सपा के जाने से 'राजद को होगा नुक़सान'

  • 4 सितंबर 2015
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बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बना महागठबंधन जैसे-जैसे अपनी ताक़त झोंक रहा है, उसके साथी उससे दूर होते जा रहे हैं.

पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने ख़ुद को महागठबंधन से अलग किया और अब समाजवादी पार्टी ने भी किनारा कर लिया है.

हालांकि सपा का बिहार में कोई ठोस जनाधार नहीं है और अधिक संभावना यही है कि इसका आगामी विधानसभा चुनाव पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा.

लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में अपनी खोई पहचान को वापस पाने के लिए इकट्ठा होने की कोशिश में लगे जनता परिवार को इससे झटका ज़रूर लगा है.

विश्लेषकों का मानना है कि महागठबंधन से सपा के निकलने से जो थोड़ा बहुत नुक़सान किसी को होगा वो राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को होगा.

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बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन और एनडीए के बीच कांटे की टक्कर होने का अनुमान लगाया जा रहा है, ऐसे में सपा के छिटकने से चुनावी गणित में कितना फ़र्क पड़ेगा?

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "सबसे बड़ा डर है कि जिन उम्मीदवारों या बागियों को बिहार के दो प्रमुख गठबंधनों में जगह नहीं मिल पाई, उन्हें सपा अपने पास लाने की कोशिश करेगी. अगर ऐसा हुआ तो ये स्थानीय स्तर पर कुछ न कुछ वोट काटेंगे और ये वोट होंगे महागठबंधन के."

"जब कांटे की टक्कर है तो इन कुछ वोटों का भी महत्व बढ़ जाता है."

उनके मुताबिक़, "लालू यादव ऐसे लोगों को ‘वोट कटवा’ कहते हैं, लेकिन ऐसे ही लोग अगर हज़ार पांच सौ वोट भी ले गए तो नुक़सान भारी पड़ सकता है."

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन का कहना है कि महागठबंधन से सपा के निकलने से बिहार के चुनावी बिसात पर कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है.

उनके मुताबिक़, सपा का बिहार में कोई अस्तित्व नहीं है और पप्पू यादव जैसे नेता राजद से निकलकर इसमें शामिल होते रहे हैं और फिर वापस भी लौटते रहे हैं.

राष्ट्रीय असर

सुरूर अहमद का कहना है कि स्थानीय राजनीति से अधिक इसका राष्ट्रीय राजनीति पर असर अधिक अहम है.

इसका सबसे बड़ा असर राष्ट्रीय राजनीति की गोलबंदी पर पड़ सकता है, ख़ासकर जनता परिवार की एक करने की जो कोशिशें हुईं उन्हें इस घटना से एक बड़ा झटका लगा है."

वो कहते हैं, "बीते रविवार को पटना के गांधी मैदान में महागठबंधन की रैली में सोनिया गांधी और सपा नेता शिवपाल यादव एक ही मंच पर थे. शिवपाल यादव ने यहां तक कहा कि समाजवादी पार्टी सेक्युलर राजनीति के लिए कोई भी क़ुर्बानी देने के लिए तैयार हैं. लेकिन अब हालात कुछ और हैं."

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"दूसरी बात ये है कि राजनीतिक गलियारे में मुलायम सिंह और भारतीय जनता पार्टी के बीच बढ़ती क़रीबी चर्चा में है और ये संसद के मानसून सत्र के अंतिम दिनों में ही शुरू हो गई थी."

उनके मुताबिक़, "मुलायम सिंह यादव और लालू यादव के परिवारों के बीच विवाह के जरिए जो एक समधी का रिश्ता क़ायम हुआ था वो राजनीतिक गठबंधन में नहीं बदल पाया."

बहरहाल बिहार के चुनाव में अभी समय है और राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते.

शायद इसीलिए जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने सपा के अलग होने की घोषणा के बाद कहा कि गठबंधन बना रहेगा और मुलायम सिंह को मना लिया जाएगा.

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