महिला पुलिस थाने: नीति है पर नीयत नहीं

  • 2 सितंबर 2015

दिल्ली से सटे गुड़गांव में ये सिर्फ़ महिला पुलिस द्वारा चलाया जाने वाला पहला महिला थाना है.

इसके साथ ही हरियाणा के हर ज़िले में एक महिला थाना खोला गया है. पूरे देश में हरियाणा पहला ऐसा राज्य है जहां हर ज़िले में अब एक महिला थाना होगा.

गृह मंत्रालय के मुताबिक़, केंद्र सरकार ने साल 2009 में सभी राज्यों और केंद्र प्रशासित राज्यों से महिला थाने खोलने की सिफ़ारिश की थी. लेकिन अब तक देश में केवल 518 महिला थाने ही खोले गए हैं.

ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एंड डेवेलपमेंट की साल 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक़, 25 राज्यों और केंद्र प्रशासित राज्यों में महिला पुलिस थाने खोले गए हैं. लेकिन महाराष्ट्र समेत कई प्रदेशों में अब तक एक भी महिला पुलिस थाना नहीं खोला जा सका है.

दिल्ली, केरल, राजस्थान और तेलंगाना ने विशेष महिला थाने बनाने की जगह मौजूदा थानों में महिला हेल्प डेस्क बनाए हैं.

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महिला पुलिस थानों की संख्या बढ़ाने में एक बड़ा रोड़ा महिला पुलिस की कम तादाद है. भारत की पुलिस में फ़िलहाल सिर्फ़ 6.11 फ़ीसदी महिलाएं हैं.

केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि साल 2019 तक देश के पुलिस बल का एक-तिहाई, यानि 33 फ़ीसदी महिलाएं होंगी. लेकिन ये बहुत महत्वाकांक्षी साबित हो सकता है.

महिला पुलिस पर हाल में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत की पुलिस में राज्य स्तर पर पहली महिला की नियुक्ति साल 1933 और आईपीएस स्तर पर 1972 में हुई थी.

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआरआई) की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ 1981 तक महिलाएं कुल पुलिस बल का महज़ 0.4 फ़ीसदी थीं.

यानि क़रीबन 34 सालों में महिला पुलिस का आंकड़ा 0.4 से 6.11 हुआ और अब पांच साल में इसे 33 फ़ीसदी करने की तैयारी है.

रिपोर्ट जारी करते हुए गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा, “केंद्र सरकार सभी केंद्र प्रशासित राज्यों के पुलिस बल में 33 फ़ीसदी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए वचनबद्ध है.”

ज़ाहिर है केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र केंद्र प्रशासित राज्यों तक ही है, इसलिए बाक़ी राज्यों में केंद्र सरकार सिफ़ारिश के पत्र तो भेज रही है, पर महिला पुलिस की संख्या बढ़ाने का दायित्व राज्य सरकारों पर ही रहेगा.

दक्षिण एशिया की हालत

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सीएचआरआई की रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के अन्य देशों की महिला पुलिस के बारे में जानकारी भी जुटाई गई है.

इसके मुताबिक़, पड़ोसी देश पाकिस्तान में पुलिस में महिलाओं की नियुक्ति ना के बराबर है.

इसे बढ़ाने की क़वायद पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के कार्यकाल में की गई, लेकिन उनकी मौत के बाद इसमें ज़्यादा प्रगति नहीं हुई.

वहीं बांग्लादेश में साल 2008 में महिला पुलिस अफ़सरों का एक नेटवर्क बनाया गया जिसके चलते न सिर्फ़ पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ी है बल्कि उनकी विशेष ज़रूरतों और मांगों को आवाज़ भी मिली है.

सीएचआरआई के मुताबिक़ पुलिस में महिलाओं की कम तादाद की सबसे बड़ी वजह है उन्हें पुलिस के काम के संदर्भ में पुरुषों से कम समझने वाली सोच जिसकी वजह से उन्हें प्रमोशन पाने और बेहतर ज़िम्मेदारी वाले काम के लिए पसंद नहीं किया जाता या वो पाने के लिए पुरुषों के मुक़ाबले दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है.

इसके अलावा महिलाओं पर घर के काम और बच्चों की ज़िम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए शिफ़्ट सिस्टम जैसी प्रक्रिया का ना होना और थानों में शौचालय जैसी बुनियादी सहूलियतों का ना होना भी उन्हें पुलिस में काम करने से दूर करता है.

महिला थाना

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रिपोर्ट ने ये भी पाया कि कई महिला पुलिसकर्मी ये मानती हैं कि अलग महिला थानों की बजाय हर थाने में महिला पुलिस की मौजूदगी एक बेहतर रास्ता साबित हो सकता है.

इससे महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के प्रति सभी पुलिसकर्मियों (महिला और पुरुष) की संवेदनशीलता बढ़ाने में मदद मिलेगी.

साथ ही शिकायतकर्या महिलाओं को दूर-दराज़ बने महिला थानों तक जाने की परेशानी भी नहीं उठानी पड़ेगी.

तो महिला पुलिस थानों में अपनी शिकायतें लेकर जानेवाली महिलाओं का अनुभव कैसा है?

और उन थानों में काम करनेवाली महिलाओं का अनुभव क्या बाक़ी थानों के मुक़ाबले बेहतर है?

बीबीसी हिंदी ने इन्हीं सवालों की पड़ताल की और जल्द ही आप यहां पढ़ सकेंगे देश के अलग-अलग राज्यों से महिला पुलिस थानों पर विशेष रिपोर्टें.

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