पटेलों का आंदोलन, गुजरात में सियासी उबाल

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गुजरात में सरकार के इनकार के बावजूद पटेल समुदाय आरक्षण की अपनी मांग पर अड़ा है और अब नज़रें मंगलवार को अहदाबाद में होने वाली उनकी रैली पर टिकी हैं.

अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण की मांग कर रहे पटेल पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते हैं.

कौन है ये पटेल समुदाय, गुजरात में उनकी पृष्ठभूमि क्या है. क्या उनकी मांगें जायज़ हैं. यदि हां, तो सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए?

आरक्षण के लिए जहां पटेलों की अपनी दलीलें हैं, वहीं कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि काफ़ी संपन्न होने के बावजूद इस समुदाय को आरक्षण क्यों चाहिए?

पढिए विस्तार से.

गुजरात की कुल आबादी 6 करोड़ 27 लाख है जिसमें पटेल समुदाय की तादाद 20 प्रतिशत है.

पटेल समुदाय आरक्षण और ओबीसी दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर अब तक 70 रैलियां कर चुका है.

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अब ये लोग मंगलवार को अहमदाबाद में लाखों की संख्या में सड़क पर उतरने की योजना बना रहे हैं.

कहा जा रहा है कि गुजरात फिलहाल पटेल आंदोलन (पटीदार अनामत आंदोलन) की गिरफ़्त में है और सरकार बैकफुट पर है.

बताया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दबाव में हैं, क्योंकि इस आंदोलन ने मोदी के विकास मॉडल की हवा निकाल दी है.

मोदी ने लोगों का दिल और वोट जीतने के लिए इस मॉडल का जोर शोर से प्रचार किया था.

लेकिन हक़ीक़त ये है कि अब तक पटेल को दुनिया सबसे संपन्न गुजराती समुदाय के रूप में पहचानती रही है.

भाजपा का उदय

अमरीका में पटेल उपनाम सबसे प्रचलित 500 टाइटिल या अंतिम नामों की सूची में 174वें स्थान पर है.

वहीं भारत में गुजरात के अधिकांश शहरों में प्रमुख बिल्डर्स, दिग्गज हीरा व्यवसायी, कारोबारी और राजनेता सभी पटेल समुदाय से हैं.

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गुजरात के सबसे बड़े धार्मिक संप्रदायों में से एक स्वामीनारायण संप्रदाय का गुजरात में दबदबा है.

स्वामीनारायण मंदिर दुनिया भर के सबसे भव्य और सुंदर मंदिरों में से एक है.

80 के दशक में गुजरात में भाजपा के उदय का श्रेय बहुत हद तक पटेल समुदाय को जाता है.

1985 में तत्कालीन मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी की ओर से क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने से पटेल कांग्रेस में ख़ुद को हाशिए पर महसूस करने लगे थे.

उभार का दौर

फरवरी 1985 के विधानसभा चुनाव में 148 सीटों के बहुमत के बावजूद पटेल समुदाय के सड़क पर उतर आने के कारण माधव सिंह सोलंकी को इस्तीफा देना पड़ा था.

वो गुजरात में पटेलों के उभार का दौर था जिसके आगे सरकार को घुटने टेकने पड़े थे.

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गुजरात में एक नियम के मुताबिक सात किलोमीटर के दायरे में रहने वाले किसानों को जमीन ख़रीदने का हक था, जिससे पटीदार अधिक से अधिक भूमि के स्वामी बनते चले गए.

बाद में जब ये नियम बदले तो अधिकांश भूस्वामी बिल्डर बन गए.

वर्तमान में गुजरात की सरकार में मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और उनकी कैबिनेट में छह अन्य पटेल मंत्री मौजूद हैं.

हिंसक विरोध

पटेलों के ताज़ा आंदोलन का चेहरा एक 22 साल का युवक बन कर उभरा है. ये हैं हार्दिक पटेल, जिनकी सोशल मीडिया पर ख़ासी चर्चा हो रही है.

हार्दिक पटेल गुजरात के कडी तालुका के भाजपा कार्यकर्ता भरतभाई पटेल के बेटे हैं.

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उनका कहना है कि अब वो ठान चुके हैं कि वे गुजरात में ओबीसी का दर्जा दिए जाने के मुद्दे पर चुप नहीं बैठेंगे.

हार्दिक पटेल की अगुआई में 40 दिनों से चल रहे विरोध प्रदर्शन में 10 लाख से भी अधिक लोग सड़कों पर उतर चुके हैं.

कॉमर्स छात्र हार्दिक पटेल ने तीन साल पहले अहमदाबाद के सहजानंद कॉलेज से स्नातक किया है.

पटेल का कहना है, “हम इस बार अहमदाबाद में 25 लाख लोगों की रैली करेंगे. किसी ख़ास मकसद के लिए यह दुनिया की सबसे बड़ी रैलियों में से एक होगी. हमने सरकार को आगाह कर दिया है कि हम गांधी और सरदार पटेल की शैली (शांतिपूर्ण तरीके से) में विरोध प्रदर्शन करने वाले हैं, लेकिन यदि हमारा हक (अनामत) नहीं मिला तो भगत सिंह का रास्ता अख़्तियार करने से भी नहीं हिचकेंगे."

वे कहते हैं, “गुजरात सरकार हमें आरक्षण नहीं देती तो हम हिंसक विरोध करेंगे."

महंगी-महंगी कार

गुजरात के संपन्न पटेल समुदाय को आरक्षण क्यों चाहिए?

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हार्दिक पटेल का जवाब है, “जिस गुजरात मॉडल से भारत और दुनिया परिचित है, वह सच नहीं है. जैसे ही आप गुजरात के गांवों में पहुंचेंगे, आपको असलियत का पता चल जाएगा. किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, लोगों के पास बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के पैसे नहीं हैं."

उन्होंने कहा, "अधिकांश युवक बेरोज़गार हैं. यही वजह है कि हमारे आंदोलन में इतने अधिक तादाद में युवा शामिल हैं और अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं.”

उनकी रैली में कई प्रदर्शनकारी अपनी महंगी-महंगी कारों में आते हैं, इसके बारे में पूछने पर वे कहते हैं, “ये सुखी-संपन्न परिवारों से आने वाले पटेल हैं जो मुद्दे पर हमारा साथ दे रहे हैं. लेकिन हमारा आंदोलन उन लोगों के लिए है जो गांवों में भूख से मर रहे हैं. उन्हें सरकार जब तक आरक्षण नहीं देती हम चुप नहीं बैठेंगे.”

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पटेल ने बताया, “बड़ी संख्या में पटेल किसान अपनी ज़मीन बेच चुके हैं और अब उन्हें रोजी-रोटी के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है.”

संघर्ष पर सवाल

वैसे गुजरात में ये भी सवाल किया जा रहा है कि कहीं पटेलों की लड़ाई ग़लत तो नहीं है?

कई लोगों का मानना है कि यदि पटेलों को आरक्षण मिल भी जाता है तो अन्य समुदाय के बच्चे उनके कारण आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाएंगे.

आशंका है कि आने वाले कुछ दिनों में पटेल समुदाय और गुजरात सरकार के बीच टकराव गंभीर होता जाएगा.

मोदी और शाह की तरकीब

सरकार पहले से ही इस बात पर चिंतित है कि यदि पटेलों को आरक्षण मिल जाता है तो अन्य ओबीसी समुदाय हिंसक विरोध पर उतरेंगे.

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गुजरात सरकार ने पटेल समुदाय की मांग पर विचार करने के लिए स्वास्थ्य मंत्री नितिन पटेल की अध्यक्षता में छह मंत्रियों का एक पैनल नियुक्त किया.

लेकिन अफसोस कि सारी बातचीत विफल रही.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पटेल की गाड़ी में ब्रेक लगाने के तरकीबें तलाश रहे हैं.

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