मज़दूर दलीप सिंह कैसे बना 'द ग्रेट खली'

  • 1 सितंबर 2015
खली

साढ़े सात फ़ुट लम्बे और लगभग 200 किलोग्राम वज़न वाले खली से हाथ मिलाने पर लगा कि दाहिना हाथ किसी कुँए में डाल दिया है.

गले मिलने पर एहसास हुआ कि इंसान से नहीं बल्कि किसी चट्टान से टकरा गया हूँ. 42 वर्ष के खली के साथ जब भोजन पर बैठा तो कुछ मिनटों बाद रोटी और अंडों की गिनती भूल गया और एहसास हुआ कि ढाई भुने हुए मुर्गे टेबल पर दस मिनट भी नहीं टिक सके.

लेकिन ये 'द ग्रेट खली' की अब की ज़िन्दगी है जो एक दम अलग है उस दलीप सिंह राना से जो हिमाचल प्रदेश में मज़दूरी किया करते थे.

पत्थर तोड़ने का काम

हिमाचल प्रदेश के एक गाँव के रहने वाले दलीप सिंह राना बचपन से ही लम्बे चौड़े थे जो 'जाइगैंटिस्म' नामक बीमारी का नतीजा है.

ग़रीब परिवार में जन्मे दलीप के छह भाई-बहन थे और दलीप को मज़दूरी करके घर में पैसा भी देना पड़ता था. अब 18 नंबर वाले एडिडास के जूते पहनने वाले खली जब दलीप थे तब नंगे पैर 15 किलोमीटर पहाड़ का सफ़र करके मज़दूरी करने जाते थे.

इसी वजह से खली कभी भी स्कूल नहीं जा सके जिसका उन्हें आज भी अफ़सोस है.

ग़रीबी से निजात

पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अफ़सर एमएस भुल्लर ने खली को एक बस स्टैंड पर मज़दूरी करते देखा और उन्हें झट फ़ोर्स में भर्ती होने के लिए कहा.

इसके बाद से खली ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और पुलिस फ़ोर्स में रहते बॉडीबिल्डिंग शुरू कर दी.

खली ने कहा, "वर्ष 1995 में मैंने चार हज़ार में अपना पहला टीवी ख़रीद कर जब डब्लूडब्लूऍफ़ कुश्ती देखी तो मुझे लगा ये कोई फ़िल्म है. दो दिन बाद असलियत पता चली".

हालाँकि वे अगले कुछ वर्षों तक बॉडीबिल्डिंग करते रहे लेकिन मन तो अमरीका जाकर प्रो-रेस्लिंग करने का ही था.

बिग ब्रेक

खली बताते हैं कि उनके पास अमरीका जा कर ट्रेनिंग करने के पैसे नहीं थे और दूसरों ने प्रायोजन से भी इनकार कर दिया.

आख़िरकार खली ने अपनी 40,000 रुपए की जमा-पूँजी जुटाई और सैन फ्रैंसिस्को शहर पहुँच गए. खली बताते हैं कि वहां पहुँचने पर उन्हें ज़मीन पर सोना पड़ा और साथियों ने किसी पेट्रोल पंप या सुपरमार्केट में नौकरी की सलाह दी.

उन्होंने कहा, "मेरा इरादा पक्का था कि मुझे प्रो-रेस्लिंग की ही ट्रेनिंग लेनी है भले ही कितनी दिक़्क़तें झेलनी पड़ें".

आख़िरकार उन्हें जापान और मेक्सिको में जाकर कुश्ती लड़ने का मौक़ा मिला जहाँ वे 'जायंट सिंह' और 'जिगांते सिंह' नामों से मशहूर हुए.

डब्लूडब्लूई और हॉलीवुड

अमरीका वापस पहुँचने पर खली को हॉलीवुड फ़िल्मों में पहलवान के किरदार मिलने लगे और उसके तुरंत बाद डब्लूडब्लूई से कॉन्ट्रैक्ट का न्योता पहुंचा.

खली बताते हैं कि अगर उन्होंने हिम्मत हार दी होती तो अमरीका के किसी पेट्रोल पंप में गैस भर रहे होते. लेकिन डब्लूडब्लूई में उन्हें हर वर्ष दस लाख डॉलर से ज़्यादा मिलते रहे और बाद में उन्होंने टेक्सस के ह्यूस्टन शहर में एक बड़ा घर और दुकान भी ख़रीद ली.

इन दिनों खली अमरीका और भारत में अपना समय बिताते हैं लेकिन उनके दिमाग़ पर जुनून सिर्फ़ भारत में प्रो-रेस्लिंग को लोकप्रिय बनाने का है.

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