सियासी तुष्टीकरण से उपजा पाटीदार आंदोलन

हार्दिक पटेल इमेज कॉपीरइट ANKUR JAIN
Image caption पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने गुजरात को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात के मुख्य शहर में पटेलों या पाटीदार जाति के लोगों की शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देने की अपनी विवादित मांग को लेकर आंदोलन जारी है.

इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं हार्दिक पटेल जिन्होंने काफी कम समय में लाखों समर्थक जुटा कर सुर्ख़ियां बटोरी हैं.

हालांकि गुजरात में पाटीदार जाति से जुड़ी इस हलचल को समझने के लिए हमें इसकी पृष्ठभूमि पर नज़र डालनी चाहिए.

पढ़िए विस्तार से

पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह के नेतृत्व में मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर अमल से पहले ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा भी दूसरे समुदायों के लिए आरक्षण का प्रावधान था.

बख़्शी आयोग ने गुजरात में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों की पहचान कर 1970 के दशक में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान किया.

इसमें पाटीदार शामिल नहीं थे, जिनका सामाजिक दबदबा पहले भी था और अब भी है.

पुरानी है आरक्षण की मांग

Image caption गुजरात का पटेल समुदाय सरकार नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण मांग रहा है.

दूसरे चरण का आरक्षण 1980 के दशक में आया. 1985 में मैं क़रीब 15 साल का था जब मैंने इस दौर के पाटीदार आंदोलनों में हिस्सा लिया था.

ये आंदोलन सूरत में हुए और उस वक़्त इस घटनाक्रम में मरनेवालों की तादाद 100 से अधिक थी और मारे गए ज़्यादातर लोग ग़रीब और पिछड़ी जातियों से थे जिन पर पटेलों का कहर बरपा था.

मैं वास्तव में इस विरोध प्रदर्शन के विवरण को भूल गया था (उस उम्र में हम अमूमन दूसरों की कही बात पर भरोसा कर लेते हैं).

मैंने लेखक और सरकारी अधिकारी चंदुभाई माहेरिया से बात की, जिन्होंने मुझे याद दिलाया कि इसके बाद आरक्षण को बढ़ाकर 28 फ़ीसदी कर दिया गया.

मंडल आयोग की रिपोर्ट को अमलीजामा पहनाने के दौरान इस सूची में जातियां बढ़ती गईं.

1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इस सूची में घांची समुदाय को भी जोड़ा और उसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल हुए.

क्षत्रिय-पटेल प्रतिद्वंदिता

आरक्षण का शुरुआती फ़ायदा उठाने वाला एक समूह भी था जिसे नव-क्षत्रिय या क्षत्रिय कहा जा सकता है.

वर्ण व्यवस्था के मुताबिक़ क्षत्रिय को पटेल से ऊपर का दर्जा दिया जाता है लेकिन गुजरात की व्यापारिक पृष्ठभूमि में क्षत्रिय योद्धाओं को ज़्यादा सम्मान से नहीं देखा जाता था.

क्षत्रिय की सामाजिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें ओबीसी में शामिल करने के लिए मुफ़ीद थी.

Image caption सूरत और अहमदाबाद में पटेल समुदाय की बड़ी रैलियां हो चुकी हैं.

इससे पटेलों में असंतोष बढ़ा क्योंकि राजनीतिक रूप से पाटीदारों के बड़े प्रतिद्वंदी क्षत्रिय होते हैं और गुजरात की राजनीति की समझ यहीं से शुरू होनी चाहिए.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मूलतः पटेलों की पार्टी थी. वोटों की हिस्सेदारी (उत्तर में 30 फ़ीसदी) के लिहाज से कांग्रेस का भी राज्य में अच्छा हिस्सा है और यह राज्य में मूलतः क्षत्रियों की पार्टी है.

यह फ़ॉर्मूला तब और मज़बूत हुआ जब मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने अपने 'खाम' (केएचएएम) गठबंधन को मज़बूत किया और यह मोर्चा क्षत्रिय, हरिजन (गुजराती दलितों के बजाए अब भी इसी शब्द का इस्तेमाल करते हैं), आदिवासी और मुसलमानों के समर्थन से बना था.

यह गठबंधन दरअसल पटेलों के ख़िलाफ़ था जिनका आकर्षण खुले तौर पर हिंदुत्व और भाजपा के लिए था.

क्षत्रियों और पाटीदारों के बीच दरार बढ़ने लगी और इसका विस्तार भाजपा में भी हुआ.

जब 1990 के दशक में पार्टी सत्ता में आई तब इसमें तुरंत विभाजन हुआ.

आरक्षण के ख़िलाफ़ है आंदोलन?

Image caption गुजरात का पटेल समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त माना जाता रहा है.

पाटीदार समूह (जिसका नेतृत्व केशुभाई पटेल ने किया) ने क्षत्रिय शंकर सिंह वाघेला पर जीत हासिल की जिनका ताल्लुक मूलतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से था लेकिन वह कांग्रेस से जुड़ गए थे.

वह राज्य में इसके प्रमुख नेता बने रहे. मोदी के आने से पहले तक भाजपा में विचाराधारा से बड़ी जाति नज़र आती थी.

लेकिन मोदी ने सत्ता में आते ही पार्टी का ध्यान एक अलग लक्ष्यः मुसलमानों की ओर किया. इससे भाजपा की एकता बढ़ी और दरारें कम हुईं.

मेरे विचार में पाटीदारों का गुस्सा इस बात को लेकर ज़्यादा था कि उनकी जगह निचली जातियों को दे दी गई है.

इनमें से कुछ सकारात्मक भावना आरक्षण के पक्ष में थी लेकिन नकारात्मक विचारधारा इसे ख़ारिज कर रही थी.

बेशक़ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है और दूसरे लोगों ने इस पर टिप्पणी भी की है कि मौजूदा आंदोलन आरक्षण के लिए और इसके ख़िलाफ़ भी नज़र आता है.

Image caption आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि समाज का सिर्फ़ एक वर्ग ही आर्थिक और सामाजिक रूप से मज़बूत है.

गुजरात का विकास मॉडल

इसके दूसरे पहलू पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. गुजरात मॉडल की जीडीपी वृद्धि का ज़ोर विनिर्माण पर था.

गुजरात अकेला ऐसा बड़ा राज्य है जिसका निर्माण सेवा का अनुपात विनिर्माण के पक्ष में है. यह कोई नया विकास नहीं है ऐसा हमेशा से होता आया है.

शायद इसी वजह से गुजरात में फ़ैक्टरियां आसानी से चलाई जाती हैं जबकि कॉल सेंटर का संचालन मुश्किल है जिसकी मुख्य वजह अंग्रेज़ी की जानकारी की कमी है.

यह एक ऐसे समुदाय के लिए महत्वपूर्ण बात है जिसका पुराना और गहरा ताल्लुक अमरीका और ब्रिटेन जैसे अंग्रेज़ीभाषी देशों से है.

अंग्रेज़ी की कमी

हालांकि जो लोग पाटीदार प्रदर्शनकारियों को सुन रहे हैं उनके लिए यह समझना आसान है कि वे पूरी तरह से उन शहरी और शिक्षित लोगों में से नहीं है जिन्हें हम दूसरे शहरों में देखते हैं.

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Image caption 22 साल के हार्दिक पटेल इस आंदोलन के दौरान पटेलों के नेता बनकर उभरे हैं.

मैं काफी लंबे समय से गुजरात सरकार से यह गुज़ारिश करता रहा हूं कि वे कक्षा 5 तक सरकारी स्कूलों के छात्रों को अंग्रेज़ी न पढ़ाने की नीति में बदलाव लाएं क्योंकि उसके बाद काफ़ी देर हो जाती है.

मेरे ख़्याल से जब मोदी मुख्यमंत्री थे तब वह इसमें बदलाव की कोशिश कर रहे थे लेकिन आरएसएस की वजह से उन्हें ख़ुद को रोकना पड़ा.

मैंने एक बार उनसे इस विषय पर साक्षात्कार किया था हालांकि इस विषय पर उनकी राय स्पष्ट थी. (उन्होंने इस लिहाज से कोशिश की कि कक्षा 5 से कुछ विषय अंग्रेज़ी में पढ़ाए जाने चाहिए जबकि दूसरे विषय गुजराती में पढ़ाए जाने चाहिए).

उनसे बात कर ऐसा लगा कि अगर अंग्रेज़ी से परहेज़ करने की नीति में बदलाव लाया जाए तो उन्हें ख़ुशी होगी.

अंग्रेज़ी से परहेज़ करने की नीति का एक परिणाम यह रहा कि हमारे शहरों में सॉफ़्टवेयर और सेवा क्षेत्र में देखी जा रही तेजी गुजरात में ग़ायब है.

तकनीकी कंपनियां नदारद

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Image caption आंदोलन के दौरान गुजरात के कई शहरों में हिंसा भी हुई है.

हालांकि गुजरात में तीन बड़े शहर (आबादी के लिहाज़ से भारत के शीर्ष 10 शहरों में अहमदाबाद और सूरत क्रमशः चौथे और आठवें पायदान पर हैं) हैं लेकिन इनमें आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां मसलन इन्फ़ोसिस, विप्रो, एक्सेंचर, टीसीएस या वैसी दूसरी कंपनियों की दख़ल नहीं दिखती है जो दिल्ली, मुंबई, बेंगलूरु जैसे शहरों के उन लोगों को ज़्यादा मौके दे सकें जिनकी अंग्रेज़ी की समझ अच्छी है.

इन सालों के दौरान गुजरात के इस विकास मॉडल में यह पहलू कमोबेश अछूता रह गया. लेकिन निश्चित तौर पर इस पर नज़र जाएगी क्योंकि यह सरकार की नीति का नतीजा था.

मेरे विचार में आरक्षण से इस समस्या का हल नहीं होगा. (अगर हम पाटीदारों की यह बात मान भी लें कि वे आरक्षण के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं न कि आरक्षण पाने वाले दूसरे समुदाय का विरोध कर रहे हैं.)

गुजरात में सामाजिक गतिशीलता की कमी की समस्या और अधिकारी वर्ग की नौकरी के कम अवसर की परेशानी ख़त्म नहीं होने जा रही है और यह सिर्फ़ पाटीदार समुदाय की ही समस्या नहीं है.

इसका असर सभी गुजरातियों पर पड़ता है. यह एक विशेष तरह की अर्थव्यवस्था का नतीजा है जिसमें फ़ैक्टरियों और व्यापार का दबदबा है. जाहिर है इसमें ख़ूबियां भी हैं और ख़ामियां भी.

यह एक ऐतिहासिक घटनाक्रम है और निश्चित तौर पर इसमें सिर्फ मोदी के कुछ न करने की ही भूमिका नहीं है. अगर मोदी दिल्ली नहीं भी आए होते तब भी यह आंदोलन हुआ होता और यह उतना ही आक्रामक होता जितना कि अब है.

(लेखक एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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