'मौत के बारे में सोचो, यही तुम्हारा इलाज है'

  • 5 नवंबर 2015
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भूटान की राजधानी थिम्पू की यात्रा के दौरान मेरे साथ एक अजीब वाकया हुआ. एक दिन अचानक वहां मेरी सांस उखड़ने लगी, बेचैनी महसूस हुई, हाथ और पांव सुन्न होने लगे.

मुझे लगा कि मुझे हार्ट अटैक हो रहा है. मैंने वहीं के डॉक्टर से सलाह ली, जिन्होंने मेरे कई टेस्ट किए, पर कुछ नहीं पाया.

इसके बाद एक दिन जब मैं थिम्पू में भूटान के एक विद्वान के पास बैठा हुआ था तो मुझे अचानक लगा कि मैं उनसे उस घटना के बारे में बात कर सकता हूँ.

कार्मा उरा नाम के विद्वान में मेरी पूरी होने से पहले ही कहा, "यही पता चला होगा कि तुम्हे कुछ नहीं हुआ...."

शायद उन्हें पहले ही पता था कि मेरे सभी डर निराधार थे. उन्होंने मुझसे कहा, "आपको प्रत्येक दिन पांच मिनट मृत्यु के बारे में सोचना चाहिए. इससे आपका इलाज हो जाएगा और आप ठीक हो जाएंगे."

मैंने चौंकते हुए कहा, "कैसे?"

मैगज़ीन के इस आर्टिकल में ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस के लिए मशहूर भूटान के लोगों की ख़ुशी का राज़ जानने की कोशिश...

मैं ये जानने के लिए उत्सुक था कि जब मेरा जीवन बहुत ही अच्छा चल रहा है, तो अब ये क्या होने लगा. और, मैं इसके बारे में क्या कर सकता हूँ?

उरा ने कहा, "आपको मौत का डर सता रहा है. हम जो काम पूरे करना चाहते हैं, या बच्चों के बड़े होता देखना चाहते हैं, वो पूरा किए बिना मरने का डर."

मैंने तब कहा, "लेकिन मैं मौत जैसी डिप्रेस करने वाली बात के बारे में ही क्यों सोचूं?"

उरा का कहना था, "पश्चिमी देशों में अमीर लोगों ने कभी लाश को नहीं छुआ होता है. उन्होंने घाव को, सड़ती-गलती चीज़ों को भी हाथ नहीं लगाया होता है. यही मुश्किल है. जबकि यह (मौत) सब मनुष्य की स्थिति है. हम सभी को उस क्षण के लिए तैयार होना चाहिए जब हम नहीं रहेंगे."

कैसे ख़ुश रहते हैं लोग?

दरअसल यदि हम अपने ही पूर्वाग्रहों के बोझ के नीचे न दबे हों, तो भूटान जैसी जगहें हमें अचरज में डाल सकती हैं.

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भूटान पूरी दुनिया में ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस के आधार पर ख़ुशहाल देशों में शुमार होता है. ऐसे में सवाल यह है कि भूटान के लोग इतने ज़्यादा ख़ुश कैसे रह पाते हैं?

भूटान के कार्मा उरा एक ख़ास व्यक्ति हैं क्योंकि वो सेंटर फ़ॉर भूटान स्टडीज़ के निदेशक हैं.

उरा ने दिन में एक बार मृत्यु के बारे में सोचने की सलाह देकर मेरे साथ नरमी दिखाई क्योंकि भूटान की संस्कृति में तो हर आदमी मौत के बारे में रोज़ पांच बार सोचता है. एक ओर तो भूटान की पहचान ख़ुशहाल देश के तौर पर होती है, दूसरी तरफ लोग मौत के बारे में सोचते हैं !

हाल में हुए कुछ अध्ययन संकेत देते हैं कि मौत के बारे में सोचकर संभवत: भूटान के लोग कुछ सही ही कर रहे हैं.

2007 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ केनटकी के मनोवैज्ञानिक नाथन डेवाल और राय बाउमेसाइटर ने कई छात्रों को दो ग्रुप बनाए.

एक समूह से कहा गया कि वे किसी डेंटिस्ट के यहां हुए पीड़ादायक अनुभव को याद करें जबकि दूसरे समूह से कहा गया कि वे अपनी मौत के बारे में सोचें.

इसके बाद दोनों ग्रुप के सदस्यों को कुछ अधूरे शब्दों को पूरा करने को कहा गया. इसमें यह देखा गया कि जिन लोगों को मौत के बारे में सोचने को कहा गया था, उन्होंने कहीं ज़्यादा पॉज़िटिव (साकारात्मक) शब्द बनाए.

मौत का डर

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शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि 'मौत से लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर भयावह अनुभव लगता है. लेकिन जब लोग इसके बारे में चिंतन करते हैं तो उनका मन अपने आप प्रसन्न करने वाले विचार सोचने लगता है."

इस नतीजे पर उरा या फिर किसी भूटानी को तो शायद ही संशय हो. वे लोग मानते हैं कि मृत्यु जीवन का ही हिस्सा है, चाहे आप इसे पसंद करें या नहीं करें. इस सच को लगातार दूर भगाने या फिर इससे दूर भागते रहने की काफी भारी मनोवैज्ञानिक क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.

'ए फ़ील्ड गाइड टू हैप्पीनेस: व्हाट आई लर्नड इन भूटान अबाउट लिविंग, लविंग एंड वाकिंग' एक बेहतरीन किताब है.

इसकी लेखिका लिंडा लेमिंग कहती हैं, "मौत के बारे में सोचने से मुझमें निराशा नहीं आती है. इससे मेरा ध्यान उन चीज़ों पर जाता है, जिनके बारे में मैं आम तौर पर नहीं सोच पाती और मैं अपनी जिंदगी में उस क्षण का महत्व समझ लेती हूँ."

लिंडा लेमिंग कहती हैं, "मेरी सलाह है कि वहां जाइए. कभी नहीं सोच पाने वाले मौत के विचार पर चिंतन कीजिए. जो चीज़ आपको डराती हो उसके बारे में दिन में कई बार सोचिए."

मौत का उत्सव

पश्चिमी या फिर दुनिया के दूसरे हिस्सों में मौत को लेकर जो डर होता है वो भूटानियों में नहीं होता.

आपको भूटान में मौत और मौत की तस्वीरें हर जगह दिखाई देंगी. बौद्ध शास्त्र में भी आपको मौत का दिलचस्प विवरण मिलता है.

मौत दिखाती रंग-बिरंगी तस्वीरों या फिर मौत को लेकर पारंपरिक नृत्यों को किसी से छिपाया नहीं जाता, चाहे वह बच्चा ही क्यों नहीं हो.

भूटान में जब किसी की मौत होती है तो 49 दिन तक शोक मनाया जाता है, जिसमें कई विविधरंगी परंपराएं शामिल हैं.

भूटानी कलाकार शेवांग डेंडूप कहते हैं, "इसे देखना किसी भी अवसादरोधी दवाओं के मुक़ाबले कारगर होता है."

इस दौरान भूटानी लोग थोड़े दुखी जरूर होते हैं, वो उदासीन दिखते हैं लेकिन ऐसा होता नहीं है. वो तो अनुष्ठानों के माध्यम से दुख को व्यक्त कर रहे होते हैं."

मौत को लेकर इतनी अलग सोच क्यों है? हो सकता है कि इसकी एक वजह तो यही हो कि उनके आसपास कई मौतें होती रहती हैं.

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भूटान एक छोटा देश है, जहां कई वजहों से लोगों की मौत होती है. झटके से धुमावदार सड़कों पर मौत हो सकती है, भालू का शिकार बनकर मौत हो सकती है, जहरीला मशरूम खाने से भी मौत हो सकती है या फिर गर्म-सर्द होने से भी....

पूरब और पश्चिम का अंतर

एक दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि देश के तमाम लोग बौद्ध धर्म में विश्वास करते हैं, जिसमें पुनर्जन्म की मान्यता है. अगर आपको मालूम हो कि आपको दोबारा जीवन मिलने वाला है, तो आपको मौत का डर उतना नहीं सताता. बौद्ध मानते हैं कि मौत पुराने कपड़ों को त्यागने जैसा है.

हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि भूटानी लोगों में डर नहीं होता है, दुख नहीं होता है. यह सब उनमें भी होता है. लेकिन लामिंग कहती हैं कि वे इन मनोभावों से डरकर भागते नहीं है.

लेमिंग कहती हैं, "हम पश्चिमी सभ्यता के लोग यदि दुखी होते हैं, तो उसका कोई समाधान चाहते हैं. हम दुख से डरते हैं. उसका इलाज करना चाहते हैं. लेकिन भूटान के लोग इसे स्वीकार करते हैं. उनके लिए यह जीवन का हिस्सा है."

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कर्मा उरा की दी गई सीख को मैंने अपना लिया है. मैं दिन में एक बार मौत के बारे में ज़रूर सोचता हूं. जब मैं बहुत ज़्यादा दबाव में होता हूं तो मौत के बारे में दो बार सोचता हूं.

(इरिक वेनर तबियत से बागी है और दार्शनिक सोच से ट्रैवलर हैं. वे कई खिताबों के लेखक भी हैं, जिनमें द ज्याग्राफ़ी ऑफ़ बिलिस और आने वाली किताब द ज्याग्राफ़ी ऑप जीनियस शामिल है.)

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.

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