मज़दूरी करने आई थीं, बन गईं नामी चित्रकार

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आदिवासी कलाकार भूरी बाई मध्य प्रदेश में झाबुआ जिले के पिथोरा गाँव से मज़दूरी करने के लिए भोपाल आई थीं.

भोपाल के भारत भवन में उनकी मुलाक़ात चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन से हुई. बातों-बातों में पता चला कि भूरी बाई अपने गाँव में दीवारों पर चित्र बनाती थीं.

स्वामीनाथन ने उन्हें काग़ज, रंग व ब्रश दिए और कुछ चित्र बनाने को कहा. स्वामीनाथन ने उन्हें एक दिन की मज़दूरी से ज़्यादा देने की बात कही.

इस घटना के बाद से भूरी बाई की कला यात्रा शुरू हुई.

इस भील चित्रकला को पिथोरा चित्रकला के नाम से जाना जाता है.

उन्होंने हाल ही में चित्रों पिथोरा चित्रकला को संग्रहालय की दीवारों पर उकेरा है.

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Image caption भूरी बाई भील आदिवासी कलाकार हैं और आजकल भोपाल में जनजातीय संग्रहालय में कलाकार के तौर पर काम कर रही हैं.
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Image caption माना जाता है, पिथोरा को भील जाति के लोग अपने घरों की दीवारों पर बनाते हैं, जिससे घर में शांति, खुशहाली बनी रहे.
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Image caption भूरी बाई के चित्रों में भील जनजाति का आम जीवन, मज़दूरी करते आदिवासी, पशु-पक्षी, पेड़, त्योहारों के प्रसंग आदि देखने को मिलते हैं.
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Image caption इसमें चित्र के बीच में एक छोटा आयताकार जानवर बनाया जाता है, जिसमें उंगलियों से छोटी-छोटी बिंदी लगाई जाती है, जिसे टीपना कहते हैं.
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Image caption लोक जीवन की ख़ूबसूरती और सरलता को सहज ही भूरी बाई के चित्रों में देखा जा सकता है.
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Image caption भूरी बाई ने अपने बच्चों और नाती, पोतों को भी पिथोरा पेंटिंग सिखाई है. हालांकि गावों में इस चित्रकला को सिर्फ पुरुष ही कर सकते हैं, स्त्रियों के लिए यह निषेध है.
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Image caption पिथोरा चित्रकला में चटकीले रंगों का प्रयोग किया जाता है.
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Image caption गोंड के बाद भील जनजाति देश की जनजातियों में सबसे विशाल जनजाति मानी जाती है.
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Image caption भूरी बाई को उनकी लोक कला पिथोरा पेंटिंग के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें शिखर सम्मान व देवी अहिल्या सम्मान से सम्मानित किया.

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