एक छापाख़ाना, और हिंदू इंडिया बनाने की मुहिम

गीता प्रेस

गीता प्रेस से कौन परिचित नहीं?

1920 के दशक में दो मारवाड़ी व्यापारियों जयदयाल गोयनका और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने गीता प्रेस और ‘कल्याण’ पत्रिका की स्थापना की थी.

वर्ष 2014 तक गीता प्रेस ने भगवद्गीता की सात करोड़ से ज़्यादा प्रतियां, तुलसीदास की कृतियों की करीब सात करोड़ प्रतियां और पुराण और उपनिषद् की दो करोड़ प्रतियां बेचीं.

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि सनातन हिंदुत्व की मान्यताओं को गीता प्रेस ने घर-घर तक पहुंचाया और हिंदुत्व पुनरुत्थानवादियों के मिशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

आज की राजनीति में जब हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान की बात होती है या घर वापसी पर बहस छिड़ती है, या गोमांस पर प्रतिबंध की मांग गर्म होती है तो इसे सीधे गीता प्रेस, कल्याण से, उनकी स्थापना के दिनों से जोड़कर देखा जा सकता है.

मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ की आज भी दो लाख से ज़्यादा प्रतियां बिकती हैं. अंग्रेज़ी मासिक संस्करण ‘कल्याण कल्पतरु’ की एक लाख से ज़्यादा प्रतियां घरों तक पहुंचती हैं.

इमेज कॉपीरइट httpwww.kalyangitapress.org

पत्रकार अक्षय मुकुल ने किताब ‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ़ हिंदू इंडिया’ में विस्तार से गीता प्रेस के आक्रामक हिंदुत्व पर लिखा है.

सनातन हिंदुत्व के विस्तार में गीता प्रेस सबसे पुराना और कामयाब प्रिंट उपक्रम है. इसका सबसे बड़ा योगदान है हिंदू धार्मिक ग्रंथों को आम लोगों तक सस्ते दाम में पहुंचाना.

साथ ही गीता प्रेस ने 1920 के दशक में हिंदुत्व को राष्ट्रीयता से जोड़ा और न सिर्फ़ देश के भीतर रहने वाले बल्कि विदेशों में रहने वाले हिंदुओं को जोड़ने का काम किया.

भगवद्गीता, रामचरितमानस, उपनिषद् आदि हिंदू धर्म ग्रंथों के अलावा ‘कल्याण’ ने सनातन हिंदू धर्म के बिंदुओं और उसकी प्राचीन विचारधारा को आम लोगों तक पहुंचाया, हालांकि वेदों को छापने से गीता प्रेस ने खुद को दूर रखा!

‘हिंदू एकता’

अक्षय मुकुल लिखते हैं कि पत्रिका के लेखों की सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि उनमें हिंदू समाज के आपसी मतभेदों पर बात नहीं होती थी.

आर्य समाज, हिंदू महासभा और अलग-अलग हिंदू संगठन कई विषयों पर अलग-अलग सोच रखते थे, लेकिन पत्रिका मतभेदों के बजाए हिंदुओं की एकता की बात करती थी और उदाहरण इस्लाम का दिया जाता था.

गीता प्रेस के अनुसार, इस्लाम का अनुसरण करने वाले लोग जहां एक सुर में बात करते हैं, हिंदू संप्रदाय अलग-अलग ज़ुबान में बात करते थे - आर्य समाज कुछ कहता है, हिंदू महासभा का रुख़ कुछ और रहता है.

इमेज कॉपीरइट GEETA PRESS

पत्रकार और लेखक अक्षय मुकुल के अनुसार, कल्याण में आर्य समाजियों, हिंदू महासभा और सभी हिंदू संगठनों के नेताओं के लेख छपते थे.

गीता प्रेस दलितों के मंदिर प्रवेश के विरुद्ध था, जबकि हिंदू महासभा इसके पक्ष में था. हिंदू महासभा का कहना था कि दलितों को उच्च जाति के चंगुल से निकलना चाहिए.

कल्याण का कहना था कि मंदिर में प्रवेश ‘अछूतों’ के लिए नहीं है और अगर आप पैदा ही ‘नीची जाति’ में हुए हैं तो ये आपके पिछले जन्म के कर्मों का फल है.

इसके बावजूद गीता प्रेस ने कभी भी हिंदू महासभा की आलोचना नहीं की.

गीता प्रेस की हिंदी पत्रिका ‘कल्याण’ और अंग्रेज़ी पत्रिका ‘कल्याण कल्पतरु’ मध्यम वर्ग, निम्न-मध्यम वर्ग, हर तरह के घरों में पहुंचती थी और इस कारण इसका प्रभाव आम लोगों में बढ़ा.

अक्षय मुकुल कहते हैं कि हिंदू महासभा जैसी संस्थाओं को लगता था कि अगर वो ‘कल्याण’ के माध्यम से अपनी बात रखेंगे तो उनकी बात आम लोगों तक पहुंचेगी.

तीखी भाषा

1940 के दशक में जब लग रहा था कि स्वतंत्रता क़रीब है तो भक्तिज्ञान और वैराग्य की बात करने वाले ‘कल्याण’ ने हिंदू महासभा की भाषा बोलनी शुरू की.

‘जिन्ना चाहे देदे जान, नहीं मिलेगा पाकिस्तान’ जैसे नारों से उसके पन्ने रंगे होते थे.

इमेज कॉपीरइट Kumar Harsh

शुरुआत में हनुमान प्रसाद पोद्दार के महात्मा गांधी के साथ मधुर संबंध थे, लेकिन धीरे-धीरे संबंधों में गिरावट आती गई.

पत्रिका ने 40 के दशक में महात्मा गांधी पर जमकर हमला बोला. अक्षय मुकुल के अनुसार, 1946 में मदन मोहन मालवीय की मृत्यु के बाद पत्रिका ने मालवीय अंक निकाला लेकिन यूनाइटेड प्रोविंस और बिहार सरकारों ने इसके उत्तेजक विषय वस्तु के कारण इसे ज़ब्त कर लिया.

अक्षय मुकुल बताते हैं कि अंक में हिंदू महिलाओं के बलात्कार, उनके शोषण का चित्रण किया गया था.

‘कल्याण’ का कहना था अगर अगर आप राम-नाम का जप करते हैं तो उसका फल भी मिलेगा. पत्रिका ने राम-नाम जप बैंक की शुरुआत की.

पूरे देश से लोग कॉपियों में राम-नाम लिखकर भेजते हैं और इन कॉपियों को बैंक में जमा किया जाता है.

पत्रिका में पाठकों के पत्र छपते थे जिसमें लोग बताते थे कि कैसे उन्हें राम-नाम जपने से फायदा पहुंचता था. पत्रिका ने रामायण परीक्षा की भी शुरुआत की.

सनातन हिंदुत्व

आज़ादी के बाद जब हिंदू कोड बिल पर बहस चली तो गीता प्रेस ने महीनों तक जवाहरलाल नेहरू और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर पर तीखे हमले किए.

गीता प्रेस ने वर्ण व्यवस्था की वकालत की और उसका मानना था कि हिंदू कोड बिल हिंदुओं के विरुद्ध है और इसके प्रभाव में आने से गैर-हिंदू दामाद बेटियों से शादी कर घर आ जाएंगे.

‘कल्याण’ ने ये मुहिम संविधान सभा के बनने से लेकर उस वक्त तक चलाई जब तक प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू कोड बिल को चार हिस्सों में पास नहीं कर दिया.

1951-52 में जब प्रभुदत्त ब्रह्मचारी चुनाव में नेहरू के खिलाफ़ खड़े हुए तो ‘कल्याण’ ने मुहिम चलाई कि लोग प्रभुदत्त ब्रह्मचारी को वोट दें क्योंकि ‘कल्याण’ के अनुसार नेहरू अधर्मी थे.

गोरक्षा आंदोलन में भी हनुमान प्रसाद पोद्दार का योगदान ज़बरदस्त था. अक्षय मुकुल बताते हैं कि इस आंदोलन में उनके अलावा कई कांग्रेस सदस्य भी शामिल थे. मदनमोहन मालवीय, सेठ गोविंददास, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जैसे कांग्रेस सदस्यों के गीता प्रेस से नज़दीकी संबंध रहे.

अक्षय मुकुल के अनुसार, 1951-52 गोविंद बल्लभ पंत हनुमान प्रसाद पोद्दार को भारत रत्न देना चाहते थे, ये भूलकर कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब 25,000 लोग जिन्हें हिरासत में लिया गया, उनमें पोद्दार भी थे.

चाहे बाबरी मस्जिद हो, सेतुसमुंद्रम परियोजना हो, या फिर 2014 लोकसभा चुनाव ‘कल्याण’ ने बेबाकी से विचार पेश किए हालांकि ये कहना भी ग़लत न होगा कि हनुमान प्रसाद पोद्दार के नेतृत्व में पत्रिका का जो प्रभाव था, वो अब नहीं है.

सफ़ाई

पत्रकार कुमार हर्ष से बातचीत में ‘कल्याण’ के संपादक राधेश्याम खेमका कहते हैं कि उनके सभी प्रकाशन “मनुष्य जीवन के लक्ष्यों और कल्याण की चर्चा करते हैं. हम आध्यात्मिक उन्नति के लिए कृतसंकल्प हैं, किसी आक्रामकता के लिए नहीं.”

वर्ण व्यवस्था, भेदभाव, हिंदुत्व, सनातन परंपरा आदि पर गीता प्रेस की नीतियों पर खेमका कोई सीधा उत्तर नहीं देते.

लेकिन अल्पसंख्यकों के प्रति कथित दुर्भावना पर वो कहते हैं, “मेरी स्मृति के अनुसार विभाजन बेला में नोआखाली सांप्रदायिक संघर्ष के दौरान भी ‘हिन्दू अपनी रक्षा कैसे करें’ जैसे जो लेख छपे भी थे वे भी वैमनस्यता बढ़ने वाले नहीं बल्कि अपनी रक्षा अपनी हिफाज़त पर केन्द्रित थे. साम्प्रदायिकता के आरोप उचित नहीं हैं.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार