जम्मू कश्मीर: 59 लाख महिलाएँ, दो महिला थाने

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भारत प्रशासित कश्मीर के डूरू (इस्लामाबाद) की हलीम (बदल हुआ नाम) 70 किलोमीटर दूर रामबाग के महिला थाना तक अपनी शिकायत लेकर पहुँचीं.

वे अपने पति और देवर के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराना चाहती थीं. उनका आरोप था कि उनके पति और देवर ने उन्हें पीटा था.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, "मैं मामला दर्ज कराने स्थानीय थाने नहीं गईं, क्योंकि ऐसा करने पर वहां के लोग मुझ पर थूकते. पर हाँ मेरे घर के पास महिला थाना होता तो मैं जाती. मुझे इतनी दूर नहीं आना पड़ता."

जम्मू-कश्मीर पुलिस की अपराध शाखा के आंकड़ों के मुताबिक़, बीते पांच साल में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध काफ़ी तेजी से बढ़े हैं.

इसके बावजूद पूरे राज्य में सिर्फ़ दो महिला थाने हैं, एक श्रीनगर और एक जम्मू में. 2011 में जारी सेंसेक्स के आंकड़ों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की आबादी 59 लाख है.

इकलौता महिला थाना

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कश्मीर घाटी के इकलौते महिला थाने- रामबाग में बीते साल भर में घरेलू हिंसा के 138 मामले दर्ज कराए गए हैं.

इसकी थानेदार इंस्पेक्टर गुलशन अख़्तर कहती हैं, "घरेलू हिंसा के ज़्यादातर मामले हमने सुलझा लिए हैं. इस साल 49 मामले अदालत तक पंहुचे हैं."

बडगाम ज़िले से आई सारा बेग़म (बदला हुआ नाम) ने बताया, "मेरा शौहर अक्सर मुझे पीटता था और पैसे भी ज़्यादा नहीं कमाता था. मैडम से शिकायत करने के बाद उन्होंने उसे कुछ दिनों के लिए हिरासत में रखा. इसके बाद उसे समझाया तो उसने अपनी ग़लती मान ली."

पुरुषों का दख़ल नहीं

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श्रीनगर के महिला थाने में 29 कर्मचारी हैं, जिनमें 21 महिला और 8 पुरुष हैं.

इंस्पेक्टर गुलशन अख़्तर कहती हैं, "सारे मामले सीधे महिला पुलिसकर्मियों के पास जाते हैं. पुरुष पुलिसकर्मी उसमें कोई दख़लअंदाज़ी नहीं करते."

इस महिला पुलिस थाने की स्थापना पूरी घाटी के लिए 1998 में की गई थी. लद्दाख में कोई महिला थाना अब तक नहीं है.

गुलशन अख़्तर कहती हैं, "इस महिला थाने पर काम का दवाब बहुत ज़्यादा रहता है, पूरी घाटी के मामले यहीं आते हैं. घाटी में और महिला थाने खोले जाने की ज़रूरत है."

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फ़हमीदा (बदला हुआ नाम) सीमावर्ती ज़िले कुपवाड़ा की हैं. वे अपने ससुर की शिकायत करने महिला थाने आई हैं.

उनकी शिकायत है कि उनके ससुर ने उन्हें डराया धमकाया है. वे शिकायत करने स्थानीय थाना इसलिए नहीं गईं क्योंकि वहां कोई महिला पुलिसकर्मी नहीं है, जिससे वे बेहिचक अपनी बात कह सकें.

'चाहिए और महिला थाने'

जम्मू-कश्मीर में महिला आयोग भी है. इसकी सचिव रूबीन कौसर का मानना है कि राज्य में बढ़ती हुई घरेलू हिंसा को देखते हुए और ज़्यादा महिला थाने बनाए जाने चाहिए.

पूरे राज्य में साल 2010 में 211 मामले दर्ज कराए गए. इनकी तादाद 2011 में बढ़ कर 286, 2012 में 301 और 2013 में 428 हो गई.

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एक साल बाद 2014 में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों की संख्या 468 हो गई.

रूबीना कौसर ने बीबीसी को बताया, "हमारे आयोग ने दो साल पहले ही और महिला थाना बनाने की सिफ़ारिश राज्य सरकार से की, पर अब तक कुछ नहीं हुआ है."

रूबीना के मुताबिक़, सूबे में बढ़ती घरेलू हिंसा की वजह महिलाओं की समाज में बदलती स्थिति है.

वे कहती हैं, "महिलाएं अब घरों से बाहर निकलने लगी हैं. घर के पुरुषों के बुरे बर्ताव को लेकर वे अब शिकायत करने लगी हैं."

समाज पसंद नहीं करता

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महिला थानों से जुड़ा एक और पहलू भी है. श्रीनगर के सनतनगर इलाक़े की रुख़सार (बदला हुआ नाम) की शिकायत है कि उनके पति उन्हें छोटी मोटी बातों पर भी पीट देते हैं. पर थाने में शिकायत नहीं करतीं क्योंकि वे अपने निजी जिंदगी की बात पूरे समाज के समाने लाना नहीं चाहतीं.

महिला आयोग की सचिव रूबीना इस पर कहती हैं कि समाज अभी भी यह पसंद नहीं करता है कि इस तरह की बातें महिलाएँ पुलिस की जानकारी में लेकर आएं.

वो कहती हैं कि ऐसे में महिला थानों की भूमिका अहम हो जाती है.

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