'अफ़सरों के जूते पॉलिश की परम्परा ख़त्म हो'

सेना के सेवानिवृत जवानों का कहना है कि अफ़सरों के जूते चमकाने की परम्परा अब समाप्त हो जानी चाहिए क्योंकि यह एक औपनिवेशिक चलन था.

'वन रैंक वन पेंशन' के लिए चल रहे आंदोलन के बीच इन सेवानिवृत जवानों ने अपनी मांगों को भी सरकार के सामने ज़ोर-शोर से रखा है.

इन पूर्व जवानों का आरोप है कि पूरी भारतीय सेना में उनकी तादात लगभग 97 प्रतिशत है, लेकिन जब बात सुविधाओं की होती है तो अफ़सरों को ही सारी सुविधाएं मिलती हैं.

अपनी मांगों को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले 23 अगस्त से आंदोलन कर रहे इन रिटायर्ड जवानों ने सरकार को जो अपना ज्ञापन सौंपा है उसमें कहा गया है कि एक लाख जवान ऐसे हैं जो फ़ौजी अफ़सरों की नौकरी करते हैं जैसे उनके जूते पॉलिश करना, कुत्तों को घुमाना, घरों की साफ़ सफ़ाई करना, खाना पकाना और कपड़े धोना.

उनका आरोप है कि इन सबकुछ के बावजूद अफ़सरों को उनकी तनख़्वाह में ही अलग से 'सर्वेंट अलाउंस' का प्रावधान किया गया है.

वायस ऑफ़ एक्स सर्विसमेन सोसाइटी नाम से पंजीकृत पूर्व जवानों के इस संगठन में मुख्य रूप से सैनिकों के अलावा नॉन कमीशंड अफ़सर और जूनियर कमीशंड अफ़सर भी शामिल हैं.

हक़ की मांग

Image caption परगट सिंह (बाएं)

सोसाइटी के संयोजक वीर बहादुर सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "सर्वेंट अलाउंस को जेब में डालकर घरेलू काम जवानों से कराना अनैतिक है. सरकार को चाहिए कि अब यह प्रथा ख़त्म की जाए क्योंकि यह बात उस समय की है जब भारत एक उपनिवेश था."

वो कहते हैं, "तत्कालीन ब्रितानी अधिकारी जवानों को नौकर बनाकर रखा करते थे. अब भारत किसी का उपनिवेश नहीं है."

सूबेदार परगट सिंह ने 1962 में चीन, 1965 में पाकिस्तान और 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के लिए पाकिस्तान से हुए युद्ध में अलग-अलग मोर्चों पर दुश्मन की फ़ौजों का जमकर मुक़ाबला किया था.

आज वो अपना हक़ मांगते हुए जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हैं.

परगट सिंह का कहना है कि तीसरे वेतन आयोग की सिफ़ारिशों के लागू होने तक जवानों को आख़िरी तनख़्वाह का 75 प्रतिशत बतौर पेंशन मिलता था.

मगर सिफ़ारिशों के लागू होते ही इसे 50 प्रतिशत कर दिया गया.

मुमकिन

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सेवानिवृत जवानों का कहना है कि देखा जाए तो जवानों को ज़्यादा सुविधाएं मिलनी चाहिए क्योंकि उन्हें 40 साल की उम्र में ही रिटायर कर दिया जाता है, वो भी ऐसे वक़्त जब परिवार की ज़िम्मेदारियाँ पूरी भी नहीं हो पाती हैं.

वहीं अफ़सर 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं जब उनकी ज़िम्मेदारियाँ लगभग पूरी हो चुकी होती हैं.

हालांकि जहां तक एक रैंक एक पेंशन को लेकर चल रहे आंदोलन का सवाल है तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट किया है कि पूर्व सैनिकों की पेंशन में हर साल बढ़ोतरी करना संभव नहीं.

जेटली का कहना था कि वेतन या पेंशन में सालाना या हर महीने रिवीज़न दुनिया में कहीं नहीं होती है और यह मुमकिन भी नहीं है.

सेना में जवान

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  • सेना में जवानों का प्रतिशत- 97.
  • जवानों की विधवाओं की बेसिक पेंशन 3,500 रुपये.
  • जवानों की डिसेबिलिटी पेंशन 3,510 रुपये.
  • एक जवान की 17 साल की नौकरी के बाद 2006 में पेंशन 4,046 रुपये थी, जो 2015 में 5480 रुपये हो गई (1434 रुपये की बढ़ोतरी)
  • सर्विस से 'इनवैलिड आउट' होने पर जवान को 9,600 रुपये डिसेबिलिटी पेंशन मिलती है जिसपर 113 प्रतिशत मंहगाई भत्ता यानी 10,848 रुपये जोड़कर कुल 20,448 रुपये मिलते हैं.
  • एक रैंक एक पेंशन लागू होने पर जवान को 300 से लेकर 700 रुपये तक की बढ़ोतरी.
  • जवान 40 साल की उम्र तक सेवानिवृत हो जाते हैं.
  • सेवानिवृत होने के बाद जवान को सिक्योरिटी एजेंसी चलाने का लाइसेंस नहीं मिलता.
  • सीएसडी कैंटीन में हो रहे मुनाफ़े से जवानों के लिए कुछ नहीं.

सेना में अफ़सर

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  • सेना में अफ़सरों का प्रतिशत- 3.
  • अफ़सरों की विधवाओं की बेसिक पेंशन 5,880 रुपये थी जिसे पहले बढ़ा कर 8,750 रुपये किया गया फिर 15,430 रुपये और अब 15,759 रुपये.
  • अफ़सरों की डिसेबिलिटी पेंशन पहले 5,880 रुपये थी जो अब 15,759 रुपये हो गई है.
  • 2006 में अफ़सर की सेवानिवृति के बाद बेसिक पेंशन 14,600 रुपये थी जो पहले बढ़कर 25700 रुपये हुई और अब 26,265 रुपये (11,665 रुपये की बढ़ोतरी).
  • इनवैलिड आउट होने पर अफ़सरों को 52,530 रुपये मिलते हैं. इसपर 59,360 रुपये डीए जोड़कर यह रक़म 1,11,900 रुपये हो जाती है.
  • एक रैंक एक पेंशन लागू होने पर 5,000 से 20,000 रुपये तक की बढ़ोतरी.
  • अफ़सर 60 साल पर सेवानिवृत होते हैं.
  • अफ़सरों को सिक्योरिटी एजेंसी का लाइसेंस.
  • सीएसडी की बिक्री से हुए कुल लाभ का 50 प्रतिशत अफ़सरों की मेस के लिए.

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