चुनावी हलचल से निकलता है जिनका व्यापार

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एक नेट रिचार्ज, एक लैपटॉप और एक ख़ाली पड़ा फ़्लैट क्या कर सकता है? दौड़ाइए.... दौड़ाइए दिमाग़ी घोड़े दौड़ाइए....

मिलिए पटना के 35 साल के अमित से जिन्हें इन तीन चीज़ों ने मिलकर एक कंपनी का मालिक बना दिया. अमित डीजी मीडिया नाम की पब्लिक रिलेशन कंपनी चलाते है.

ग्यारह महीने पहले सिर्फ़ इन तीन चीज़ों और दो दोस्तों कुणाल और अरुण के साथ ये कंपनी खोली और अब लाखों में खेल रहे हैं.

उनकी टीम में अब 24 लोग हैं जिसमें पुराने पत्रकार, शोध करने वाले, कंटेट डेवलेपर से लेकर आईटी प्रोफ़ेशनल्स तक शामिल हैं.

नया बाज़ार

अमित की कंपनी मीडिया मैनेजमेंट, नेताओं की राजनीतिक रणनीति, सोशल मीडिया, रिसर्च, सोशल मीडिया आप्टिमाइज़ेशन, प्रोडक्शन, सर्च मीडिया आप्टिमाइज़ेशन (अगर कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र के बारे में सर्च करें तो इंटरनेट पर क्लाइंट का नाम प्रमुखता से आए) जैसी सेवाएं अपने क्लाइंट को देती है.

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बिहार चुनाव में फ़िलहाल 22 नेताओं ने उन्हें अपने प्रचार प्रसार का काम सौंप रखा है.

अमित के अनुसार, “क्लाइंट अपनी ज़रूरतें बताते हैं. हमारा काम उनके कैम्पेन को उनके हिसाब से डेवेलप करना है. अब तक जो हमारा अनुभव रहा है उसके मुताबिक़ नेता किसी भी पार्टी के हों, वह तकनीकी तौर पर कच्चे होते हैं. हमारा काम उनकी राजनीतिक समझ और तकनीकी हथियारों में तालमेल बैठाना है.”

दरअसल भारत में अब चुनावों में एक नए तरह का बाज़ार सामने आ रहा है. तकनीक ने नौजवानों को इस चुनावी बाज़ार को कैश करने का मौक़ा दिया है तो पारंपरिक धंधों में भी नौजवान पीछे नहीं.

जहां चुनाव, तान देते हैं तंबू

बबलू ने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर चुनाव की प्रचार सामग्री बेचने का काम आठ साल पहले एक लाख रुपये के साथ शुरू किया था. दोस्त तो चले गए लेकिन बबलू ने काम जारी रखा.

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आज आठ युवाओं की टीम उनके साथ है. देश में जहां चुनाव होता है, ये टीम वहीं जाकर अपना तंबू लगा देती है.

दिल्ली, गुजरात, झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में ये टीम चुनाव सामग्री बेच चुकी है. उनकी टीम के सभी लड़के पटना के एक मोहल्ले कुर्जी के हैं.

दूसरे राज्य में काम करने में आने वाली मुश्किल के बारे में बबलू बताते है, “पहले ग़ैर हिन्दी भाषी राज्यों में मुश्किल होती थी. लेकिन अब हमारा हर राज्य में स्थानीय नेटवर्क तैयार हो गया है जो स्थानीय लोगों से संवाद करने और प्रूफ़ रीडिंग जैसे कामों में हमारी मदद करता है.”

श्री साई ट्रेडर्स नाम से चल रही इस टीम में सबसे नौजवान शशि 23 साल के हैं.

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वह बताते हैं, “पहले पहल तो घरवालों को समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करता हूं. क्योंकि ये नए तरह का काम था, साल में तक़रीबन 7 महीने किसी दूसरे राज्य में रहना पड़ता है. लेकिन जब पैसे आने लगे तो सब ठीक हो गया.”

चुनावी धुन पर सेट

सीएम तो बनिबे करिहै, फिर से नीतीश कुमार.... गौरीशंकर गुप्ता के होठों पर आजकल इस गाने की धुन चढ़ गई है.

उनके स्टूडियो में आजकल तेज़ संगीत, फ़िल्मी धुनों पर राजनीति के प्रहार, मगही, मैथिली, भोजपुरी में जोशीले गाने कटते रहते हैं.

वह वीडियो एडिटर हैं. पटना के बाक़रगंज की संकरी गली में अपने गुलाबी मकान के चौथे तल्ले पर बने उनके छोटे से स्टूडियो का यही हाल है.

उम्मीदवारों का प्रोमो, उसे शूट करना, छोटी फ़िल्में, चुनावी गाने वह एडिट करते हैं.

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गौरी कहते हैं, “चुनावी मौसम में अच्छे वीडियो एडिटर्स की बहुत मांग रहती है. घर-घर में मोबाइल है और उम्मीदवार अपनी बात व्हाट्स एप, फ़ेसबुक के ज़रिए लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं. ऐसे में काम की भरमार है. चुनाव में 3 महीने का काम यानि आम दिनों में हमारी साल भर की कमाई.”

दिलचस्प है कि चुनाव में अपना धंधा ढूंढने वाले युवाओं की भी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता है. क्या काम करते वक़्त वो वैचारिक समझ आड़े नहीं आती?

इसके जवाब में 28 साल के कुणाल कहते हैं, “जब हम क्लाइंट के लिए काम करते हैं तो उसकी तरह सोचना हमारा प्रोफ़ेशनलिज़्म है. लेकिन उसका प्रभाव हमारे ऊपर व्यक्तिगत तौर पर न पड़े, ये हमारा ख़ुद से कमिटमेंट है.”

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