क्या पंचायत ने बहनों के रेप के आदेश दिए?

रेप पीड़िता

उत्तर प्रदेश के एक गांव की पंचायत पर दो बहनों के रेप का आदेश देने के आरोप लगने के बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक याचिका के समर्थन में अब तक एक लाख से अधिक लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं.

बागपत के संकरौद गांव की पंचायत ने कथित रूप से ये सज़ा इसलिए दी क्योंकि इन बहनों के भाई ऊंची जाति की एक महिला के साथ भाग गए थे.

इस घटना के विरोध में एक ब्रितानी सांसद ने भी कार्रवाई की मांग की है.

लेकिन स्थानीय पुलिस और अधिकारी इस आरोप को सिरे से ख़ारिज कर रहे हैं.

उनका कहना है कि पंचायत की ओर से ऐसा कोई आदेश दिया ही नहीं गया है.

पढ़िए विस्तार से

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राजधानी दिल्ली से संकरौद गांव तक का सफ़र बस एक घंटे का है.

यहां की धूल भरी तंग गलियों में हर तरफ़ पुरुषों का जमावड़ा दिखा, लड़के मस्ती कर रहे थे. कुछ औरतें भी थीं मगर सबके चेहरे ढंके हुए थे.

ये वही संकरौद है जिस पर उंगलियां उठ रही हैं.

आरोप है कि यहां की पंचायत ने कथित तौर पर उन दो बहनों के रेप के आदेश दिए जिनके भाई ऊंची जाति की एक लड़की को भगा कर ले गए थे.

यहां रास्तों में, गलियों में, चाय की नुक्कड़ पर जो लोग नज़र आए वे सब इस बात से ख़फ़ा थे कि जो घटना हुई ही नहीं उस पर इतना हंगामा हो रहा है.

एक बुज़ुर्ग ने बताया, "अख़बार में पढ़ा कि हमारे गांव में महिलाओं के साथ हो रहे अपमानजनक बर्ताव पर एक ब्रितानी सांसद ने चिंता जताई है. ये ख़बर सरासर झूठी है."

एक नौजवान तेज़ आवाज़ में बोला, "हमलोग बेहद शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं कि जो बात हुई ही नहीं उसके लिए हमारा गांव सुर्ख़ियों में है."

'प्रेम प्रसंग नहीं'

जिन लड़कियों को कथित तौर पर धमकी दी गई है उनमें से एक क़ानूनी मदद के लिए दिल्ली में एक वकील से मिली.

वो पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर कर चुकी हैं.

उनका कहना है कि घटना के बाद से उनके परिवार के साथ बुरा बर्ताव हो रहा है, रिश्तेदारों को धमकाया जा रहा है और गांव की अगड़ी जाति के लोग उन्हें गांव छोड़ने को मजबूर कर रहे हैं.

वो कहती हैं, "इस बात को पूरा गांव जानता है कि मेरा भाई और वो लड़की एक दूसरे से प्यार करते हैं."

उन्होंने आगे कहा, "लेकिन लड़की का परिवार इससे इनकार करता है. वे कहते हैं कि तुमने हमारी इज़्ज़त ख़राब की है और अब हम तुम्हें बेइज़्ज़त करेंगे. वे ऊंची जाति के हैं. वे कुछ भी कर सकते हैं."

लड़की की सुरक्षा के बारे में सोचते हुए उसे वापस उसके घर भेज दिया गया.

मैं हक़ीक़त के तह तक जाने के लिए उस लड़की से मिलने फिर से गांव गया जो लड़के के साथ चली गई थी.

घर के भीतर लड़की के रिश्तेदार और गांव के बड़े-बुज़ुर्ग बैठे थे.

और घर के बाहर भी बड़ी संख्या में लोग जमा थे. भीड़ उत्सुक, मगर शक्ति का प्रदर्शन करती दिखी.

लड़की के चचेरे भाई ने मुझे बताया, "ये सब झूठ है. वो अपनी मर्ज़ी से लड़के के साथ नहीं गई थी. उनके बीच प्रेम जैसा कोई मामला नहीं था."

आख़िर में मुझे घर की छत पर जाकर लड़की से मिलने और बात करने की इजाज़त मिली. लेकिन साथ में परिवार के दो पुरुष सदस्य वहां मौजूद रहे, लगभग हम पर नज़र रखे हुए.

छत पर से मुझे बस दो दरवाज़े के बाद उस लड़के का घर दिखा जिसके बारे में लड़की ने बताया था कि वो घर से भागी थी. ये अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि दोनों कैसे मिले होंगे और भागने का प्लान बनाया होगा.

लड़की की प्रतिक्रिया

लेकिन जब बात हुई तो मेरे सामने दूसरी ही कहानी सामने आई.

बात करते हुए लड़की लगातार नजरें ज़मीन पर गड़ाए रही. लड़की ने बताया, "मैं उस लड़के को नहीं जानती."

"मैं तो उसका नाम भी नहीं जानती. वह मुझे काम दिलाने का लालच देकर अपने साथ ले गया. वहां उसने मुझे ज़बरदस्ती रखा और आने नहीं दिया."

ये सब सुनने के बाद ये तय करना तो मुश्किल था कि वो अपनी मर्ज़ी से सारी बातें कह रही थीं, या किसी दबाव में. लेकिन हां, उनकी बातें मुझे कुछ रटी-रटाई लगीं.

दुनिया भर में इस घटना पर प्रतिक्रिया आने और एमनेस्टी इंटरनेशनल में याचिका दायर होने के बाद किसी तरह के तनाव से बचने के लिए वहां अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है.

लेकिन उनकी शिकायत है कि सारे तथ्यों को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है.

सामाजिक दबाव

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक विद्यासागर मिश्रा कहते हैं, "हमारा मानना है कि लड़की लड़के के साथ अपनी मर्ज़ी से गई थी."

वो आगे कहते हैं, "मगर जांच के दौरान इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि यहां पंचायत की ऐसी कोई भी बैठक हुई थी जिसमें किसी के ख़िलाफ़ कोई आदेश दिया गया था."

मिश्रा ने बताया, "हमने ये बात एमनेस्टी में रखी है. उनका कहना है कि उनकी जानकारी का आधार सुप्रीम कोर्ट में बहनों की ओर से दायर की गई याचिका है."

एमनेस्टी प्रवक्ता गोपिका बख़्शी ने जानकारी दी, "हम घटना स्थल पर मौजूद नहीं थे, हम गांव अब तक नहीं गए हैं."

गोपिका बख़्शी का कहना है, "हमारा तो अब भी यही मानना है कि जो भी हुआ है, या जो भी आरोप लगाए गए उन सबसे अधिक अहम ये है कि परिवार सुरक्षित है और लड़कियां भी सुरक्षित हैं."

विवाद अब अपने मूल से भटक चुका है.

रिवाज

अलग-अलग जाति का होने के कारण युवाओं को किस तरह सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, इस मुद्दे पर बहस होने की जगह अब इस बात पर विवाद हो रहा है कि गांव की पंचायत ने वो निर्मम आदेश जारी किया था, या नहीं.

यह दरअसल ग्रामीण भारत की वो हक़ीक़त है जिसका ज़िक्र संकरौद के एक व्यक्ति ने किया था.

बीड़ी का कश लगाते हुए वो बोले, "शहर में लोग अंतरजातीय विवाह कर सकते हैं, ये उनका रिवाज होगा. लेकिन हमारे गांव में ये सब नहीं चलता."

उन्होंने आगे कहा, "हमारे अपने नियम-क़ायदे और परंपराएं हैं और हम इसकी रक्षा करेंगे, किसी भी क़ीमत पर."

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