओं पर जादू-टोने का आरोप लगाया गया था.

डायन घोषित होने वाली महिला के 'सामूहिक बलात्कार' और उनके गुप्तांगों में मिर्च का पाउडर डालने तक का पता चला.

डायन घोषित कर हत्या करना एक बुरी ही नहीं डरावनी प्रथा है. इसमें महिलाओं का सामूहिक बलात्कार किया जाता है, नंगा घुमाया जाता है, मल पिलाया जाता है और इसके बाद उसे पत्थरों से मार डाला जाता है या गांव से बहिष्कृत कर दिया जाता है.

जब सीता देवी से दोबारा मिलने हम उनके गांव पहुंचे तो पता चला कि वह गांव छोड़कर जा चुकी थीं और कोई भी उनके बारे में बात नहीं करना चाहता था.

कमज़ोर क़ानून

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Image caption डायन प्रथा कि शिकार महिला सीता देवी.

मुझे चार महिलाओं के बारे में भी पता चला जिन्हें गांव में नंगा घुमाया गया और मल पीने पर मजबूर किया गया.

उस साल गांव में फ़सलें ख़राब हो गई थीं और इसका कारण उन चार महिलाओं को बताया गया था.

मुझे यह जानकर तब और झटका लगा जब पता चला कि इस घिनौने अपराध के लिए कोई केंद्रीय क़ानून भी नहीं है.

झारखंड और छत्तीसगढ़ में क़ानून हैं भी तो इतने कमज़ोर है कि इससे कोई सुरक्षा नहीं मिलती.

इन सब घटनाओं को जानने के बाद हमने इस मुद्दे पर 'द ब्लैक ट्रूथ' नाम की फ़िल्म बनाने की फैसला किया.

लेकिन यह बहुत आसान काम नहीं था. शूटिंग में भी काफ़ी दिक्कत आई. फ़िल्म में स्थानीय लोगों को नहीं बताया गया कि यह फ़िल्म डायन प्रथा पर केंद्रित है.

बंधक

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शूटिंग के दौरान किसी तरह गांव वालों को इसका पता चल गया तो उन्होंने कैमरामैन और मुझे बंधक बना लिया. आखिरकार धनबाद पुलिस की मदद लेनी पड़ी.

समस्या यहीं ख़त्म नहीं हुई. जब फ़िल्म बनकर तैयार हुई तो सेंसर बोर्ड में काफ़ी समय लगा और यह कहते हुए उन्होंने सर्टिफ़िकेट देने से इनकार कर दिया कि इसमें कोई सामाजिक संदेश नहीं है.

रिवाइजिंग कमेटी ने 19 जगहों पर काट-छांट के बाद 'ए' (अडल्ट) सर्टिफ़िकेट दिया.

लेकिन इतने कट के बाद फ़िल्म ‘काला सच’ बर्बाद हो जाएगी, यह सोचकर हम फ़िल्म सेंसर अपीलियेंट ट्रिब्यूनल गए. यहां जाकर फ़िल्म को बिना किसी कट के 'ए' सर्टिफ़िकेट के साथ पास किया गया.

डायन प्रथा को रोकने के लिए एक क़ानून की तत्काल ज़रूरत है. इसे उसी तरह ख़त्म करने की ज़रूरत है जैसे देश से सती प्रथा को ख़त्म किया गया.

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