मर रहा सदियों पुराना हिमालयी व्यापार

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इन दिनों उत्तराखंड की उच्च हिमालयी घाटी ब्यांस में सैकड़ों खच्चरों के साथ कई व्यापारी, लिपुलेख दर्रे के पार तिब्बत की ताकलाकोट मंडी की तरफ जा रहे हैं. तिब्बत के लोग इसे 'पूरंग' मंडी कहते हैं.

जून से लेकर सितंबर तक के चार महीनों के लिए, जब इस इलाक़े में बर्फ कुछ पिघलती है, लिपुलेख दर्रे को ताकलाकोट मंडी में चलने वाले पारंपरिक व्यापार के लिए खोल दिया जाता है. ऐसा सदियों से हो रहा है.

इस व्यापार में, दोनों ही देशों के हिमालयी इलाक़े के जनजातीय समाज के व्यापारी शिरकत करते हैं. ताकलाकोट पहुँचने के लिए भारतीय व्यापारियों को बेहद कठिन रास्तों से तकरीबन 85 किलोमीटर का सफ़र पैदल तय करना होता है.

सदियों पुराना व्यापार

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Image caption गुंजी गांव में सरकारी महकमा

इन मंडियों का लंबे समय से अध्ययन कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बीडी कसनियाल बताते हैं कि ये व्यापार लगभग नौवीं शताब्दी के आसपास शुरू हुआ.

''इस व्यापार का मकसद भारत के निचले इलाकों से, पश्चिमी तिब्बत के दुर्गम इलाकों में, गुड़, मिस्री और बर्तन जैसी रोज़मर्रा की ज़रूरत का सामान पहुँचाना था. शुरुआत में इसके बदले तिब्बत से भारत के मध्यहिमालयी इलाकों में नमक आता था.''

शताब्दियों से इस व्यापार में मशगूल भोटिया यानी शौका जनजाति इस व्यापार के चलते काफी समृद्ध रही है.

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Image caption शौका महिला

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद व्यापार तो लंबे समय के लिए बंद ही हो गया. इसका सीधा असर इसी व्यापार पर निर्भर शौका जनजाति पर पड़ा.

पत्रकार कसनियाल कहते हैं ''व्यापार के बंद होने ने इस इलाक़े में मौजूद ब्यांस, चौंदास, दार्मा और जोहार घाटी के तक़रीबन 50 से अधिक समृद्ध शौका गांवों को पलायन पर मजबूर कर दिया.''

1992 में जब लिपुलेख दर्रे को व्यापार के लिए दोबारा खोला गया तो इसमें संतुलन लाने के लिए सीमा के दोनों ओर मंडियां बनाई गई.

तिब्बत की ओर ताकलाकोट मंडी में भारतीय व्यापारी तो लगातार जाते रहे. लेकिन भारत में बनाई गई गुंजी मंडी में केवल शुरूआती कुछ वर्षों में ही तिब्बती व्यापारी आए.

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Image caption रतन नबियाल

आखिर तिब्बत के व्यापारियों ने यहां आना क्यों बंद कर दिया?

नाबी गांव के बुजुर्ग व्यापारी रतन नबियाल कहते हैं, ''शुरुआत में तिब्बती व्यापारी गुंजी मंडी में आए लेकिन यहां के अधिकारियों ने उनका सामान छीन लिया और उनकी बकरियां भी मार डालीं. उसके बाद तिब्बती व्यापारियों ने यहां आना बिल्कुल बंद कर दिया.''

व्यापार की उलझनें

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गुंजी ग्राम सभा की प्रधान अर्चना गुंजियाल भी पिछले 10 सालों से व्यापार करने ताकलाकोट जाती हैं.

वे बताती हैं, ''मैंने जब इस व्यापार में जाना शुरू किया था तो एक युआन की कीमत 4 रूपया हुआ करती थी. लेकिन अब ये कीमत 10 रुपये के बराबर हो गई है. पहले अच्छा मुनाफ़ा हो जाता था लेकिन अब नहीं.''

पारंपरिक रूप से जनजातीय समाजों के बीच होने वाले इस व्यापार में याक, भेड़-बकरियों, घोड़े-खच्चरों, और कई दूसरे जानवारों का भी व्यापार होता था.

लेकिन जब व्यापार दोबारा खुला तो क्वारेंटाइन सुविधा यानि कि जानवरों में रोग की जांच की सुविधा नहीं होने के चलते जानवरों के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अब इस व्यापार में केवल 29 वस्तुओं का निर्यात और 15 वस्तुओं का ही आयात किया जा सकता है.

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भारत-चीन सीमा व्यापार संगठन के पूर्व अध्यक्ष पदम सिंह बताते हैं, “हम 8 और वस्तुओं के व्यापार की इज़ाजत दिए जाने की मांग करते रहे हैं. जिससे व्यापारियों को कुछ तो मुनाफा हो.”

भारत ने चीनी मुद्रा युआन और रुपये को बदल सकने के लिए गुंजी में भारतीय स्टेट बैंक की एक शाखा भी खोल दी लेकिन इस शाखा में अब तक मुद्रा को बदल सकने की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है. अब भी यहां अधिकतर व्यापार वस्तु विनिमय के पुराने तरीक़े से ही होता है.

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बैंक मैनेजर एमएस कुटियाल कहते हैं, “मुद्रा विनिमय के लिए ठीक उसी दिन पैसा डिपो को भेजना होता है और शेयर बाज़ार के अनुसार विदेशी मुद्रा का लेन-देन होता है. इतने दुर्गम इलाकों में ये सुविधाएं मिल पाना बहुत कठिन है.”

घटता रूझान

मुद्रा विनिमय, क्वारेंटाइन और यातायात जैसी सुविधाओं न मिल पाने के कारण कई व्यापारी अब इस व्यापार से दूर जाने लगे हैं.

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भारत-चीन व्यापार केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक़ 2000 के बाद से पिछले तकरीबन पंद्रह सालों में भारत-चीन के बीच सालाना व्यापार 20 लाख डॉलर से बढ़कर अब तकरीबन 100 करोड़ डॉलर तक पहुंचने को है. लेकिन इन दोनों ही देशों के दुरूह हिमालयी इलाकों के जनजातीय समाजों के बीच शताब्दियों से चल रहा पारंपरिक व्यापार धीरे-धीरे शिथिल पड़ता जा रहा है.

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