नीतीश को मुख्यमंत्री बनने देंगे लालू?

  • 24 अगस्त 2015
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विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही बिहार की राजनीति रोचक दौर में पहुंच चुकी है.

जदयू-राजद-कांग्रेस महागठबंधन बनाम एनडीए या फिर नीतीश कुमार बनाम नरेंद्र मोदी या कहिए मंगलराज बनाम जंगलराज?

नीतीश का डीएनए, चंदन कुमार-भुजंग प्रसाद जैसे जुमलों के बीच विकास की बात ठहर सी गई लगती थी.

लेकिन 18 अगस्त को आरा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सवा लाख करोड़ रुपए का पैकेज बिहार के चरणों में समर्पित कर जिस आनंद का अनुभव किया, उसमें से निकल कर विकास का मुद्दा फिर बिहार की राजनीति के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है.

तो क्या असली मुक़ाबला नरेंद्र मोदी के परिवर्तन वाले विकास और नीतीश के 'बिहार में बहार हो' के बीच है?

असली मुक़ाबला

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यह सवाल यदि आप बिहार में आम लोगों से पूछें तो मोटे तौर पर तीन तरह के जवाब मिलते हैं.

पहला, नीतीश यदि लालू को साथ न लेते तो उनका फिर से सरकार में आना तय था.

दूसरा, मुक़ाबला कड़ा है और भाजपा जीतेगी.

तीसरा, पक्का-पक्का वोट तो लालू और भाजपा के पास ही है इसलिए जदयू वहीं टक्कर में रहेगा जहां लालू जी राजद का वोट जदयू को ट्रांसफर करवा पाएंगे.

तीनों तरह के लोग अपनी राय के पक्ष में तर्क भी देते हैं.

दूसरी तरफ, यदि आप बिहार के शहरों और क़स्बों की ओर जाएं तो नीतीश कुमार के इश्तहार भाजपा के इश्तहारों पर भारी पड़ते दिखाई देंगे.

इश्तहारों में नीतीश बहुत आगे नज़र आएंगे, लेकिन क्या हक़ीक़त इश्तहारों से बनने वाले माहौल से मिलती है?

राजद करेगी वापसी?

वोट का समीकरण देखें तो सभी यह मान रहे हैं कि उच्च जातियों का लगभग पूरा वोट एनडीए को जाएगा और पूरा मुस्लिम वोट महागठबंधन को.

लेकिन यादव वोट को लेकर कोई यह नहीं कह पा रहा है कि यह पूरा वोट राजद जदयू को ट्रांसफर करा पाएगा.

यही वह पेंच है जो राजद को जदयू के मुक़ाबले ज़मीन पर ज्यादा मजबूत बना देता है.

बिहार में यदि आप उन लोगों से बात करें जो तटस्थ हैं लेकिन हैं राजनीति के कीड़े, तो वह पिछले विधानसभा चुनावों के वोट पैटर्न के आधार पर यह बताने की कोशिश ज़रूर करेंगे कि भाजपा के लिए असली चुनौती राजद है, जदयू नहीं.

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पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 91 सीटें जीती थीं. इनमें से 29 सीटें ऐसी हैं जिन पर भाजपा पिछले दो चुनावों से जीत दर्ज करती आ रही है और 13 सीटें ऐसी हैं जिन पर वो पिछले तीन चुनाव से जीतती आई है.

लेकिन इनमें से अधिकतर सीटों पर भाजपा की जीत का अंतर काफ़ी कम रहा है और वह भी राजद से. यहां यह ध्यान देने की बात है कि पिछले चुनाव में राजद की हालत बहुत ख़राब मानी जा रही थी और उस चुनाव के नतीजे भी एकदम एकतरफ़ा कहे जा सकते हैं.

लेकिन इस बार समीकरण बदल चुके हैं, नए राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा और राजद ही ऐसी पार्टियां हैं, जिनका आधार पूरे बिहार में नीचे तक है.

नीतीश को वोट करेंगे यादव?

ये समझना भी ज़रूरी है कि जदयू का वोटर क्या सोचकर वोट करेगा और यादव वोटर क्या सोचकर वोट करेगा?

जदयू का वोटर नीतीश कुमार की सरकार बनाने के लिए वोट करेगा और इसलिए जहां राजद का प्रत्याशी होगा, वहां वह उसे भी वोट देगा, लेकिन यादव वोट लालू को पड़ेगा और वह जानता है कि लालू जी मुख्यमंत्री नहीं बन सकते.

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दूसरी बात, पारंपरिक यादव वोटर नीतीश को मुख्यमंत्री के रूप में चाहता भी नहीं है. ऐसे में वह राजद को तो वोट करेगा, लेकिन नीतीश की पार्टी को भी वोट करेगा, इस पर संशय जताया जा रहा है.

इस परिस्थिति में स्वाभाविक तौर पर राजद का पलड़ा भारी रहने की संभावना ज्यादा है.

सवाल एक और है, जिस पर सबकी नज़र है - यदि महागठबंधन को बहुमत मिल जाता है, लेकिन महागठबंधन के भीतर राजद की सीटें जदयू से ज़्यादा हों तो क्या लालू प्रसाद यादव नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने देंगे?

और यदि बनने भी दिया तो क्या लालू नीतीश कुमार को स्वतंत्र रूप से काम करने देंगे, जिस तरह वह अब तक करते आ रहे हैं?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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