'भारत-जापान के क़रीब आने से चीन नर्वस'

चीन की सेना की परेड

तारीख़- 3 सितंबर 2015

दिन- गुरुवार

चीन की राजधानी बीज़िंग में सैन्य शक्ति का प्रदर्शन.

भारत की राजधानी दिल्ली में 'संघर्ष टालने और पर्यावरण चेतना के लिए वैश्विक स्तर पर हिंदू और बौद्ध पहल' पर अंतरराष्ट्रीय संवाद का आयोजन.

एक ही दिन एशिया के दो पड़ोसी देशों की राजधानी में शुरू होने वाले इन कार्यक्रमों में कई देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.

इनका आयोजन एक संयोग है या फिर इससे कुछ और संकेत मिलता है?

संकेत

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किंग्स कॉलेज लंदन में डिपार्टमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि तनावपूर्ण स्थिति से गुज़रते एशिया में हो रहे इन दो कार्यक्रमों को एक संयोग से ज़्यादा राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए.

वो कहते हैं, "चीन अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है. वो दूसरे विश्व युद्ध में जापान की जो भूमिका रही है, उससे अपने आपको अलग दिखाने की कोशिश कर रहा है. वहीं बुद्धिज्म को मानने वाले भारत और जापान अपना पक्ष रख रहे हैं कि दुनिया की राजनीति ऐसे समय से गुज़र रही है जिसमें इन धर्मों और संस्कारों का एक नया मतलब निकल कर आता है."

पंत कहते हैं कि चीन अपनी भूमिका के लिए सैन्य ताक़त का प्रदर्शन कर रहा है जबकि नई दिल्ली में हो रहा संवाद मानवीय दुनिया की राजनीति के लिए मार्गदर्शक बन सकने वाले मानवता संबंधी पक्ष को सामने रख रहा है.

चीन है नवर्स

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नई दिल्ली में हो रहे 'संवाद' को भारत और जापान के रिश्तों को बेहतरी के तौर पर भी देखा जा रहा है.

हर्ष पंत मानते हैं कि भारत और जापान के क़रीब आने से चीन नर्वस दिख रहा है.

वो कहते हैं, "चीन इस बात से प्रभावित है. काफ़ी नवर्स भी है कि एशिया की दो बहुत बड़ी शक्तियां भारत और जापान एक साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी विदेश नीति का एजेंडा काफ़ी मिलता-जुलता नज़र आ रहा है. "

पंत का आंकलन है कि जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों का रणनीतिक नज़रिया और विदेश नीति में समानता है.

भारत और जापान ने एक-दूसरे को प्राथमिकता बनाया है. उनका कहना है कि चीन ये जानता है कि अगर ये दो शक्तियां साथ काम करने को तैयार हो जाती हैं तो उसके लिए काफ़ी मुश्किल पैदा कर सकती हैं.

सकारात्मक संदेश

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हालांकि वो मानते हैं कि नई दिल्ली में हो रहे 'संवाद' से दुनिया में सकारात्मक संदेश जाएगा और आगे इसमें चीन भी शामिल हो सकता है.

वो कहते हैं, "ये एक अच्छी पहल है. इसे अगर आगे ले जाएं तो इसमें चीन भी शामिल हो सकता है क्योंकि चीन में भी बौद्ध धर्म का काफ़ी प्रभाव है."

साथ ही वो ये भी जोड़ते हैं कि अगर ये चीन बनाम भारत या फिर चीन बनाम बौद्ध और हिंदू धर्म का प्रोजेक्ट बन जाता है तो आगे चलकर काफ़ी समस्या पैदा हो सकती हैं

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