बिहार में मुसलमान क्या सोच रहे हैं?

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जनगणना के धर्म आधारित आंकड़े बताते हैं कि बिहार में मुसलमान आबादी क़रीब 17 फ़ीसदी है और राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर इस तबक़े पर ख़ास तौर से नज़रें टिकी हैं.

बिहार में मुसलमान आबादी किसी एक ख़ास इलाक़े में नहीं, बल्कि लगभग पूरे राज्य में छितरी हुई है.

यह जनसांख्यिकीय ख़ासियत उन्हें चुनाव की बिसात पर बहुत अहम बना देती है.

राज्य की 243 विधानसभा क्षेत्रों में से क़रीब 50 विधानसभा सीटों पर मुसलमानों के वोट निर्णायक माने जाते हैं.

इन क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 18 से 74 फीसद तक है. बिहार में चुनावी सरगर्मी हर दिन तेज़ हो रही है.

हालांकि अब तक ये पूरी तरह साफ़ नहीं हुआ है कि कौन सियासी दल मुसलमान समुदाय के किन-किन मुद्दों को तवज्जो देंगे.

नुमाइंदगी

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लेकिन मुसलमान समुदाय के लिए इस चुनाव में कौन से मुद्दे ज़्यादा अहम हैं?

सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता अरशद अजमल कहते हैं, "मुसलमानों के बीच नुमाइंदगी, विकास, सुरक्षा और कम्यूनल हालात का मामला अभी चर्चा में है."

उनके मुताबिक़, "सियासी दलों को मुसलमानों का समर्थन इस बात पर निर्भर करेगा कि वे इन मुद्दों पर अपना क्या एजेंडा सामने लाते हैं."

नुमाइंदगी के सवाल पर मुसलमान समुदाय की लगातार मांग रही है कि आबादी के लिहाज़ से कम से कम विधानसभा में 40 मुसलमान प्रतिनिधि होने चाहिए.

लेकिन औसतन इसके आधे मुसलमान प्रतिनिधि ही विधानसभा तक पहुंच पाते हैं.

वर्तमान पंद्रहवीं विधानसभा में 17 मुसलमान विधायक हैं, जिनमें मात्र एक महिला है.

ऐसे में, पटना सिटी के सरफ़राज़ अहमद मांग करते हैं, "मुसलमान, आबादी के मुताबिक़ विधानसभा में भी नज़र आएं, इसके लिए सियासी दलों को मुसलमानों को पर्याप्त संख्या में मौक़ा देना चाहिए."

अहमियत

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मोहम्मद सोहराब अली पटना शहर से क़रीब 15 किलोमीटर दूर अब्दुल्लाह चक गांव में रहते हैं.

उनके मुताबिक़, इस बार सियासी दलों को मुसलमानों के पिछड़ेपन को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए.

वो कहते हैं, "पिछड़ेपन को दूर किए गए बग़ैर किसी मुद्दे को सुलझाना मुमकिन नहीं है. इसे दूर करने के लिए शिक्षा पर ख़ास ज़ोर दिए जाने की ज़रूरत है."

मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के आंकड़े भी मोहम्मद सोहराब जैसे लोगों की मांग को सही ठहराते हैं.

2001 के जनगणना के मुताबिक़, इस समुदाय में साक्षरता दर केवल 42 फ़ीसदी है.

बिहार अल्पसंख्यक आयोग ने 2004 में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति जानने के लिए एक सर्वेक्षण कराया था.

इसके अनुसार, क़रीब आधे मुसलमान ग़रीबी रेखा से नीचे हैं.

साथ ही सर्वेक्षण यह भी बताता है कि गांवों में रहने वाले क़रीब 28 फीसदी मुसलमान आबादी भूमिहीन मज़दूर है.

ओवैसी फैक्टर

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इन मुद्दों के साथ-साथ राज्य में मुसलमान वोट के लिहाज़ से एक और बात अभी चर्चा में हैं. वो ये कि असदुद्दीन ओवैसी की मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलिमीन पार्टी चुनाव में क्या असर डालेगी.

बीते 16 अगस्त को ओवैसी ने सीमांचल के मुसलमान बहुल किशनगंज की एक सभा में बिहार में भी चुनाव लड़ने के संकेत दिए थे.

बिहार में ओवैसी फैक्टर के बारे में वरिष्ठ पत्रकार इमरान ख़ान का कहना है, "ओवैसी की बातों से लोग भले ही इत्तफ़ाक़ रखें. लेकिन जब वोट की बात आएगी तो बिहार में अभी जाति या समुदाय आधारित सामाजिक समूहों के लिए विकल्प बहुत सीमित हैं."

इमरान के मुताबिक़, बाक़ी समुदायों की तरह मुसलमान भी एनडीए या महागठबंधन में से किसी एक को चुनेंगे.

लेकिन पटना के सब्जीबाग इलाक़े के अंसारुल हक़ जैसे युवा मतदान को लेकर अपनी अंतिम राय बनाने के पहले एक बार ओवैसी के विचार जान लेना चाहते हैं.

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