'सरकार समाजवाद को ज़मीन पर भी लेकर आए'

  • 26 अगस्त 2015
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Image caption प्राथमिक स्कूल के शिक्षक शिव कुमार पाठक बच्चों के साथ

"सरकार अगर समाजवाद का नारा लगाती है तो फिर उसे ज़मीन पर भी लेकर आए. अच्छी शिक्षा का अधिकार सरकारी स्कूल में जाने वाले बच्चों का भी है."

31 साल के शिव कुमार पाठक की आवाज़ में उनका तेवर साफ़ झलकता है.

18 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाठक द्वारा दायर एक याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि सभी मंत्रियों, जजों, अधिकारियों और दूसरे सरकारी कर्मचारियों को अपने बच्चों को प्रदेश के सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाना पड़ेगा.

इस फ़ैसले ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के स्तर पर हो रही बहस को तेज़ कर दिया है.

नौकरी ही चली गई

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Image caption (फ़ाइल फ़ोटो)

शिव पाठक अभी तक उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर के लभुआ ब्लॉक के प्राइमरी स्कूल में जनवरी 2015 से पढ़ा रहे थे. लेकिन अब वे अपनी नौकरी से बर्ख़ास्त हैं.

उनपर आरोप है कि वे बिना बताए छुट्टी पर चले गए जो नियम के विरूद्ध है. शिव इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि असली वजह उनकी सरकारी स्कूलों में जवाबदेही तय करने की लड़ाई है.

शिव कहते है कि शिक्षा में गुणवत्ता की लड़ाई जारी रहेगी. वो कहते हैं, "सरकार जिस दिन इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील में जाएगी, हम उसके विरोध में खड़े होंगे."

शिव पाठक ख़ुद इसी प्राइमरी स्कूल से पढ़े हैं और अब तय किया है कि उनकी तीन साल की बेटी जब भी स्कूल जाने के उम्र की होगी, सरकारी स्कूल में ही जाएगी.

पाठक कहते हैं, "अगर इलाक़े के सरकारी अफ़सरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में जाएंगे तो उन स्कूलों की स्थिति बहुत बेहतर हो जाएगी. अभी इन स्कूलों में वही बच्चे आते है जिनके मां बाप के पास कोई चारा नहीं है."

मज़दूर भी नहीं चाहते

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Image caption (फ़ाइल फ़ोटो)

शिव कुमार पाठक सवाल उठाते हैं, "मनरेगा की कमाई पर रहेना वाला मज़दूर भी अब अपने बच्चे को सरकारी में स्कूल में नही भेजना चाहता, आख़िर क्यों?"

शिव पाठक इस क्यों का जवाब भी ख़ुद ही देते हैं. उनका मानना है कि केन्द्रीय विद्दयालयों की स्थिती बाक़ी सरकारी स्कूलों से बेहतर है क्योंकि वहां आम सरकारी कर्मचारी के बच्चे पढ़ने जाते हैं. इसका फ़ायदा ये है कि वहां भ्रष्टाचार कम है और स्कूल मुस्तैद हैं.

बाक़ी स्कूलों में न कोई ज़िम्मेदारी निभाना चाहता है, न उन्हें भ्रष्ट होने से कोई गुरेज़ है.

शिक्षा के मसले पर बहुत जोश में आकर बात करते हैं शिव पाठक. उनका कहना है कि उन्होंने इससे पहले भी शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में तीन और क़ानूनी लड़ाई लड़ी है. दो मामले में तो सरकार के ख़िलाफ़ उन्हें सफलता भी मिली है.

भविष्य की उम्मीद

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Image caption (फ़ाइल फ़ोटो)

क्या इस फ़ैसले से कुछ तब्दीली आएगी, इसपर शिव बहुत आश्वस्त भाव से कहते हैं, "ज़रूर आएगी, अगर सरकार इसे लागू करे. देर से ही सही पर इस फ़ैसले को लागू करना चाहिए."

भारत में 6 से 14 साल के बच्चों की मुफ़्त शिक्षा मौलिक अधिकार है ताकि बच्चे स्कूल जाएं.

भारत में 80 प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा सरकारी स्कूल के ही हवाले है लेकिन उन स्कूलों में कितने बच्चे पढ़ कर निकलते हैं, इसे लेकर शायद ही किसी को भ्रम होगा.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस फ़ैसले से एक उम्मीद ज़रूर पैदा की है.

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